भागलपुर दंगा: पुलिस अधिकारियों की भूमिका पर सवाल

भागलपुर दंगा

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    • Author, मनीष शांडिल्य
    • पदनाम, पटना से, बीबीसी हिन्दी डॉट कॉम के लिए

चर्चित भागलपुर दंगों से संबंधित एक और जांच रिपोर्ट शुक्रवार को बिहार विधानसभा में पेश की गई. करीब 25 साल पहले 1989-90 में ये दंगे हुए थे.

मानसून सत्र के आखिरी दिन नीतीश सरकार ने एक सदस्यीय भागलपुर सांप्रदायिक दंगा न्यायिक जांच आयोग की रिपोर्ट को सदन में रखा. नीतीश सरकार ने ही अपने पहले कार्यकाल में फरवरी, 2006 में इस आयोग का गठन किया था.

सेवानिवृत न्यायाधीश एनएन सिंह की अध्यक्षता वाले इस आयोग ने इस साल 28 फरवरी को ही अपनी अंतिम रिपोर्ट सरकार को सौंप दी थी.

निष्कर्ष और सिफारिश

रिपोर्ट में 22 मामलों की जांच करते हुए पुलिस अधिकारियों की जवाबदेही तय की गई है. इनमें भारतीय पुलिस सेवा के कई अधिकारी शामिल हैं.

आयोग ने जिन आईपीएस अधिकारियों को दोषी पाया है उनमें भागलपुर जिले के तत्कालीन वरीय पुलिस अधीक्षक वी. नारायणन, सिटी एसपी आरके मिश्रा और ग्रामीण पुलिस अधीक्षक शीलवर्द्धन सिंह शामिल हैं.

रिपोट के मुताबिक ये अधिकारी कुछ तथ्यों को सावधानीपूर्वक ध्यान में रखे बगैर जांच के अंतिम निष्कर्ष तक पहुंच गए. साथ ही इन्होंने गलत आधार पर भी अंतिम रिपोर्ट दर्ज की.

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साथ ही सरकार ने इस रिपोर्ट की सिफारिशों के आधार पर अब तक की गई कार्रवाइयों से संबंधित एक एक्शन टेकन रिपोर्ट यानी एटीआर भी सदन में रखा.

इस दंगे में सरकारी आंकड़ों के अनुसार भागलपुर शहर और तत्कालीन भागलपुर जिले के 18 प्रखंडों के 194 गांवों के ग्यारह सौ से ज़्यादा लोग मारे गये थे.

सरकारी दस्तावेज़ों के मुताबिक जहां दो महीने से अधिक समय तक यह दंगा चला था वहीं सामाजिक कार्यकर्ताओं और दंगा पीड़ितों के मुताबिक लगभग छह महीने तक दंगे होते रहे थे.

भागलपुर दंगा

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जांच के बिंदु

आयोग को छह बिंदुओं पर जांच करने को कहा गया था. इनमें दंगों से संबंधित मामलों की जांच करने और मुकदमा चलाने वाली एजेंसियों की जांच करना, दोषी पुलिस अधिकारियो के खिलाफ आरोप गठित करना शामिल था.

साथ ही आयोग से यह जांच करने को भी कहा गया था कि क्या दंगा प्रभावित क्षेत्रों में लोगों ने दवाब में अपने ज़मीन-जायदाद बेचे?

आयोग को ऐसे उपाय सुझाने और सिफारिश करने को भी कहा गया था जिससे कि दंगा पीड़ितों के पुनर्वास में आसानी हो. वे अपने ऐसे ज़मीन-जायदाद वापस पा सकें जिससे उन्हें बलपूर्वक बेदखल कर दिया गया था.

भागलपुर दंगे की निशानियां

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इसके अलावा आयोग को ऐसी सिफारिशें भी करनी थी जिससे कि भविष्य में दंगे न हों. संबंधित सरकारी अधिकारियों को दंगों जैसी घटनाओं में शामिल होने से रोका जा सके.

सुझाव

आयोग ने सरकार को यह सुझाव भी दिया है कि वे ऐसे दंगा पीड़ितों की आर्थिक और कानूनी सहायता मुहैया कराए जो दवाब में बेची गई अपनी ज़मीन-जायदाद वापस पाने के अदालत का दरवाजा खटखटाना चाहते हैं.

आयोग ने भविष्य में दंगा रोकने के लिए सरकार को कुछ उपाय भी सुझाए हैं.

इनमें शांति समितियों की मदद लेना, अफवाहों का प्रभावी नियंत्रण करना, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक विचारों से लैस करने के लिए सरकारी कर्मचारियों को प्रशिक्षण देना और दंगों की आशंका वाले जिलों में अनुभवी अधिकारियों की बहाली करना शामिल हैं.

दंगा पीड़ित गांव के लोग

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इसके अलावा आयोग ने यह भी सुझाव दिया है कि दंगों आदि की रिपोर्टिंग के लिए मीडिया, खासकर इलेकट्रॉनिक मीडिया, के लिए सरकार आचार संहिता जारी करे.

अब तक की कार्रवाई

बिहार सरकर ने आयोग की अनुशंसाओं को मान लिया है. राज्य सरकार के मुताबिक उसने दोषी पाए गए अधिकारियों पर कार्रवाई करने के लिए झारखंड और केंद्र सरकार को पत्र लिखा है.

साथ ही कार्रवाई रिपोर्ट में सरकार ने यह भी बताया है कि मुख्य सचिव की अध्यक्षता में एक पांच सदस्यीय समिति भी बनाई गई है.

यह समिति दवाब में कम कीमत में संपत्ति बेचे जाने संबंधी शिकायतों को दूर करने के लिए की गई आयोग की सिफारिशों को ज़मीन पर उतारेगी.

सिख दंगों की तर्ज पर मुआवज़ा

1995 में भी भागलपुर दंगे से संबंधित एक जांच रिपोर्ट सरकार को सौंपी गई थी. तब लालू प्रसाद यादव बिहार के मुख्यमंत्री थे.

जस्टिस एनएन सिंह जांच आयोग ने हालांकि गठन के करीब डेढ़ साल बाद अगस्त, 2008 में ही एक अंतरिम रिपोर्ट नीतीश सरकार को सौंप दी थी.

भागलपुर दंगे में प्रभावित गांव

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इस रिपोर्ट के आधार पर ही केंद्र की तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार ने सिख दंगों के तर्ज पर भागलपुर दंगा पीड़ितों के लिए भी मुआवज़े की घोषणा की थी.

साथ ही अंतरिम रिपोर्ट के आधार पर ही दंगे में मारे गए लोगों के आश्रितों के लिए बिहार सरकार द्वारा पेंशन योजना शुरु की गयी थी. साथ ही क्षति-पूर्ति मुआवज़ा भी दिया गया था.

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