एनआरआई के अच्छे दिन, मज़दूर के क्यों नहीं..

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नरेंद्र मोदी का अच्छे दिनों का जुमला उनके चुनाव प्रचार के दौरान और उसके बाद भी सोशल मीडिया और बाक़ी जगहों पर ख़ासा मशहूर हुआ.
कई लोगों ने इसका मज़ाक बनाया तो कुछ ने दावा किया कि स्थितियां पहले से बेहतर हुई हैं.
मोदी सरकार के एक साल पूरा होने पर बीबीसी ने अलग-अलग वर्ग के कुछ लोगों से पूछा कि क्या वाकई अच्छे दिन आ गए हैं?
या फिर, ये मोदी का केवल एक जुमला है.
डॉ अंजू प्रीत, प्रोफ़ेसर जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी, वॉशिंगटन डीसी
मेरे हिसाब से अच्छे दिन आ गए हैं. मोदी सरकार के कार्यकाल में घोटाला शब्द आम आदमी के शब्दकोश से बाहर हो गया है.
आम लोग अब हताश नहीं है, बल्कि आशावादी हो चुके हैं. एनआरआई होने के नाते मैं कहूंगी कि विदेश में रह रहे भारतीय युवाओं का आत्मविश्वास बढ़ा है. अब हम अपने आपको गौरवान्वित महसूस करते हैं.

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उन्होंने विदेश में भारत की अच्छी छवि पेश की है. भारत को एक युवा देश के तौर पर वो सामने लेकर आए हैं. अब विदेशी कंपनियां भारत आना चाहती हैं.
मोदी जब अमरीका आए थे तो उनका ज़बरदस्त स्वागत हुआ. अमरीका में धूम मच गई थी और मेरे अमरीकी दोस्तों ने भी देखा. भारत में इऩ्फ्रास्ट्रक्चर को लेकर सरकार जो पहल कर रही है उस पर हम भी चर्चा करते हैं. हमें उनसे बड़ी उम्मीदें हैं.
चंद्रशेखर (मज़दूर, ज़िला पटना)

लगभग एक साल से मनरेगा के तहत एक दिन का भी काम नहीं मिला है. काम मांगने पर मुखिया कहते हैं कि पैसा नहीं है. साथ ही वे यह भी बताते हैं कि ऊपर से ही पैसा नहीं आ रहा है तो काम कैसे देंगे, घर बेचेंगे कि खेत बेचेंगे.
मैं लगभग चार साल से मनरेगा का काम कर रहा हूं. एक साल पहले हालात ऐसे नहीं थे. पहले, साल में करीब तीन महीने तक मेरे परिवार को काम मिल जाता था.
गांव में काम नहीं मिलने के कारण मुझे कमाने के लिए घर छोड़कर बाहर आना पड़ा. शहर का रुख़ करना पड़ा.
पहले भी शहर काम की तलाश में आते थे, लेकिन अब पूरी तरह शहरी काम के ही भरोसे रह गए हैं. मेरे गांव में पलायन पहले से बढ़ गया है.
मनरेगा का काम अब नहीं मिलता है तो बच्चों की पढ़ाई-लिखाई, खाने-पीने से लेकर हर चीज में अब परेशानी होती है. पहले मनरेगा के पैसों से कई काम कर लेते थे.
एक तो अब काम नहीं मिलता, दूसरी ओर मंहगाई भी नहीं घटी. बीते एक साल में हमारी हालत और बिगड़ गई है.
( बीबीसी संवाददाता प्रभात पांडेय से बातचीत पर आधारित)
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