उपलब्धि क्यों है आईएएस बनना?

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- Author, मधुकर उपाध्याय
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के नतीजे आने पर इस साल भी वही हुआ जो हर बार होता है.
बल्कि ख़बरों और सुर्ख़ियों के हिसाब से पहले से कुछ ज़्यादा.
अख़बारों में दो दिन पहले से ख़बरें छप रही थीं कि नतीजे परसों आने वाले हैं, कल आने वाले हैं.
फिर नतीजे आए तो उनका लिंग, जाति, वर्ग, वर्ण और क्षेत्र की दृष्टि से इतनी तरह से विश्लेषण हुआ, इतनी तस्वीरें, इतने इंटरव्यू छपे कि पन्ने भर उठे.
समाचार चैनलों ने उसे पहली ख़बर बनाया और सोशल मीडिया भी यश-गान में पीछे नहीं रहा. ज़ाहिर है इसमें ज़्यादातर समाचार सकारात्मक थे.
जश्न क्यों?

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सोशल मीडिया पर एक ब्लॉगर नदीम अख़्तर ने लिख दिया कि यह अधिकतम एक व्यक्तिगत उपलब्धि है, इस पर जश्न क्यों?
इस टिप्पणी पर कुछ प्रतिक्रियाएं सहमति की थीं लेकिन उनकी लानत-मलामत भी ख़ूब हुई. कहा गया कि इसके लिए कितनी मेहनत करनी पड़ती है, आपको इसका अंदाज़ा नहीं है.
लेकिन सवाल वाजिब था और पूछा जाना चाहिए था.
यह सवाल सौ साल पहले भारतीय सिविल सेवा (आईसीएस) में शामिल हुए नानालाल मेहता ने भी पूछा था और महात्मा गांधी ने सार्वजनिक मंच से उसका विस्तार से उत्तर दिया था.
सौ साल पुराना सवाल

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अट्ठाईस नवंबर, 1915 को नानालाल के पिता ने अपने पुत्र की सफलता पर अहमदाबाद में भव्य आयोजन किया.
परिवार के लोग तो थे ही, नगर की सारी नामी-गिरामी हस्तियां मौजूद थीं. गांधी को, जो कुछ महीना पहले दक्षिण अफ्रीका से लौटे थे, वक्ता के रूप में आमंत्रित किया गया था.
नियमित डायरी लिखने वाले गांधी ने उस दिन कुछ नहीं लिखा.
पन्ना ख़ाली छोड़ दिया पर उस रोज़ खचाखच भरे सभागार में पैंतालीस साल के गांधी ने जो कहा, आज भी उतना ही तर्कसंगत लगता है जितना तब रहा होगा.
नानालाल समझ नहीं पा रहे थे कि आईसीएस बनने पर ‘जश्न’ क्यों होता है? लोग ख़ुश क्यों हो जाते हैं? उन्होंने यह सवाल मंच पर अपने बगल बैठे गांधी से पूछा.
गांधी का जवाब
नानालाल के प्रश्न का उत्तर देते हुए गांधी ने कहा,"मैं जानता हूं कि जो मैं कहने जा रहा हूं, जश्न के माहौल में आपको पसंद नहीं आएगा लेकिन मैं वही कहूंगा जो महसूस करता हूं. आप पूछ सकते हैं कि यही कहना था तो मैं यहां आया क्यों? तो मैं इसका भी जवाब दूंगा."
उन्होंने कहा, "आप सब बहुत प्रसन्न हैं और मैं यह देखकर ख़ुश हूं कि आप भाई नानालाल का सम्मान कर रहे हैं. उन्होंने सफलता प्राप्त की है और उनका सम्मान बनता भी है. लेकिन मैं नहीं चाहूंगा कि कोई दूसरा छात्र उनका अनुसरण करके सिविल सेवा में आए."
'ठप्पा'

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सिविल सेवा को मात्र ‘ठप्पा’ करार देते हुए गांधी ने कहा कि छात्रों को देश सेवा के लिए सिविल सेवा के अधिकारियों को उदाहरण मानने की जगह दादाभाई, गोखले और फ़िरोज़शाह मेहता के उदाहरण से शिक्षा लेनी चाहिए.
उन्होंने कहा, ‘नानालाल के पिता ने उन्हें ‘सिविलियन’ बनाने के लिए तीस हज़ार रुपये ख़र्च किए.
इस राशि का वे बेहतर इस्तेमाल कर सकते थे. इससे नानालाल ज़रूर आम आदमी रह जाते पर वह भारत की ज़्यादा अच्छी सेवा कर पाते.’
गांधी ने कहा, "चमड़े का काम करने वाले भोजा भगत और सुनार अक्खा भगत ने अपना काम करते हुए आम लोगों की सेवा की. अगर मन में सेवा भाव हो तो भारी-भरकम डिग्री या ठप्पे की अनिवार्यता नहीं होती. नानालाल ‘सिविलियन’ न होते तो भी सिविल सेवा बखूबी कर सकते थे."
'देश सेवा अहम'

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गांधी का कहना था कि ‘सिविलियन’ भारत में बड़ी संख्या में आते रहे हैं और आगे भी आएंगे लेकिन ऐसा लगता नहीं कि वे देश के लिए उपयोगी रहे हैं या उन्होंने कभी देश सेवा की है.
उन्होंने कहा, "आज पूरे देश में डर का माहौल है. इतना डर कि हम अपने विचार व्यक्त करने से भी घबराते हैं. हमें ऐसी शिक्षा चाहिए जो डर का माहौल ख़त्म कर दे. हमें निडर बनाए."
श्रोताओं की असहज स्थिति को देखते हुए गांधी ने कहा, "मेरी बातों में आपको जो ठीक लगे स्वीकार कर लीजिएगा. जो कूड़ा-करकट लगे हॉल की खिड़की से बाहर फेंक दीजिएगा. मुझे दोनों स्थितियों में कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा."
भाषण के अंत में गांधी ने उम्मीद ज़ाहिर की कि नानालाल लोगों की सेवा करेंगे और समझेंगे कि आम लोग अधिकारियों के ग़ुलाम नहीं हैं बल्कि अधिकारी उनके सेवक हैं.
उन्होंने कहा, "अगर नानालाल इसमें कामयाब हों तो मुझे प्रसन्नता होगी. लेकिन अगर वे दूसरे अधिकारियों की तरह विफल हो जाते हैं तो हम दोनों को प्रायश्चित करना होगा. नानालाल को अपनी नाकामयाबी के लिए और मुझे इस समारोह में आने और इसे संबोधित करने के लिए."
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