याक़ूब मेमन ने ख़ुद को गिरफ़्तार कराया था?

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- Author, मीना मेनन
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
फांसी लगने के ठीक एक दिन पहले इस पर स्टे के लिए दायर याक़ूब मेमन की याचिका पर 29 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट की एक नई बेंच के सामने सुनवाई होगी.
याकूब के वकील ने कहा था कि उनकी क्यूरेटिव याचिका को बिना सही प्रक्रिया अपनाए खारिज कर दिया गया था, जिसे मंगलवार को मामले की सुनवाई कर रहे जजों में से एक जस्टिस कूरियन जोसेफ़ ने स्वीकार कर लिया.
दूसरे जज जस्टिस अनिल दवे ने पाया कि इस तर्क में कोई दम नहीं है और याक़ूब की सभी दया याचिकाएं पहले ही ख़ारिज हो चुकी हैं.
महाराष्ट्र के राज्यपाल के पास केवल एक अपील है और फांसी लगाए जाने से पहले वो कोई भी निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र हैं.
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याकूब के फांसी के मामले में सुप्रीम कोर्ट के मत अलग अलग है.
इस बात की कम ही संभावना है कि नई बेंच क्यूरेटिव याचिका पर बहस करेगी और इस मामले में संदेह पैदा करने वाली स्थितियों का संज्ञान लेगी.
लगभग सभी वर्गों में असाधारण एकता दिखाते हुए, भारत में कई लोगों ने याक़ूब मेमन के लिए रहम की मांग की है.
उन्हें 12 मार्च 1993 में हुए सीरियल बम धमाकों में शामिल होने के अपराध में 30 जुलाई को फांसी पर चढ़ाया जाना है.
मामला ये नहीं है कि याक़ूब पूरी तरह निर्दोष हैं और उन्हें छोड़ देना चाहिए.
सवाल केवल मौत की सजा और मामले में मौजूद परिस्थितियों को कम करके आंकने से जुड़ा है.
याक़ूब कैसे और कहां गिरफ़्तार हुए?

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जुलाई 1994 में याक़ूब मेमन को तब पकड़ा गया, जब वो वहां एक वकील से भारत वापसी के बारे में सलाह लेने गए थे. वकील उनका रिश्तेदार था.
उन्हें इसके लिए अगाह भी किया गया था.
खबरों और रॉ के टेररिज़्म डिवीज़न के मुखिया बी रमन के लिखे एक लेख के मुताबिक़, उस समय उन्हें भारत लाया गया था और मामले में शामिल किया गया था.
2007 में याक़ूब को मौत की सज़ा दिए जाने और अभियोजन पक्ष द्वारा इस मामले में परिस्थितिजन्य तथ्यों को न रखे जाने से रमन नाराज़ हो गए थे.
गिरफ़्तारी से भारत को फ़ायदा हुआ?
यह भी मान लिया जाए कि याक़ूब ख़ुद भारत नहीं आए बल्कि उन्हें नेपाल में गिरफ़्तार किया गया और भारत भेज दिया गया और उनके पास पाकिस्तान के हाथ होने के उनके पास सबूत थे.
तबतक भारत सरकार के पास वाकई सिवाय इसके कुछ जानकारी नहीं थी कि सीरियल धमाके को कराने में उनके भाई टाइगर मेमन ने अंडरवर्ल्ड डॉन दाउद इब्राहिम की मदद से साजिश रची थी.
मेमन परिवार धमाके की सुबह दुबई में छुट्टियां मनाने मुंबई से फरार हो गया था.
टाइगर को छोड़कर उन सभी ने दावा किया था कि उन्हें इस भयंकर अपराध के पारे में कुछ भी पता नहीं था, जिसमें 257 लोग मारे गए थे और 700 लोग घायल हो गए थे, जिसमें कई ज़िंदगी भर के लिए विकलांग हो गए.
मेमन परिवार के साथ क्या हुआ?

