घोटाला जिसमें एक के बाद एक मर रहे हैं लोग

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- Author, राजेश चतुर्वेदी
- पदनाम, भोपाल से, बीबीसी हिंदी के लिए
यह मध्य प्रदेश के लिए कोलगेट, टूजी या सीडब्ल्यूजी से क़तई कम नहीं है.
बात केवल इतनी भर नहीं है कि मध्य प्रदेश के राज्यपाल केवल इसलिए अभियुक्तों की सूची में आने से बचे क्योंकि अदालत ने कहा कि उन्हें पद के कारण अभियुक्त नहीं क़रार दिया जा सकता.
खुद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने विधानसभा के फ़्लोर पर स्वीकारा कि 1,000 सरकारी नियुक्तियों में गड़बड़ी हुई है.
इसके अलावा सरकारी मेडिकल कॉलेजों में कई सालों तक प्रवेश परीक्षाओं में बड़े पैमाने पर घोटाला होता रहा है. जिन छात्रों का इसका नुक़सान हुआ या जिन लोगों को नौकरियां नहीं मिलीं उनके बारे में तो बात अभी शुरू हुई ही नहीं है.
यह है कौन सा घोटाला?

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यह घोटाला मध्य प्रदेश में व्यापमं घोटाला कहा जाता है. व्यापमं दरअसल व्यावसायिक परीक्षा मंडल का शॉर्टफ़ॉर्म है. व्यावसायिक परीक्षा मंडल मध्य प्रदेश में प्री मेडिकल टेस्ट, प्री इंजीनियरिंग टेस्ट और कई सरकारी नौकरियों के लिए परीक्षाएं करवाता है.
इन परीक्षाओं में जमकर भ्रष्टाचार हुआ और हर साल मेडिकल की सरकारी सीटें और सरकारी नौकरियां बेची जाती रहीं.
पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने कहा था कि अगर इसकी सीबीआई से जांच कराई जाए तो यह बिहार के चारा घोटाला को भी मात कर देगा और कई बड़े लोग इसमें अंदर जाएंगे.
भारती की यह प्रतिक्रिया और मांग इतनी असरकारक थी कि तत्कालीन डीजीपी नंदन दुबे को भोपाल में उनके बंगले पर जाकर यह भरोसा दिलाना पड़ा कि व्यापमं घोटाले में उनका नाम नहीं है.
जांच पुलिस ने शुरू की, सीबीआई से जांच की तमाम मांगें ठुकरा दी गईं. अब राज्य पुलिस की ही एक स्पेशल टास्क फ़ोर्स पूरे घोटाले की जांच मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की निगरानी में कर रही है.
किस-किस पर लगे आरोप?

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सबसे बड़ा नाम तो मध्य प्रदेश के राज्यपाल राम नरेश यादव और उनके एक बेटे का था.
राज्यपाल के ख़िलाफ़ एफ़आईआर हाईकोर्ट ने मई 2015 में यह कहकर रद्द करवा दी कि राज्यपाल को पद के नाते संवैधानिक सुरक्षा मिली हुई है.
पुलिस चाहे तो उनके कार्यकाल की समाप्ति के बाद उन पर मुक़दमा दर्ज कर सकती है. यादव का कार्यकाल सितम्बर 2016 में समाप्त हो रहा है.
इस बीच राज्यपाल के बेटे, जो फ़रार थे, उनकी लखनऊ के घर में अचानक मौत हो गई.
एक पूर्व मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा और उनके एक ओएसडी जेल में हैं.

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इसके अलावा भारतीय जनता पार्टी के पदाधिकारी, कई सरकारी अफ़सर, कई नेताओं और कई अफ़सरों और नेताओं के रिश्तेदारों के नाम अभियुक्तों की सूची में हैं.
कुल मिला कर अब तक 2,000 लोग गिरफ़्तार किए जा चुके हैं और 600 और गिरफ़्तार किए जाने हैं.
मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री शिवराज सिंह और उनकी पत्नी साधना सिंह का नाम भी लेते हैं और दावा करते हैं कि उनके पास सबूत हैं.

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दिग्विजय सिंह इन सबूतों के साथ अदालत जा चुके हैं.
बात इतनी भर नहीं?
पिछले दिनों जांच कर रही एजेंसी ने एक रिपोर्ट में कहा कि अब तक 32 लोगों की मौत हो चुकी है. ये सभी मौतें ''संदिग्ध हालात'' में हुईं.
मरने वालों में अधिकांश की आयु 30 वर्ष के आसपास थी. 32 मौतों में किस-किस के नाम एसटीएफ़ ने शामिल किए हैं, इसका खुलासा नहीं किया गया है.
मध्यप्रदेश के राज्यपाल के बेटे शैलेष यादव, जो फरार थे, वह अपने पिता के लखनऊ के सरकारी घर में मारे गए.

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इसी तरह नम्रता डामोर जो इंदौर के सरकारी मेडिकल कॉलेज में पढ़ती थीं उनकी लाश रेलवे ट्रैक के नज़दीक मिली. नम्रता का नाम गलत ढंग से मेडिकल कॉलेज में दाखिला लेने वालों में था.
घोटाले की जांच की निगरानी कर रहे जस्टिस चंद्रेश भूषण ने भी मीडिया को सिर्फ इतना बताया कि 30 से अधिक मौतों की जानकारी एसटीएफ ने दी है.
अलबत्ता पुलिस सूत्रों का कहना है कि एसटीएफ ने अब तक जान गंवा चुके सभी 32 लोगों को आरोपी माना है और इन्हें 'रैकेटियर्स' कहा है.
हालांकि एसआईटी को भी यह जानकारी नहीं दी गई है कि इनमें से कितने अभियुक्त बनाए जाने से पहले मरे और कितने उसके बाद.
विधानसभा में विपक्ष के नेता सत्यदेव कटारे का कहना है कि व्यापमं घोटाले से जुड़े लोगों में से अब तक 156 की मौत हो चुकी है.

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कटारे अपने इस दावे के पक्ष में तर्क देते हैं, "मेरी जानकारी के मुताबिक इनमें अभियुक्त, संदेही, व्हिसल ब्लोअर्स, गवाह और घोटाले में शामिल लोगों के रिश्तेदार शामिल हैं."
पर इन नामों के विवरण वाली सूची उनके पास भी नहीं है.
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