डल झील के किनारे 'सबसे लंबे' इफ़्तार की तैयारी

- Author, रियाज़ मसरूर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, श्रीनगर
भारत प्रशासित कश्मीर में संयुक्त अरब अमरीत में बने सबसे लंबी इफ़्तार पार्टी का रिकॉर्ड तोड़ने की तैयारी की जा रही है.
शनिवार शाम को श्रीनगर की डल झील के किनारे ये रिकॉर्ड बनाने का प्रयास किया जाएगा.
आयोजन कर रही कंपनी लाउड बीटल के 22 साल के प्रमुख अहमर ख़ान के लिए डल झील के किनारे एक मील लंबा दस्तरख़ान बिछाने के बजाए श्रीनगर में शाम की संस्कृति को बढ़ावा देवा ज़्यादा अहम है.
अहमर कहते हैं, "ये भूतहा शहर जैसा हो जाता है. सूरज छिपते ही लोग गायब हो जाते हैं और सड़के सूनी हो जाती हैं. मेरे पिता मुझे याद दिलाते रहते हैं कि किसी ज़माने में कश्मीर की शामें कितनी ख़ूबसूरत हुआ करती थीं. मैं ज़िंदग़ी की उस ख़ूबसूरती को वापस लौटाना चाहता हूँ."

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अहमर और उनके चार सहयोगी क़रीब 500 स्वयंसेवकों का सहयोग जुटाने में कामयाब रहे हैं.
ये लोग अब तैयारियों को अंतिम रूप दे रहे हैं. डल झील के किनारे एक मील लंबा दस्तरख़ान बिछाया जा रहा है.
एशिया में सबसे लंबी इफ़्तार
शाम को जब सूरज छुपेगा और रोज़ा इफ़्तार का वक़्त होगा तो एशिया की सबसे लंबी इफ़्तार पार्टी का रिकॉर्ड बनाने की कोशिश की जाएगी.
इस इफ़्तार में क़रीब तीन हज़ार लोग शामिल हो सकते हैं. यह एशिया की सबसे बड़ी इफ़्तार पार्टी होगी. दुबई में इफ़्तार के लिए सवा किलोमीटर लंबी मेजें सजाई गईं थीं.
श्रीनगर में 1.7 किलोमीटर लंबा दस्तरख़ान सजाया जा रहा है. इफ़्तार में सभी वर्गों के लोगों के शामिल होने की उम्मीद है.

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अहमर का कहना है कि उन्होंने खुले में इफ़्तार करने की अनुमति लेने के सिवा सरकार से किसी भी तरह की मदद नहीं ली है. उन्होंने कहा, "मेरे दोस्त और उद्यमी व्यवस्था करने में मदद कर रहे हैं. हमने खजूर, जूस और फ्राइड राइस की व्यवस्था की है."
उन्होंने कहा कि कुछ निजी ऑपरेटरों ने लोगों के आने-जाने में मदद करने की पेशकश की है.
श्रीनगर की सूनसान शामें

1989 में कश्मीर में भारतीय प्रशासन के ख़िलाफ़ व्यापक सशस्त्र विद्रोह हुआ था. 1990 के दशक में पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान में प्रशिक्षित कश्मीरी लड़ाके भारतीय सेना के ख़िलाफ़ हमले करते थे.
इसके बाद से कश्मीर में लंबे कर्फ्यू लगना आम बात हो गई. युद्ध जैसी स्थितियों में कश्मीरी लोगों को दिन ढलने से पहले घर लौटने की आदत हो गई.
कश्मीर में हिंसा अभी भी जारी है हालांकि घटनाएं ज़्यादातर दूरस्थ इलाक़ों में होती हैं. बड़े शहर और क़स्बों में कुछ हद तक शांति हैं.

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लेकिन बावजूद इसके जल्द घर लौटने की लोगों की आदत बनी हुई है.
आयोजन में मदद कर रहे शकील हसन कहते हैं, "ये हालात बदलने चाहिए क्योंकि ये हमारे समाज के लिए अच्छे नहीं हैं. हमें इस बात की फ़िक्र नहीं है कि हम दुबई का रिकॉर्ड तोड़ पाएंगे या नहीं. हम चाहते हैं कि इसके बाद लोगों में शाम के वक़्त घर से निकलने का ट्रेंड शुरू हो. कश्मीर शाम के बाद मुर्दा सा लगता है. अब ये हालात बदलने चाहिए."
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