आसमान से ऐसे ज़मीन पर आए ललित मोदी

ललित मोदी, वसुंधरा राजे
    • Author, अयाज़ मेमन
    • पदनाम, क्रिकेट एक्सपर्ट

शायद ललित मोदी और सुषमा स्वराज को लेकर सबसे पहले ख़बर छापने वाले लंदन के संडे टाइम्स अख़बार के संपादकों को भी इसका अंदाज़ा नहीं होगा कि इस ख़बर का क्या असर होगा.

ख़बर छपने के एक हफ़्ते के अंदर भारत के कई ताकतवर नेताओं की साख को झटका लगा और नरेंद्र मोदी की एनडीए सरकार भी मुश्किल में नज़र आ रही है.

संसद के मानसून सत्र के हंगामेदार रहने के आसार हैं.

निश्चित तौर पर सबसे ज़्यादा नुकसान भारतीय जनता पार्टी को पहुंचा है. विदेश मंत्री के अलावा अब भारतीय मीडिया की पड़ताल और ललित मोदी के इंटरव्यू से राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे भी विवाद में फंस गई हैं.

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सत्ता और व्यापार का साथ

ये प्रधानमंत्री के लिए दोहरी मुश्किल है जो कि अपनी चुप्पी की वजह से सब तरफ़ से हमले झेल रहे हैं.

शायद वो भी इस बात से हैरान हैं कि कितनी तेज़ी से और नुकसान पहुंचाते हुए ये ख़बर आगे बढ़ी है, साथ ही ये भी कि क्रिकेट, बड़े कारोबार और राजनीति किस हद तक भारत में एक दूसरे से उलझे हुए हैं.

भारतीय क्रिकेट के पिछले एक दशक के प्रशासकों पर सरसरी निगाह डालें तो नेता और कारोबारी दोनों दिखाई देते हैं.

पूर्व केंद्रीय मंत्री एसके वानखेड़े (जिनके नाम पर मुंबई में स्टेडियम है), एनकेपी साल्वे और माधवराव सिंधिया के नाम एमए चिदंबरम, एम चिन्नास्वामी और एस श्रीरामन जैसे कारोबारियों के साथ बीसीसीआई अध्यक्षों की सूची में दिखते हैं.

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ये लोग राजनीति और कारोबार की दुनिया से आने वाले मौजूदा प्रशासकों से कैसे अलग हैं? जो लोग पहले के दौर के क्रिकेट प्रशासकों से वाकिफ़ हैं वो दावे के साथ कहेंगे कि पहले के प्रशासक सत्ता और कुछ यश चाहते थे लेकिन खेल के लिए उनकी प्रतिबद्धता सबसे ऊपर थी.

पहला गेमचेंजर

पुराने लोग कहेंगे कि वो लोग पहले खेल को बढ़ावा देने वाले थे, निजी हितों के बारे में बाद में सोचते थे.

नेता खेल से जुड़े मसले और सरकार से आने वाली समस्याओं से पार पा लेते थे (यहां ग़ौर करने वाली बात है कि ऊपर जिन नेताओं के नाम हैं वो सभी कांग्रेस से थे), जबकि कारोबारी अपने संबंधों और कभी-कभी अपने पैसे का इस्तेमाल कर भारतीय क्रिकेट को आर्थिक तौर पर डूबने से बचाते थे.

तर्क के लिए ही सही, पहले का प्रशासन ज़्यादा आशावादी दिखता था क्योंकि हालात अलग थे.

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पहला गेमचेंजर था 1983 में भारत का विश्व कप जीतना. इससे न सिर्फ़ देश में क्रिकेट के लिए उन्माद का माहौल बना बल्कि आर्थिक समर्थन देने वाले भी आ गए.

साल 1991 में अर्थव्यवस्था के खुलने से क्रिकेट को बहुत बढ़ावा मिला. भारतीय क्रिकेट के टीवी प्रसारण अधिकारों के लिए लाखों डॉलर मिलने लगे और भारत क्रिकेट के लिए सोने की खान बन गया.

भारत का क़द कितनी तेज़ी से बढ़ा, ये तब साफ़ दिखता था जब डालमिया आईसीसी के अध्यक्ष बने.

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक नया सत्ता समीकरण उभरा लेकिन भारतीय क्रिकेट में भी हालात तेज़ी से बदल रहे थे.

बीसीसीआई का ख़ज़ाना उफ़ान पर था और सत्ता के लिए संघर्ष शुरू हो गया. दशकों तक साथ रहे डालमिया और बिंद्रा के संबंध बिगड़ गए, ये संबंध आज तक नहीं सुधरे.

