किसके 'अच्छे दिन' आए, किसके नहीं?

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'अच्छे दिन आने वाले हैं' का नारा देकर नरेंद्र मोदी केंद्र की सत्ता में आए, जिसके बाद विपक्ष इस जुमले को बार बार उछालता रहा है.
अब उन्हें प्रधानमंत्री पद संभाले एक साल होने जा रहे हैं और इस एक साल के कार्यकाल में उपलब्धियां चर्चा का विषय हैं.
सरकार विकास के दावे कर रही है तो विरोधी मोदी सरकार को सूटबूट की सरकार और उद्योगपतियों की सरकार बता रहे हैं.
तो किन लोगों को वाक़ई लगता है कि अच्छे दिन आ गए हैं और किन्हें लगता है कि बुरे दिन आए हैं.
भाग्येश सोनेजी, उद्योगपति

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नरेंद्र मोदी बहुत अच्छा प्रतिनिधित्व करते हैं. एक साल में उन्होंने मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया जैसी चीज़ों को दुनिया तक पहुंचाया. ये अच्छे आयडिया हैं.
अब देखते हैं कि इन्हें लेकर आगे क्या होता है. इस सरकार ने व्यापार आसान बनाने पर फ़ोकस किया, वरना पहले हम लोगों को लगता था कि बिज़नेस करना अपराध है.
बिज़नेसमैन के लिए देश में व्यवस्थागत समस्याएं नहीं होनी चाहिए, जिससे वो मैन्फैक्युरिंग और मार्केंटिंग में ज़्यादा ध्यान लगा पाएं न कि सरकारी कर्मचारियों के साथ बैठकर माथापच्ची करें कि व्यापार की समस्याएं कैसे दूर की जाएं.
ये शुरुआत तो हो गई है. काम अच्छे शुरू हो गए हैं, लेकिन पूरी तरह से सरकार को जज करने के लिए दो-तीन साल चाहिए.
तारिक़ महमूद, राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व चेयरमैन

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ये किसी से छिपा नहीं है कि अल्पसंख्यकों की हालत एक साल में काफ़ी ख़राब हुई है.
ऐसा नहीं है कि मोदी सरकार से पहले मुसलमानों और ईसाइयों के लिए इस देश में दूध की नदियां बहती थीं, लेकिन अब जो मुसलमानों के लिए ज़बान दराज़ी होती है वो नहीं होती थी.
इन लोगों को जो रोक सकते हैं वो राजनीति की मजबूरी की वजह से या किसी और वजह से इन्हें रोकते नहीं.
अल्पसंख्यकों के लिए ऐसी भद्दी भाषा का इस्तेमाल किया जाता है.
धार्मिक स्वतंत्रता पर अमरीकी आयोग की रिपोर्ट में भारत में अल्पसंख्यकों की हालत को चिंताजनक बताया गया है जिसे भारत सरकार ने ख़ारिज कर दिया था.
सवाल ये है कि अमरीकी यूं ही ऐसी रिपोर्ट क्यों बनाएंगे?
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