अमित शाह ने कुछ ग़लत कहा क्या....

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- Author, ज्ञानेंद्र नाथ बरतरिया
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
भारतीय मीडिया में अगर आपको कोई बात प्लांट करनी हो, तो उसके लिए केजरीवाल सरीखा बजट बनाने की ज़रूरत नहीं है.
बस एक बार किसी तरह यह कह दीजिए कि 'अच्छे दिन नहीं आएंगे.' सारा मीडिया आपके पीछे दौड़ पड़ेगा.
अब यह कैसे कहा जाए कि 'अच्छे दिन नहीं आएंगे?'
सरल और पुराना तरीका है कि, कहा जाता है, सुना जाता है, सूत्रों के मुताबिक़, माना जाता है, वगैरह. लेकिन अब कोई भी आंकड़ा इसकी पुष्टि करने को तैयार नहीं है.
राजनीति में, टीवी चैनलों में इस पर शोर मचा. वास्तव में यह अफ़सोस की बात होनी चाहिए.
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शीर्षक देखकर रणभूमि में कूदे इन शूरवीरों ने उसी ख़बर की तीसरा और चौथा पैरा पढ़ने की भी ज़रूरत नहीं समझी.
इसमें स्पष्ट कहा गया था कि “देश को दुनिया के सर्वोच्च स्थान पर बैठाना है, तो पांच साल की सरकार कुछ नहीं कर सकती.”
<link type="page"><caption> 'विश्व गुरु बनाने को नहीं दिया था वोट'</caption><url href="http://www.bbc.com/hindi/india/2015/07/150714_amit_shah_acche_din_sr.shtml" platform="highweb"/></link>
अगर ऐसे ही लोग और ऐसा ही मीडिया विपक्ष बनना चाहते हैं, तो यह घोर हास्यास्पद स्थिति है.
इस शरारत का कारण कहीं और है. समय आने पर सामने आ जाएगा.
वास्तव में अमित शाह ने जो कहा है, उसे समझने की कोशिश की गई होती, तो बहस का बहुत उपयुक्त मुद्दा होता.
शाह ने कहा था, “पांच साल की सरकार कुछ नहीं कर सकती.”
आइए इस पर बहस करें. चंद राज्यों को छोड़कर, देश के अधिकांश इलाके में, कोई भी नागरिक उस सड़क पर अपने वाहन से जाने की कोशिश करे, जो वाजपेयी सरकार के समय की स्वर्णिम चतुर्भुज योजना का या राष्ट्रीय राजमार्गों को उन्नत बनाने की योजना का हिस्सा रही हो.
परियोजना का समय

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आप पाएंगे कि राजमार्गों को उन्नत बनाने का या नई सड़क बनाने का काम यूपीए सरकार ने दस साल तक रोक रखा था और इस कारण अधूरा पड़ा है.
कई स्थानों पर इस कारण कई दुर्घटनाएं भी हुई हैं. क्यों?
क्यों का उत्तर तो बिल्कुल सड़कछाप राजनीति में है. लेकिन इससे पैदा होने वाला सवाल और भी बड़ा है.
वह यह कि क्या यह देश ऐसा कोई भी प्रोजेक्ट अपने हाथ में लेने में सक्षम नहीं है, जिसकी निर्माण अवधि पांच साल से ज्यादा होती हो?
पांच साल बाद चुनाव होते ही हैं, और लोकतंत्र में सरकार बदल जाना भी कोई अनूठी बात नहीं होती है.
सरकार बदलेगी, तो क्या वह हर काम रोक दिया जाना चाहिए, जिसका श्रेय पिछली सरकार को मिल सकता हो? अगर हां, तो क्या हम सिर्फ वही काम कर सकते हैं, जो पांच साल में निपट सकते हों, बल्कि उससे भी पहले?
'बीस सरकारें लगेंगी'

