बनारस के जयापुर में 'गुजरातियों का दबदबा'

- Author, नितिन श्रीवास्तव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
वाराणसी से मिर्ज़ापुर जाने वाली सड़क पर गेहूँ और सब्ज़ी का लोकप्रिय बाज़ार राजा तालाब नाम से जाना जाता है.
लेकिन इन दिनों इस विशालकाय तालाब को पार करने से पहले ही सड़क के दोनों ओर कोल्ड ड्रिंक्स, ब्रेड और केक वगैरह की दुकानें दिखने लगती हैं.
आपको बस या गाड़ी रोककर किसी से पूछना भर है. अगला आपकी बात काट कर बोल पड़ेगा, "मोदी का गांव आगे से दाईं ओर पड़ता है".
स्वागत है आपका भी, इन दिनों भारत के सबसे वीवीआईपी कहे जाने वाले गाँव, जयापुर, में.
काया पलट

पिछले वर्ष नवंबर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस गाँव को अपने संसदीय क्षेत्र के तहत चुना था.
जयापुर ग्राम प्रधान के प्रतिनिधि नारायण पटेल काफी व्यस्त दिखे क्योंकि उनकी बड़ी एसयूवी में गुजरात और राजस्थान से आए कुछ उद्योगपति गाँव का जायज़ा ले रहे थे.
नारायण पटेल ने गाड़ी से उतरकर कहा, "मोदी जी ने जो कहा था वो कर दिखाया है. आज यहाँ खुशहाली है".
कुछ महीनों पहले तक आस-पास के लोगों ने जयापुर का बस नाम भर सुना था. अब ये पर्यटन स्थल सा होता जा रहा है.
करीब 600 परिवारों के लिए तीन सरकारी बैंक शाखाएं, एक नया पोस्ट ऑफिस, सड़कों पर 135 सोलर लाइटें और दर्जनों बायो-टॉयलेट स्थापित हो चुके हैं.
हर बात में गुजरात

हैरानी की बात ये लगी कि गाँव के विकास में जुटी हर ट्रक या ट्रैक्टर की नंबर प्लेट गुजरात राज्य की थी.
एक बड़े मैदान में विशालकाय सीमेंट से त्रिकोणीय ईंट बनाने की मशीन से सैंकड़ों नईं ईटें साँचे में ढाली जा रहीं थीं.
बगल में खड़े ठेकेदार मनोज अंतला सूरत के रहने वाले हैं और पिछले 42 दिनों से यहीं डेरा डाले हुए हैं.
उन्होंने बताया, "हमें गाँव में करीब 18 किलोमीटर की ईंट वाली सड़क बिछानी है. इस रोड की ख़ास बात है कि ये 40 टन के वज़न के बाद भी ख़राब नहीं होती. हमारा पूरा प्लांट, सामान और मज़दूर गुजरात से आया है."
मनोज ने ये भी बताया कि सभी बायो टॉयलेट और सोलर पैनल बनाने वाले भी गुजराती हैं.
क्या ये सिर्फ इसलिए आए है क्योंकि नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री रह चुके हैं? इस पर मनोज ने कहा, "इस सब के बारे में हमें नहीं पता".
और लोगों से बात करने पर पता चला कि जयापुर में विकास के सभी कार्य नवसारी, गुजरात के सांसद सीआर पाटिल की देख-रेख में हो रहे हैं.
रोज़गार

जयेश वर्मा की तीन पीढ़ियां जयापुर गाँव में ही रहीं हैं.
उन्होंने बताया, "सब कुछ अच्छा है. सुविधा भी मिल रही है. लेकिन साहब ये रोज़ी-रोटी तो नहीं देगा न".
मैंने पूछा, क्या गाँव के सैकड़ों परिवारों में से किसी को इस निरंतर होते विकास में हाथ बंटाने का मौका नहीं मिला?
जयेश ने जवाब दिया, "हम लोग काम करना चाहते हैं. ये जो इंटरलॉकिंग से सड़कें बन रहीं हैं, ये काम हमें भी आता है और हम ठेकेदार है.
लेकिन स्थानीय लोगों को इस विकास की प्रक्रिया में शामिल ही नहीं किया गया है. सब फैसला दिल्ली और गुजरात में ही हो जाता है".
जयापुर गाँव में दाखिल होने वाले रास्ते पर स्टेनलेस स्टील का एक बड़ा-चमचमाता बस स्टॉप बनाया गया है.
उसके बगल में अभी भी एक झोपडी के भीतर वाली दुकान चल रही है.
करीब 70 के एक बुज़ुर्ग चारपाई पर लेटे जयेश से हो रही हमारी बातचीत सुन रहे थे.
विदा लेते समय बोले, "सोलर पैनल वैगेरह लग तो रहे हैं लेकिन इसके रख-रखाव का क्या होगा? क्या इनकी बैटरियां बदलने भी लोग गुजरात से आएँगे? "
<bold>(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां <link type="page"><caption> क्लिक</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi" platform="highweb"/></link> करें. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)</bold>














