बजरंग बली के दरबार में ग़ुलाम अली

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- Author, रोशन कुमार
- पदनाम, वाराणसी से बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
पाकिस्तान से आए ग़ज़ल गायक ग़ुलाम अली ने जैसे ही बनारस के संकट मोचन मंदिर में 'गोरी तोरे नैना' ठुमरी गाना शुरू किया वहां बैठे लोगों की ख़ुशियों को ठिकाना नहीं रहा.
वैसे तो बनारस के संकट मोचन मंदिर में हनुमान जयंती के अवसर पर पिछले 90 से भी अधिक वर्षों से संगीत समारोह का आयोजन किया जाता रहा है और देश-दुनिया के नामचीन कलाकारों ने हाज़िरी लगाई है.
लेकिन ये पहला मौक़ा था जब उस्ताद बिस्मिल्लाह खां के बनारस में पाकिस्तान के किसी फनकार ने अपने सुरों से समां बांधा था.
साध हुई पूरी
पाकिस्तान के जाने माने ग़ज़ल गायक ग़ुलाम अली की आवाज़ के जादू से बनारस अनजान नहीं, लेकिन, उन्हें रुबरु देखने और सुनने की साध इस शहर ने बरसों से छुपाई हुई थी.

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और जब ये आवाज़ बनारस के संकट मोचन मंदिर में गूंजी तो सुनने वाले वाह-वाह करते नहीं थक रहे थे.
कभी ठुमरी... कभी गज़ल... ऐसा लगा मानो ग़ुलाम अली सुरों का ख़ज़ाना बनारस के नाम करने आए हों.
पत्रकारों के राजनीतिक सवालों से तो ग़ुलाम अली बचते रहे, लेकिन इस ख़ास मौके पर उन्होंने संगीत में रुझान रखने वाली नई पीढ़ी को कुछ टिप्स ज़रूर दिए.
ग़ुलाम अली का कहना था, "पहले उर्दू सीखनी चाहिए, फिर क्लासिकल सीखना चाहिए. फिर जो ग़ज़ल जानता हो उससे तालीम लेनी चाहिए."
हनुमान के दरबार में सब एक

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संकट मोचन मंदिर के महंत वीएन मिश्रा ने कहा कि इस संगीत समारोह की ख़ास बात ये है कि समाज की ऊंच-नीच, भेद-भाव और जाति-धर्म भुलाकर भगवान हनुमान के दरबार में सभी एक हो जाते हैं.
महंत वीएन मिश्रा के अनुसार इस समारोह में फ़नकार और श्रोता के बीच की दूरी न के बराबर ही रहती है.
इस यादगार लम्हे का गवाह बनने स्थानीय के अलावा दूर-दराज़ से लोग खिंचे चले आए और सारी रात हज़ारों की संख्या में इस मौक़े का लुत्फ़ उठाया.
इस समारोह में शामिल होने के लिए ख़ास दिल्ली से बनारस जाने वाली एक श्रोता संजिनी ने बीबीसी से अपनी ख़ुशी का इज़हार करते हुए कहा, "ये अवसर बड़ी मुश्किल से मिलता है कि संकट मोचन में हम उनको सुन पाए. एक बहुत ही अलग माहौल है. हम बहुत भाग्यशाली हैं कि उनको लाइव सुन पा रहे हैं."
बनारस को बनाया मुरीद

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एक और श्रोता विशाल ने कहा, "बहुत अच्छा लगा रहा है और आप देख सकते हैं कि कितने उनके चाहने वाले हैं. वो शायद पहली बार बनारस आए हैं हम उन्हें पहली बार सुन रहे हैं."
ऐसा लग रहा था कि ग़ुलाम अली के सुरों ने सरहद और मज़हब की हर दीवार को ख़त्म कर दिया है और इस ख़ास शाम को पूरा बनारस उनकी जादुई आवाज़ का मुरीद हो गया हो.
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