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ये याक़ूब ही थे जिन्होंने मामले की कमज़ोर कड़ियों को जोड़ा और ज़रूरी सबूत दिए थे.
उन्हें और उनके परिवार को कराची में एक सुररक्षित जगह रखा गया था. अपनी गिरफ़्तारी के बाद उन्होंने अपने परिवार और पत्नी को भारत आने के लिए मनाया.
हालांकि सीबीआई का दावा है कि याक़ूब को पांच अगस्त 1994 को दिल्ली में गिरफ़्तार किया था, जबकि याक़ूब ने कोर्ट में बार बार इसका खंडन किया और 1999 में सुप्रीम कोर्ट को इस बारे में एक एक पत्र भी लिखा.
मामले को देख रहे वकीलों के अनुसार, परिजनों को 25 अगस्त 1998 को गिरफ़्तार किया गया.
याक़ूब की पत्नी रहीन, उस समय गर्भवती थीं और पांच सितम्बर को दुबई से भारत आने के बाद उन्होंने एक लड़की को जन्म दिया.
उनके पिता अब्दुल रज्जाक सुनवाई के दौरान गुजर गए और उनकी मां हनीफ़, पत्नी रहीन और भाई सुलेमान कोर्ट से बरी हो गए.
दो अन्य भाई एसा और यूसुफ़ को बीमारी के कारण उम्रकैद हो चुकी है और भाभी रुबीना भी उम्रक़ैद की सज़ा भुगत रही हैं. धमाकों के दिन विस्फ़ोटक ले जाने वाली जो वैन पकड़ी गई थी वो इन्हीं के नाम पर रजिस्टर्ड थी.
टाइगर को छोड़कर एक अन्य भाई अयूब फ़रार हैं. बाकी परिवार भारत में है.
रमन के लेख में क्या लिखा है?

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रमन लिखते हैं कि याक़ूब ने जांच एजेंसियों के साथ सहयोग किया और भारत वापस आने के लिए मेमन परिवार के कुछ सदस्यों को मनाया भी.
उनके मुताबिक़, वो महसूस करते हैं कि परिस्थिजन्य सबूतों की कमी है. सीरियल धमाका मामले में, हालांकि फैसला हो चुका है, कम से कम एक अभियुक्त गवाह बन गया और उसने सबूत दिए, छोड़ा जा चुका है.
जिस सह अभियुक्त ने याक़ूब के ख़िलाफ़ बयान दिया, वो मुकर चुका है. मौत की सज़ा की मांग करते हुए अभियोजन पक्ष ने कोई भी परिस्थितिजन्य सबूत नहीं दिया, जिनका उल्लेख रमन ने किया था.
रमन कहते हैं कि मेमन परिवार धमाके के बारे में जानते थे लेकिन वो वापस आए और जांच में मदद की और सुनवाई के दौरान उनके बचाव में परिस्थितिजन्य सबूत कभी सामने नहीं लाए गए.
एक दूसरा मुख्य मुद्दा फांसी की सज़ा का है. हर समय जब भी मौत की सज़ा होती है, तो इस बात पर बहस होती है कि क्या भारत में इस पर पाबंदी लगानी चाहिए या नहीं.
याक़ूब पर क्या हैं आरोप?

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उनपर इंडियन पेनेल कोड की धारा 120 बी के तहत साजिश रचने का आरोप है. इसके अलावा चरमपंथियों की मदद करने और ग़ैरक़ानूनी रूप से हथियार और गोली रखने के लिए उनपर टाडा के तहत आरोप लगाए गए हैं.
साल 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सज़ा पर मुहर लगाई और शीर्ष अदालत ने माना कि धमाके की साजिश रचने में याक़ूब की मुख्य भूमिका थी.
चरमपंथी हमले के लिए हवाला के मार्फ़त पैसे के लेनेदेन, पाकिस्तान में ट्रेनिंग के लिए युवाओं का बंदोबस्त करने और सह अभियुक्त को हथियार और गोला बारूद देने के उनपर आरोप लगाए गए थे.
उन्होंने इन आरोपों का खंडन किया और लगातार कहते रहे कि उन्हें कुछ भी पता नहीं था.
चार्टर्ड अकाउंटेट के रूप में दोस्त चेतन शाह के मांस निर्यात बिजनेस में उनकी सफ़ल साझेदारी थी, जिसके बूते उनके परिवार ने माहिम में अल हुसेनी बिल्डिंग में फ्लैट खरीदे.
संदेह इस बात पर है कि मेमन परिवार क्यों दुबई चला गया, क्या वो ईद की छुट्टियां मनाने के लिए गए थे तो क्यों और क्या याक़ूब अपने भाई की योजना के बारे में पूरी तरह निर्दोष थे?
अदालतों ने उन्हें दोषी पाया है और अब यह फैसला सर्वोच्च अदालत के हाथ में है कि उन्हें फांसी दी जाए या नहीं.
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