30 साल बाद भी...गंगा तेरी वही कहानी

उत्तर भारत को जीवन देने वाली नदी गंगा का जीवन अब ख़तरे में है.

साल-दर-साल पहले से ज़्यादा प्रदूषित होती जा रही गंगा को साफ़ करने की मुहिम पिछले तीन दशकों से जारी है, लेकिन वह आज भी मैली है.

पिछले साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बनारस में गंगा की सफ़ाई को एक चुनावी मुद्दा बनाया था और वहां से जीत भी हासिल की थी.

लेकिन पिछले दस महीनों में क्या उनके वायदे के मुताबिक गंगा को नया जीवन मिल पाया है?

बीबीसी संवाददाता शालू यादव ने बनारस जाकर स्थिति का जायज़ा लिया.

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गंगा नदी को भारत में बहुत पवित्र माना जाता है
इमेज कैप्शन, गंगा नदी को भारत में बहुत पवित्र माना जाता है

गंगा किनारे सूरज की पहली किरण को पूज कर, लाखों लोग यहां श्रृद्धा की डुबकी लगाते हैं, लेकिन गंगा के ओझल होते अस्तित्व की परवाह शायद ही किसी को हो.

इसमें गंदगी फैलाना जहां कुछ लोगों की आदत है, वहीं कुछ लोगों की ये मज़बूरी भी है.

गंगा किनारे हर दिन हज़ारों धोबी लाखों कपड़े धोते हैं
इमेज कैप्शन, गंगा किनारे हर दिन हज़ारों धोबी लाखों कपड़े धोते हैं

बनारस में रहने वाले धोबी रामचंद्र के घर का चूल्हा गंगा नदी की वजह से जलता है. उन्हें इसमें फैल रहे प्रदूषण की चिंता तो है, लेकिन वो कहते हैं कि इसे साफ़ करने की ज़िम्मेदारी उनसे ज़्यादा सरकार की बनती है.

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, ‘सरकार चाहती है कि यहां घाट पर काम करने वाले सैंकड़ों धोबी यहां से हट जाएं, लेकिन सरकार क्या ये नहीं जानती कि पूरे बनारस का मल, मूत्र और हानिकारक कचरा गंगा में ही जाकर मिलता है? सरकार पहले वो कचरा गंगा में जाने से रोके, तो हम भी यहां कपड़े धोना बंद कर देंगे.’

‘नहाने लायक नहीं’

गंगा की सफ़ाई की मुहिम सन 1986 में शुरू की गई थी, लेकिन आज भी वह कई जगहों पर नाले की तरह है.
इमेज कैप्शन, गंगा की सफ़ाई की मुहिम सन 1986 में शुरू की गई थी, लेकिन आज भी वह कई जगहों पर नाले की तरह है.

उत्तर भारत में 2,500 किलोमीटर क्षेत्र में फैली गंगा नदी के किनारे बसावट और औद्योगिकरण बढ़ा है. इसका नतीजा यह कि इसमें हर दिन हज़ारों मेट्रिक टन कचरा और लाखों लीटर मल जल जा मिलता है. चाहे वो शहर का सीवेज हो, कारखानों का गंद या फिर कीटनाशक – ऐसे कई प्रदूषक गंगा नदी में धड़ल्ले से बहाए जा रहे हैं.

पिछले साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बनारस को गंगा की सफ़ाई का भरोसा दिलाया था और इसी वायदे के बूते चुनावी जीत भी हासिल की. लेकिन यहां स्थिति जस की तस बनी हुई है.

मुंबई से बनारस घूमने आए पर्यटक उर्मेश मेहता से मैंने पूछा कि वे गंगा नदी में डुबकी लगा कर ख़ुद को पवित्र करना चाहेंगे? उन्होंने हंसते हुए कहा, ‘गंगा नदी पावन ज़रूर है. हर भारतीय यहां आकर पवित्र होने की उम्मीद में डुबकी लगाता है. लेकिन नदी में गंदगी को देखते हुए कम से कम मुझे यहां नहाने का मन नहीं कर रहा है."

वहीं गंगा में नियमित रूप से स्नान करने वाली पर्यटक दीक्षा ने कहा, ‘मैं कुछ महीनों पहले भी यहां आई थी और तब से लेकर अब तक मैंने गंगा की गंदगी में कोई सुधार नहीं देखा है. मोदी सरकार ने बातें तो बहुत बड़ी-बड़ी की, लेकिन गंदगी अब भी जगह-जगह फैली हुई है.’

लंबी मुहिम

हर दिन गंगा में लाखों लीटर सीवेज बहा दिया जाता है
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गंगा की सफ़ाई की मुहिम साल 1986 में शुरू हुई थी, और तब से लेकर अब तक इस पर 2,000 करोड़ रुपए ख़र्च किए जा चुके हैं.

14 जनवरी, 1986 में ‘गंगा एक्शन प्लान’ बनाया गया था, जिसका मक़सद गंगा में मिलने वाले वाले सीवेज और औद्योगिक प्रदूषण को रोकना था.

उसके बाद साल 2009 में ‘मिशन क्लीन गंगा’ शुरू किया गया. इसके तहत गंगा को साल 2020 तक सीवर और औद्योगिक कचरे से निजात देने का लक्ष्य रखा गया. इस पर 15,000 करोड़ रुपए खर्च करने की योजना भी बनी.

सरकार ने गंगा को तीन साल में साफ़ करने की बात कही है. मौजूदा हालत देखते हुए यह दावा बेहद महत्वाकांक्षी लगता है.

सबसे बड़ी चुनौती है, गंगा में जाने वाले सीवर और कचरे को उसमें जाने से पहले ही साफ़ करना.

‘अमृत में विष मिलाया जा रहा है’

प्रोफ़ेसर यूके चौधरी का कहना है कि गंगा की सफ़ाई में केवल पैसा बहाने से स्थिति नहीं बदलेगी
इमेज कैप्शन, प्रोफ़ेसर यूके चौधरी का कहना है कि गंगा की सफ़ाई में केवल पैसा बहाने से स्थिति नहीं बदलेगी

विशेषज्ञों का कहना है कि शहरी कचरे को साफ़ करने के लिए बनाए गए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट तकनीकी रुप से सही नहीं हैं.

गंगा के बचाव के लिए सालों से काम कर रहे प्रोफ़ेसर यूके चौधरी ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "गंगा नदी मनुष्य के शरीर की तरह है. इसका ख़ून कम कर इसे विष पिलाया जा रहा है. जब तक सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट में सही तकनीक का इस्तेमाल नहीं होता है और गंगा पर बनाए गए बांधों के डिज़ाइन में ज़रूरी बदलाव नहीं किए जाते, सरकार कितनी ही बैठकें कर ले और कितना ही पैसा लगा ले, कुछ सुधार नहीं होगा."

उर्मेश बनारस घूमने आए, लेकिन गंगा में नहाने का उनका मन नहीं किया
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सेंटर फ़ॉर सायंस एंड एनवायरमेंट की रिपोर्ट के मुताबिक़, गंगा किनारे सैंकड़ों छोटे-छोटे कारखानों से नदी को बहुत हानि पहुंच रही है. इसलिए इन्हें तुरंत हटाए जाने की ज़रूरत है.

पिछले 30 साल में कई सरकारें आईं और गईं. लोग गंगा की बेहतरी के लिए मांगे लगातार उठाते रहे, लेकिन गंगा की मैली होने की कहानी आज भी वही है.

कमी योजनाओं और पैसों की कभी नहीं रही, लेकिन उन योजनाओं को अमल में लाने की इच्छाशक्ति आज भी नहीं दिखती है.

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