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अब देखिए किसी देश को सक्षम बनाने और गौरवपूर्ण स्थिति में लाने में कितनी मेहनत, कितने समय तक करनी पड़ती है.
दूसरे विश्व युद्ध के बाद जर्मनी और जापान का पुनरुत्थान उदाहरण देने लायक माना जाता है. न तो इनमें से कोई दूध का धुला हुआ था और न ही इनमें से कोई भारत की विशालता के आसपास भी है.
फिर भी, जर्मनी को वापस उठ खड़े होने में, कोनार्ड एडेनौर के नेतृत्व में, 14 वर्ष लगे. और विश्व (अर्थव्यवस्था में) अपनी हैसियत दोबारा पाने में, उसके बाद फिर 30 वर्ष लग गए.
माने पांच साल वाली कम से कम नौ सरकारें और अगर यहां की तथाकथित ज़िंदा कौमों वाली खिलंदड़ी चले तो कम से कम बीस सरकारें.
ऐसे में पांच साल वाली एक सरकार क्या कर सकती है- इस पर बहस होनी चाहिए, लेकिन नहीं होगी.
सरकार गिराने के लिए, पांच साल इंतजार न करने वाली 'जिंदा कौम' छाप राजनीति नारे कुछ भी लगाए, वह चीन को अपने नारों से आगे नहीं देख पाती.
देंग को हूट किया जाता तो?

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चीन में निरंकुश राजनैतिक स्थिरता तो अपने स्थान पर है, नीतिगत सततता (इसे स्थिरता से भिन्न माना जाना चाहिए) भी कई दशकों तक चलती है.
देंग का बाजारवादी माओवाद 1970 के दशक के अंत से चला आ रहा है और उसके जो भी फल हैं, वे अब जाकर पके हैं.
तो क्या देंग को 1980 में ही हूट कर दिया जाना चाहिए था?
भारत के जो भी लोग रूसियों के नैसर्गिक प्रशंसक रहे हैं, उन्हें रूस की ओर एक बार फिर से देखना चाहिए.
टूटने के बाद से सोवियत वर्चस्व का फिर क़ायम होना तो दूर, बचे-खुचे रूस को भी, भरपूर गैस-तेल के बावजूद, लड़खड़ाने से बचना सीखने में अभी तक वक्त ही वक्त लग रहा है.
सोवियत संघ को ओटोमन साम्राज्य की गति पर पहुंचाया था रोनाल्ड रीगन की नीतियों ने. स्टार वार्स का जुमला देकर रीगन ने सोवियत संघ को रसोई के कोयलों तक की राशनिंग के लिए मजबूर कर दिया था.
लेकिन रीगन की रची इस व्यूह रचना के नतीजे भी रीगन की पारी ख़त्म होने के दो साल बाद आ सके थे.
और अमरीकी आर्थिक ताकत पर रीगन की नीतियों के परिणाम कम से कम एक दशक बाद मिले.
ग़लत क्या कहा?

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ऐसे में भारत को पुनः वैश्विक गौरव दिलाने में 25 वर्ष का समय लगने की बात कहकर अमित शाह ने ग़लत क्या कहा?
यह तो रीगन का भाग्य था कि अमेरिका में ऐसे नेता बहुत हाशिए पर थे, जो तीसरा पैरा भी पढ़े बिना बयानबाजी करने लगते हों.
अमित शाह उतने भाग्यशाली नहीं हैं. यहां तो 'अच्छे दिन' कहना भर ही बवाल खड़ा करने के लिए काफ़ी होता है.
अमित शाह के बयान पर हुई यह राजनीति एक सबक और सिखाती है. इस देश में अगर आप कोई समझदारी की बात करेंगे तो आपके विरोधी या तो उसका बतंगड़ बनाएंगे, या आपको हूट करेंगे.
अगर आप कोई मटका गढ़ेंगे, तो वे उसे तोड़कर कहेंगे कि देख लो, ये तो अलादीन का चिराग था ही नहीं. जनता को ठगा गया है.
सही है. जनता को ठगा गया है, लेकिन कौन ठग रहा है?
(ये लेखक के निजी विचार हैं)
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