ई-रिटेल: सेक्स सेलेक्शन किताबें निशाने पर

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- Author, शालू यादव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
भारत में ऑनलाइन शॉपिंग ज़ोर पकड़ रही है जिससे लोगों की ज़िंदगी आसान बन रही है.
लेकिन लोग इंटरनेट पर ऐसी चीज़ें भी ख़रीद रहे हैं जो ये बताने का दावा करती हैं कि किस तरह से अपने होने वाले बच्चे का लिंग चुना जा सकता है.
इनमें केवल लिंग चुनने वाली किट्स या दवाइयां ही नहीं, बल्कि किताबें भी शामिल हैं. और ये किताबें सभी बड़ी ई-रिटेलर कंपनियों फ़्लिपकार्ट, अमेज़ॉन, नापतौल औऱ जंगली की वेबसाइटों पर उपलब्ध हैं.
लेकिन फ़्लिपकार्ट ने अब ऐसी किताबों को अपनी वेबसाइट से हटाने का फ़ैसला किया है.
इन किताबों में दावा किया जाता है कि वे ऐसी सेक्स मुद्रा सिखा सकती हैं, जिससे बच्चे का मनचाहा लिंग माता-पिता को मिल सके.
जबकि कुछ किताबें दावा करती हैं कि वो खान पान में बदलाव ला कर बच्चे का लिंग निर्धारित करने का तरीक़ा बता सकती हैं.
फ़्लिपकार्ट ही क्यों?

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गर्ल्स काउंट नाम की एक संस्था ने एक ऑनलाइन पेटिशन शुरू की थी, जिसमें फ़्लिपकार्ट से वो किताबें वेबसाइट से हटाने की अपील की गई थी जो सेक्स सेलेक्शन के बारे में हों.
इस याचिका पर 11,000 से ज़्यादा लोगों ने ऑनलाइन हस्ताक्षर किए, जिसके बाद फ़्लिपकार्ट ने घोषणा की कि वो ऐसी किताबें अपनी वेबसाइट से हटा रहा है.
लेकिन सवाल उठता है कि सिर्फ़ फ़्लिपकार्ट ही क्यों, जबकि ऐसी किताबें अमेज़ॉन जैसी दूसरी वेबसाइटों पर भी उपलब्ध है?
इस याचिका को जारी करने वाले रिज़वान परवेज़ ने बीबीसी से बातचीत में बताया, "दरअसल फ़्लिपकार्ट केवल एक शुरुआत है. चूंकि ये वेबसाइट लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय है तो हमें लगा कि अपनी मुहिम की शुरुआत इसी वेबसाइट से करें. हमारा अगला क़दम दूसरी वेबसाइटों को इस याचिका के दायरे में लाना होगा."
‘गांवों में भी इंटरनेट पर सर्च’

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भारत में लिंग अनुपात बेहद असंतुलित है. यहां हर 1000 लड़कों के मुकाबले केवल 943 लड़कियां हैं और ये समस्या केवल गांवों तक सीमित नहीं है, बल्कि शहरों में भी लड़का होने पर खुशी मनाई जाती है और लड़की के पैदा होने पर दुख जताया जाता है.
रिज़वान ने कहा कि न सिर्फ़ शहरों में, बल्कि गांवों में भी इंटरनेट की पहुंच बढ़ने से ऐसी किताबों की बिक्री बढ़ रही है जिस पर रोक लगाने की ज़रूरत है.
भारत में पीसीपीएनडीटी क़ानून साल 1996 से लागू है जिसके तहत लिंग जांच और उसे बढ़ावा देने वाले विज्ञापनों को ग़ैर-क़ानूनी करार दिया गया है.

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लेकिन इस कानून का सख़्ती से पालन नहीं हो रहा है.
ग़त जनवरी में सुप्रीम कोर्ट ने गूगल, याहू और माइक्रोसॉफ्ट को निर्देश दिए थे कि वे अपने सर्च इंजन से ऐसे विज्ञापन हटाएं जो लिंग जांच से जुड़े हों.
इस मामले से जुड़ी याचिका में कहा गया था कि ये सर्च इंजन ऐसे विज्ञापनों से खूब पैसा कमा रहे हैं.
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