मोदी एक साल में कितना सुशासन दे पाए?

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लालफ़ीताशाही को कम करने और सुशासन लाने के वादे के साथ सत्ता में आए थे.
उन्होंने अपने चुनाव प्रचार के दौरान विकास में आने वाली प्रशासनिक अड़चनों को हटाने के वादे किए थे.
शपथ ग्रहण के तुरंत बाद उनके कुछ निर्णयों से लोगों और उद्योग जगत में इस ओर उम्मीद बढ़़ी थी.
अब मोदी को प्रधानमंत्री कार्यालय संभाले एक साल पूरा होने वाला है, ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि इस दरम्यान लालफ़ीताशाही में क़ितना बदलाव आया.
बीबीसी संवाददाता ज़ुबैर अहमद ने पूर्व कैबिनेट सचिव सुरेन्द्र सिंह से बात की और जानने की कोशिश की कि सुशासन के चुनावी वादों में से मोदी सरकार ने एक साल में कितने वादे पूरे किए और कितने पूरे न हो सके.
वो वादे जो एक साल में पूरे हुए

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1. प्रशासन में पारदर्शिता: प्रशासन में पारदर्शिता लाना एक अहम चुनावी वादा वादा था. जैसे जैसे ई-गवर्नेंस की तरफ क़दम उठाए जा रहे हैं वैसे वैसे पारदर्शिता बढ़ती जा रही है
2. केंद्र-राज्य सरकार रिश्ते: केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों के संसाधनों का आवंटन बढ़ा दिया है. अब राज्य सरकारें फैसला कर सकती हैं कि वो विकास के जिस प्रोजेक्ट पर चाहें खर्च कर सकती हैं.
पहले योजना आयोग की तरफ से सभी फंड्स का वितरण होता था और केंद्रीय सरकार आयोग के ज़रिए कोई योजना शुरू कर देती थी.
3. नीति आयोग का गठन: योजना आयोग की जगह पर नीति आयोग बना है लेकिन उसकी भूमिका अब तक साफ़ नहीं हुई है.
4. ई-फॉर्म की सुविधाएं: पहले कोई उद्योग लगाने में कई फॉर्म भरने पड़ते थे. अब औद्योगिक नीति और संवर्धन विभाग ने इनसब को जोड़कर एक फॉर्म कर दिया है. वो भी ई-फॉर्म के रूप में.
5. कानूनी सुधार: ऐसे बहुत से क़ानून थे जो पुराने हो चुके हैं और जिनसे फ़ायदा होने के बजाय नुकसान होता था और जिन्हें बदलने की या हटाने की ज़रूरत थी.
मोदी सरकार ने ऐसे क़ानूनों की पहचान की है, ताकि उन्हें हटाया जा सके.
वादे जो अब तक पूरे नहीं हो सके

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1. सत्ता का विकेन्द्रीकरण: ये वादा पूरा नहीं हुआ है. इसपर काम हो रहा है. ये एक लम्बा काम है.
राज्य सरकारों को ज़्यादा अधिकार देने के लिए संविधान के केंद्रीय और समवर्ती लिस्टों में से कई 'सब्जेक्ट' 'स्टेट' लिस्ट में लाना होगा, जिसके लिए संविधान में काफी बदलाव करने होंगे.
2. मोदी वन-मैन बैंड हैं: सत्ता का केंद्रीकरण होता जा रहा है, ऐसा हमने भी सुना है और ये काफी हद तक सही है.
इससे एक फायदा ये है कि जिस काम पर फोकस करो जल्द हो जाता है, लेकिन नुकसान ये है कि कई लोग सशक्त महसूस नहीं करते. इस कमी को दूर करने की ज़रूरत है.
3. कई राज्य सरकारें केंद्र से असहमत: ये असहमति कोई नई चीज़ नहीं है, लेकिन इस सरकार ने इस असहमति को दूर करने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया है. हालांकि केंद्र में जो पार्टी सत्ता में होती है राज्य में अलग पार्टियों की सरकारें उससे अक्सर खुश नहीं होती हैं.
4. वित्तीय क्षेत्रः कुछ सुधार होने थे जो नहीं हो सके. गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (जीएसटी) क़ानून के अंतर्गत कई वस्तुओं को नहीं लाया गया.
दूसरे ये कि हमें उम्मीद थी कि ये 2015 में लागू हो जाएगा, लेकिन ऐसा अगले साल ही हो पाएगा. उधर श्रम और संबंधित क्षेत्रों में सुधार होना था जो अब तक नहीं हो सका है.
(सुरेन्द्र सिंह से ज़ुबैर अहमद की बातचीत के आधार पर)
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