मांझी की रैलीः सौदेबाज़ी के हुनर की परीक्षा

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- Author, विनोद बंधु
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार
पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने बिहार की राजनीति में अपनी एक अलग जगह बना ली है.
सोमवार को पटना के गांधी मैदान में आयोजित हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा की ग़रीब स्वाभिमान रैली में जुटी भीड़ और मंच पर मौजूद नेताओं की टीम ने यह साबित कर दिया.
इस रैली ने यह भी साबित कर दिया कि मांझी के साथ न केवल अच्छे मैनेजर्स की टीम है बल्कि नेपथ्य में सशक्त आयोजक-प्रायोजक भी हैं.
रैली में पांच लाख की भीड़ नहीं जुट पाई जिसका दावा किया गया था. लेकिन वो बड़ी ख़बर नहीं है.
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बड़ी बात तो यह है कि मांझी जितनी भीड़ जुटा पाए, केंद्र सरकार में शामिल उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी और भारतीय जनता पार्टी एक पखवाड़े के अंदर इसी मैदान में हुई अपनी-अपनी रैलियों में नहीं जुटा पाई.
मांझी की रैली में आडंबर और आत्ममुग्धता भी साफ नज़र आई. बिहार की राजनीति में जीतनराम मांझी एक ऐसा नाम हैं, जिनके पास गंवाने के लिए कुछ नहीं है, जबकि हासिल करने को बहुत कुछ है.
लोकसभा चुनाव में जदयू को दो अंकोें में भी नहीं पहुंचा पाने की नैतिक ज़िम्मेदारी लेते हुए नीतीश कुमार ने इस्तीफ़ा देकर जब मांझी को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपी थी तो किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि हमेशा शांत और भक्ति परंपरा के वाहक रहे 75 साल का एक आदमी इतना महत्वाकांक्षी भी हो सकता है.
राहें अलग

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मांझी ने बहुत कम दिनों में नीतीश कुमार से अपनी राह अलग कर ली थी. नीतीश कुमार की इस मसले पर ख़ामोशी के कारण इसके सार्वजनिक होने में समय लगा.
मांझी ने सिर्फ राह ही नहीं अलग की बल्कि वह जेडीयू के अंदर अपनी जगह बनाने की भी जुगत में लग गए.
भले ही कामयाबी कम मिली लेकिन वह कुछ ऐसे नेता अपने साथ जोड़ पाए, जो जननेता तो नहीं हैंं, लेकिन टेबल पॉलिटिक्स के माहिर और अच्छे मैनेजर हैं.
इसका लाभ मांझी को प्रमंडलों में जनसभाएं करने से लेकर पटना की रैली तक मिला है.
मांझी की टीम

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यह दीगर बात है कि उम्र और हालात की कसौटी पर मांझी की राजनीतिक पारी कितनी लंबी होगी, यह सवाल बहुत पेचीदा है.
दरअसल खुद मांझी यह क़बूल करते हैं कि वह एक चुनाव और लड़ेंगे. उनकी टीम के ज़्यादातर चेहरे उम्रदराज़ हैं.
जो युवा तुर्क हैं, वह मांझी के साथ हैं या किसी और दल के मोहरे, यह बात भी अगले दो-तीन महीने में ज़ाहिर हो जाएगी.
रैली के मंच पर कई ऐसे नाम मौजूद थे, जिनके बारे में आम धारणा है कि वह जून के अंत तक भाजपा का दामन थाम लेंगे.
बीजेपी के करीब!

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इनमें नीतीश मिश्र, सम्राट चौधरी, अनिल कुमार और अजित कुमार थे. ये सभी पूर्व मंत्री रह चुके हैं. इनके अलावा विधायक राजीव रंजन, पूनम देवी, पूर्व विधायक ज्ञानेंद्र सिंह ज्ञानू और राहुल शर्मा भी वहां मौजूद थे. ये सभी बीजेपी के क़रीब माने जाते हैं.
पूर्व मंत्री वृषिण पटेल और नरेंद्र सिंह को भाजपा से अब तक हरी झंडी नहीं मिली है जबकि महाचंद्र प्रसाद सिंह, शकुनी चौधरी और शाहिद अली ख़ा क्या करेंगे अभी तय नहीं है.
ऐसे में मांझी को बड़ा झटका अगले एक दो महीने में भाजपा ही देने वाली है. जबकि जदयू से बग़ावत के बाद से भाजपा उनके लिए संजीवनी रही है.
दलित राजनीति

ग़रीब स्वाभिान रैली ने मांझी का आत्मबल थोड़ा ज़रूर बढ़ाया होगा. क्योंकि पहली बार ऐसे किसी बड़े मंच के वह हीरो थे.
उनसे ज़्यादा दमख़म का दावा करने वाले अनेक नेता उनकी तरफ़दारी में जुटे रहे. बहरहाल, मांझी ने उत्तर प्रदेश की तर्ज़ पर बिहार में दलित राजनीति की एक अलग जगह बनाने की कोशिश की है.
उन्होंने विधान सभा का चुनाव अकेले दम पर लड़ने का ऐलान भी कर दिया है. लेकिन चुनाव में कोई बड़ी बुनियाद रखने में वह कामयाब होंगे, ग़रीब स्वाभिमान रैली इसका पैमाना क़तई नहीं कही जा सकती.
नीतीश को नुकसान

संभवत: उनका लक्ष्य भी अपनी कामयाबी से ज़्यादा नीतीश कुमार को नुक़सान पहुंचाना है.
दूसरी तरफ़ भाजपा का उनके प्रति रवैया धीरे-धीरे बदल रहा है.
वह मांझी के प्रति संवेदना दिखाकर दलित वोट में अपनी पैठ तो बनाना चाहती है, लेकिन वो मांझी को भी ज़्यादा पांव फैलाने की जगह देने के पक्ष में नहीं है.
उत्तरप्रदेश में मायावती से दोस्ती गांठने का फलाफल वह भुगत चुकी है. ऐसे में मांझी का भी प्रयास होगा कि वह सौदेबाज़ी के अपने हुनर को साबित करें, तभी वह किसी किनारे लग पाएंगे.
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