कैसे बन गया कोटा कोचिंग का अड्डा

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- Author, कपिल भट्ट
- पदनाम, जयपुर से, बीबीसी हिन्दी के लिए
राजस्थान का कोटा पूरे देश में आईआईटी और मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी का गढ़ बन चुका है. एक अनुमान के मुताबिक ये कारोबार क़रीब हज़ार करोड़ से अधिक का हो चुका है.
इस कारोबार की नींव रखी एक ऐसे व्यक्ति ने जिसने लालटेन की रोशनी में पढ़ाई की और जिसे एक लाइलाज बीमारी के कारण अपनी अच्छी-ख़ासी नौकरी छोड़नी पड़ी.
"जब मैं पढ़ता था तो हमारे घर में बिजली नहीं थी. केरोसिन तेल की बदबू के बीच लालटेन की रोशनी में पढ़ाई होती थी. मेरी आंखें जब इस बारे में सवाल पूछ रही होतीं तो पिताजी कहते कि बेटा खूब पढ़ोगे, आगे बढ़ोगे तभी तुम्हारे घर में बिजली आएगी. बस बिजली के उजियारे की चाहत ने मुझमें मेहनत करने की ताकत भर दी."
ये बताते समय कोचिंग कारोबार के जनक माने जाने वाले वीके बंसल की आंखें व्हीलचेयर पर बैठे बैठे चमक उठती हैं.
कल का नहीं सोचा

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वीके बंसल कहते हैं, "मैंने हमेशा परिश्रम को तव्वजो दी. मैने कभी नहीं सोचा कि कल क्या होगा."
बंसल को कोटा में हज़ार करोड़ से ज्यादा के कोचिंग उद्योग की बुनियाद रखने का श्रेय दिया जाता है.
कोटा की जेके सिंथेटिक्स फैक्ट्री में सहायक इंजीनियर बंसल को मस्क्यूलर डिस्ट्रोफी नामक बीमारी के कारण 1991 में नौकरी से रिटायरमेंट लेना पड़ा.
उसके बाद उन्होंने बसंल क्लासेज़ की शुरुआत बहुत छोटे स्तर पर की. नौकरी के दौरान भी वो घर पर बच्चों को ट्यूशन पढ़ाया करते थे.
कोचिंग संस्थान के पहले ही साल में बंसल के 10 छात्रों का आईआईटी में चयन हो गया.
उसके अगले साल उनके 50 छात्र आईआईटी में चुने गए. बस इसके बाद तो कारवां चल पड़ा.
हज़ार करोड़ का कारोबार

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बंसल की कामयाबी से प्रेरित होकर कोटा में एक के बाद एक कोचिंग खुलते चले गए. आज यह शहर भारत का सबसे बड़ा कोचिंग का अड्डा बन चुका है.
यहां देश भर से छात्र इंजीनियरिंग और मेडिकल की प्रतियोगी परिक्षाओं की तैयारी के लिए आते हैं.
कोटा के कोचिंग संस्थानों का कुल कारोबार कितना होगा इसके बारे में कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं हैं.
यहां के प्रमुख कोचिंग संस्थान रेजोनेंस के मैनेजिंग डायरेक्टर आरके वर्मा के कहते हैं, "कोटा के कोचिंगों में इस समय क़रीब सवा लाख बच्चे पढ़ रहे हैं. एक बच्चे की सालाना औसत कोचिंग फ़ीस 75 हज़ार रुपए होती है. यहाँ रहने में होने वाले बाक़ी ख़र्चे औसतन सवा लाख रुपए ले लें तो हर बच्चा सालाना कम से कम दो लाख रुपए ख़र्च करता है."
वर्मा कहते हैं, "क़रीब 25 अरब रुपए का सालाना कारोबार तो इन दो मदों से ही हो जाता है."
बंसल की राह पर

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आरके वर्मा ने अपना करियर 1995 में बंसल क्लासेज़ में फिजिक्स पढ़ाने के साथ शुरू किया था. उनकी कामयाबी भी वीके बंसल जैसी ही है.
सन 2001 में उन्होंने नौकरी छोड़कर रेजोनेंस नामक अपना कोचिंग संस्थान शुरू किया. आज देश के तीस शहरों में इसकी शाखाएं हैं जिनमें क़रीब साठ हज़ार छात्र पढ़ते हैं.
वर्मा अब कोटा में ही अपनी यूनिवर्सिटी खोलने की योजना बना रहे हैं. करियर प्वांइट नामक संस्थान कोटा में अपनी यूनिवर्सिटी पहले ही शुरू कर चुका है.
कोटा में दर्जनों बड़े कोचिंग संस्थानों के अलावा बड़ी संख्या में छोटे कोचिंग संस्थान और निजी शिक्षकों का कारोबार पनप चुका है.
बड़े कोचिंग संस्थानों में पढ़ाने वालों को मोटा सालाना पैकेज मिलता है. बहुत से शिक्षकों का पैकेज तो एक करोड़ सालाना से ज्यादा है.
दूसरे कारोबार

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कोचिंग से कोटा के रियल स्टेट कारोबार को भी पंख लग गए. छात्रों के रहने के लिए हॉस्टलों का कारोबार ज़बरदस्त उफान पर है.
जवाहर नगर थाना के पुलिस अधिकारी भगवत सिंह हिंगड़ बताते हैं कि उनके इलाक़े के राजीव गांधी नगर में ही 525 हॉस्टल हैं जिनमें 25 हज़ार से ज्यादा छात्र रहते हैं.
पूरे कोटा में हॉस्टलों की संख्या का कोई पुख्ता आंकड़ा नहीं है. बडी तादाद में छात्र घरों में पेइंग गेस्ट के रूप में भी रहते हैं.
पत्रकार प्रद्युमन शर्मा कहते हैं कि कोचिंग ने इस शहर की तस्वीर पूरी तरह से बदल दी है.
शर्मा कहते हैं, "होस्टल संचालकों से लेकर बढ़ई-पेंटर और ऑटोरिक्शा वाले तक की किस्मत चमक गई. कोटा की पूरी अर्थव्यस्था कोचिंग पर ही निर्भर हो गई है."
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