'पानी में खड़े- खड़े चमड़ी गलने लगी है'

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- Author, प्रकाश हतवलने
- पदनाम, फ़ोटो पत्रकार
एक तरफ़ देश में किसानों की आत्महत्या को लेकर सड़क से लेकर संसद तक हंगामा मचा हुआ है.
दूसरी तरफ़ पिछले बीस दिनों से नर्मदा के पानी में जल सत्याग्रह कर रहे किसानों की सुध लेने वाला कोई नहीं है.
मध्य प्रदेश में ओंकारेश्वर बांध की ऊंचाई और बढ़ाए जाने से डूब क्षेत्र में आने वाले लोग बीते 11 अप्रैल से पानी में लगातार खड़े रहकर जल सत्याग्रह कर रहे हैं.

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प्रभावित क्षेत्र के घोघलगाँव में सत्याग्रह कर रहे ये लोग पुनर्वास और मुआवज़े की मांग कर रहे हैं.
प्रदर्शनकारियों में शामिल सकु बाई (63) कहती हैं, "ओंकारेश्वर बांध को मिली क़ानूनी मंजूरी के अनुसार, बांध पूरा होने के छह माह पहले ही पुनर्वास पूरा हो जाना चाहिए था. यहां बांध तो पूरा हो गया लेकिन, प्रभावितों का पुनर्वास आजतक नहीं हो पाया."

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कोमल और उनकी पत्नी नन्नी बाई जल सत्याग्रह के पहले दिन से ही बांध के पास पानी में खड़े हैं.
नन्नी बाई कहती हैं, "हाथ और पैरों की चमड़ी गलने लगी है, शरीर में खुजली और दर्द है, लेकिन हमें इसकी चिंता नहीं है. हम अपनी ज़मीनों का पर्याप्त मुआवज़ा चाहते हैं."

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खंडवा के मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. पनिका जल सत्याग्रहियों के स्वास्थ्य पर नज़र बनाए हुए हैं.
कई दिनों से पानी में लगातार खड़े रहने के कारण लोगों के पैर गलने लगे हैं और कुछ के पैरों से खून भी आना शुरू हो गया है.

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जल सत्याग्रह में भाग ले रहे लोग खाना तक पानी के अंदर ही खा रहे हैं.
नर्मदा बचाओ आंदोलन के मुताबिक़, ओंकारेश्वर बांध की ऊंचाई को 189 से 191 मीटर करने से पांच और गांव डूब क्षेत्र में आ गए हैं.

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प्रदर्शनकारियों के समर्थन में आम आदमी पार्टी की अतिशि मार्लेना भी घोगलगाँव में जमी हुई हैं.
बहुजन समाज पार्टी की खंडवा इकाई ने भी सत्याग्रहियों के समर्थन में प्रदर्शन किया.

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नर्मदा बचाओ आंदोलन का दावा है कि पुनर्वास और प्रभावितों का मामला सुलझाए बगैर इस क्षेत्र को डुबाना सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन है.

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सत्तर साल के बनवट सिंह की 6.5 एकड़ ज़मीन डूब जाएगी.
वो कहते हैं, "हम अपने हक़ की लड़ाई लड़ रहे हैं. हमारी मांग है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के अनुरूप प्रभावित परिवारों के पुनर्वास का काम बिना देर किए पूरा होना चाहिए."
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