'यूपी को साढ़े चार मुख्यमंत्री चला रहे हैं'

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- Author, अनिल यादव
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
भारत के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव की तैयारियां शुरू होने के साथ युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के राजनीतिक करियर का सबसे मुश्किल दौर शुरू हो गया है.
पिछला चुनाव समाजवादी पार्टी ने उनके चेहरे पर लड़ा था, इस बार भी वही चेहरा होगा, लेकिन उसकी संभावनाओं का परीक्षण हो चुका है.
राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि उन्हें एक ऐसी सरकार के कामकाज के आधार पर चुनाव लड़ना है जिसे चलाने और फैसले लेने में उनका योगदान सबसे कम रहा है.
सवा तीन साल पहले उनके सत्ता संभालने के समय से विपक्ष लगातार कह रहा है कि यूपी को साढ़े चार मुख्यमंत्री चला रहे हैं.

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पहले चार मुलायम सिंह यादव, शिवपाल सिंह यादव, रामगोपाल यादव, आजम खां और बाकी आधे वे खुद हैं.
इन सत्ता केंद्रों की खींचतान में अखिलेश को वह करने का मौका ही नहीं मिल पाया जिसकी उम्मीद उन्होंने माफ़िया डीपी यादव को पार्टी में लेने से इनकार करके जगाई थी.
उन्होंने आधुनिक विज़न, तकनीक और युवाओं की उर्जा के मेल से यूपी में करिश्मा करने की संभावना पैदा की थी, लेकिन वह मजबूरी, विनम्रता और संयम से सहानुभूति अर्जित करने से आगे नहीं जा पाए.
संतुलन

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विपक्ष के आरोप बिल्कुल बेबुनियाद नहीं हैं. सरकार के अंतर्विरोधों का पता तब चलता है जब सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव बीच बीच में सार्वजनिक तौर पर कहने लगते हैं कि यदि वे मुख्यमंत्री होते तो एक पखवाड़े में सूबे की कानून-व्यवस्था दुरूस्त कर देते, मंत्री और पदाधिकारी पैसा बनाने में लगे हैं या कुछ बड़े अफसर सरकार को धोखा दे रहे हैं.
फिर अचानक वह सरकार को पूरे नंबर देते हैं और सबकुछ ठीक हो जाता है. राजनीतिक प्रेक्षकों का कहना है ऐसा उन्हें पार्टी और सरकार में डांवाडोल शक्ति संतुलन को ठीक करने के लिए करना पड़ता है.
अखिलेश यादव ने चुनावी तैयारी के लिए कार्यकर्ताओं से संवाद बढ़ा दिया है और सरकार के कामों की आक्रामक मार्केटिंग शुरू कर दी है.
इसी बीच बसपा प्रमुख मायावती ने दिल्ली छोड़ ज़्यादा समय यूपी में देना शुरू किया है और भाजपा ने सरकार पर हमले तेज कर दिए हैं.
अपराध और भ्रष्टाचार

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अखिलेश का जोर राजधानी में मेट्रो रेल, कुशीनगर में एयरपोर्ट, कैंसर इंस्टीट्यूट, ट्रिपल आईटी और लखनऊ-आगरा एक्सप्रेस वे जैसे कामों पर है.
लेकिन सबसे बड़े मुद्दे अपराध, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी बने हुए हैं जिनके खात्मे के वादे पर पिछला चुनाव उन्होंने मायावती के ख़िलाफ़ लड़ा था.
सपा सरकार में युवाओं के लिए सीमित रोजगार के मौके तो बने, लेकिन उनमें से कोई एक भी ऐसा नहीं था जिसमें नौकरियां बेचने के आरोप न लगे हों.
भ्रष्टाचार न होने का दावा करते हुए हाल ही में ताकतवर मंत्री शिवपाल सिंह यादव ने बयान दिया था, "अगर सड़कों में गड्ढे मिले तो वह इंजीनियरों को उन्हीं गड्ढों में फेंक देंगे."
मीडिया ने जब हर जिले के गड्ढे दिखाने शुरू किए तो उन्हें चुप रह जाना पड़ा.

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दूसरी तरफ पत्रकार जगेंद्र सिंह को जलाकर मारने में एक मंत्री राममूर्ति वर्मा का नाम आने से सपा में अपराधियों का मुद्दा सबसे ऊपर आ गया है.
यही मायावती के भी कार्यकाल के आखिरी दौर में हुआ था.
अखिलेश यादव का कहना है कि उनकी सरकार ने बहुत काम किए हैं बस कसर उनकी मार्केटिंग में रह गई है.
सो अब से चुनाव तक उनका सारा जोर विज्ञापनों के जरिए विरोधियों को जवाब देने पर रहेगा.
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