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दूसरा गेमचेंजर

बीसीसीआई के प्रशासन में नए लोग आए: सभी दलों के नेता थे जो क्रिकेट को सैकड़ों करोड़ रुपए नियंत्रित करने और जनता पर पकड़ बनाने के ज़रिए के तौर पर देखते थे.

ऐसे में क्रिकेट से लंबे अरसे से जुड़े रहने के बावजूद डालमिया, मुथैया और एन श्रीनिवासन जैसे कारोबारियों को ख़ुद को बचाने के लिए नेताओं से संबंध मज़बूत करने पड़े.

भारतीय क्रिकेट उथल-पुथल के दौर से गुज़र रहा था; नए किस्म के मूल्य बन रहे थे. एक दशक के अंदर भाजपा, नेशनल कॉन्फ़्रेंस, एनसीपी, राष्ट्रीय जनता दल, शिवसेना जैसे दलों ने या तो राज्य क्रिकेट संघों पर कब्ज़ा कर लिया था या कब्ज़े के लिए संघर्ष कर रहे थे.

दूसरा और ज़्यादा बड़ा गेमचेंजर था इंडियन प्रीमियर लीग.

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इसकी शुरुआत साल 2008 में हुई थी. आईपीएल का ढांचा क्रिकेट, राजनीति और मोटे पैसे के इर्दगिर्द बना था. इस सबको इस जादुई तरीके से दुनिया भर के दर्शकों को बेचा गया था कि जल्दी ही आईपीएल दुनिया की छठी सबसे कीमती खेल संपत्ति बन गया.

आईपीएल के बाद सत्ता के समीकरण और तेज़ी से बदले. भारतीय क्रिकेट करोड़ों डॉलर से अरबों डॉलर का बन चुका था. इसमें कई लोग हिस्सेदार थे और सब हमेशा सहमत नहीं होते.

ललित मोदी का उभार

ऐसे हालात में ललित मोदी का उभार हुआ. एक कारोबारी घराने के वारिस ललित की महत्वाकांक्षा अपनी छाप छोड़ने की थी. युवा, ऊर्जा से लबरेज़ और शानदार आयोजक ललित जल्दी ही भारतीय क्रिकेट में बेहद अहम बन गए.

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उन्हें तमाम मुश्किलों के बावजूद आईपीएल की शुरुआत का काम दिया गया था जो उन्होंने इतने बढ़िया तरीके से किया कि वो न सिर्फ़ लीग का चेहरा बने बल्कि भारतीय क्रिकेट में सबसे ताक़तवर हस्ती बन गए.

ललित की दोस्ती रईसों और मशहूर लोगों से थी. कुछ समय तक उन्होंने बीसीसीआई के सभी राजनीतिक अंतर्विरोधों को भी बखूबी संभाला.

वो शरद पवार के भी अच्छे दोस्त थे और शशि थरूर (कुछ समय तक) के भी, हालांकि वो ख़ुद को भाजपा समर्थक कहते थे.

उनका ऐसा दबदबा था कि वो अरुण जेटली और पी चिदंबरम का विरोधी होने का भी साहस कर सके.

पतन

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विश्लेषक मानते हैं कि ललित का पतन उनके घमंड की वजह से हुआ.

उन्होंने नियमों का सम्मान नहीं किया, दोस्तों को ये सोचकर दुश्मन बना लिया कि क्रिकेट की बड़ी हस्ती होने और बड़े लोगों से रिश्तों की वजह से उन्हें कोई नहीं हरा सकता. लेकिन जब मुश्किल वक़्त आया तो उन्हें बेरहमी से हटा दिया गया.

तब से अब तक भारतीय क्रिकेट, ख़ास तौर पर आईपीएल, कई विवादों से दोचार हुआ है. इसमें एन श्रीनिवासन जैसे कई बड़े विकेट गिरे हैं. श्रीनिवासन को बीसीसीआई अध्यक्ष पद से हटना पड़ा हालांकि वो आईसीसी के चेयरमैन बने हुए हैं.

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लेकिन मौजूदा संकट के सामने वो सब भी कुछ नहीं. देश छोड़ने को मजबूर और ग़ुस्से से खौलते हुए ललित मोदी अब बदला लेते हुए नज़र आ रहे हैं, कुछ-कुछ किसी भटकी हुई मिसाइल की तरह.

कोई नहीं जानता कि जाने अनजाने उनका निशाना कौन बनेगा. इतना साफ़ है कि उन्होंने न सिर्फ़ भारतीय क्रिकेट बल्कि सरकार को भी मुश्किल में डाल दिया है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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