पब्लिक इंटेलेक्चुअल के बिना हिंदी पट्टी!

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- Author, शिवप्रसाद जोशी
- पदनाम, देहरादून से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
दुनिया के दो जाने-माने पब्लिक इंटेलेक्चुअल जर्मन लेखक गूंटर ग्रास और लातिन अमरीकी देश उरुग्वे के लेखक एदुआर्दो गालियानो का न रहना, आम लोगों के लिए गहरा झटका माना जा रहा है.
उत्पीड़न के विरुद्ध दुनिया में जहां कहीं संघर्ष जारी है वहां सार्वजनिक बुद्धिजीवियों ने अपनी सक्रियता से गहरी छाप छोड़ी है.
अमरीका के नॉम चॉमस्की, उरुग्वे के गालियानो और भारत की अरुंधति रॉय की तिकड़ी तो हाल के सालों में अपने बेबाक बयानों और प्रतिरोध आंदोलनों में भागीदारी के लिए मशहूर रही है.
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भारत में भी कई इलाक़ों में ऐसे आंदोलन जारी हैं. लेकिन उनकी हिमायत करने वाले ऐसे कितने लेखक हैं जिन्हें हम पब्लिक इंटेलेक्चुअल कह सकें?
ख़ासकर हिंदी पट्टी में क्या ऐसा कोई लेखक है जिसे हम ये नाम दे सकें.
आज लेखन से ज़्यादा भागीदारी की बातें इसीलिए उठने लगी हैं क्योंकि पूंजीवादी और नवऔपनिवेशवादी सत्ता संरचनाएं कमज़ोरों को लगातार बेदख़ल करने की नीति पर चल रही हैं.
उनके लिए लड़ने वाले सोशल और पॉलिटिक्ल एक्टिविस्ट तो हैं लेकिन लेखकों और संस्कृतिकर्मियों से भी अब ये अपेक्षा पुरज़ोर हो गई है कि वे भी प्रतिरोध में सक्रिय हों.
भारत में लेखक-इंटेलेक्चुअल बिरादरी

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भारत में इस समय अरुंधति रॉय और महाश्वेता देवी के अलावा कौन सा नाम एकदम से ज़ेहन में आता है जिसे हम लेखक के अलावा पब्लिक इंटेलेक्चुअल के तौर पर भी जानते हों.
कन्नड़ लेखक यूआर अनंतमूर्ति, तेलुगू कवि वरवर राव, मराठी कवि नामदेव ढसाल, बांग्ला कवि नवारुण भट्टाचार्य जैसे नाम ज़रूर हैं जो अपने वंचित समाजों की प्रतिनिधि आवाज़ें रहे हैं.
इनमें से अनंतमूर्ति, नवारुण और ढसाल हमारे बीच अब नहीं हैं.
हिंदी पट्टी में सार्वजनिक बुद्धिजीवी का प्रश्न खासा टेढ़ा हो जाता है. आज हिंदी में इस बिरादरी का अभाव सा दिखता है, लेखक बेशक बहुत हैं और उम्दा हैं.
एक्टिविस्ट की भूमिका

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रंगकर्मी सफ़दर हाशमी और हबीब तनवीर जैसे नाम ही याद रहते हैं जिन्होंने अपना जीवन ही समाज के लिए अर्पित कर दिया था.
'हंस' के संपादक राजेंद्र यादव को सार्वजनिक बुद्धिजीवी कहने वाले भी मिलेंगे लेकिन वो अंततः अपनी ही महिमा के बोझ में दबे रहे.
हिंदी में आठवें दशक के कुछ कवि-लेखक-पत्रकार आज बेशक एक्टिविस्ट की भूमिका में भी हैं और अपनी रचनाओं या प्रकाशनों या भागीदारी के साथ हिंदी के वंचित समाज में सक्रिय हैं.
लेकिन युवा पीढ़ी में अभी भी एक बड़े पब्लिक इंटेलेक्चुअल समुदाय की कमी खलती है. महाश्वेता देवी और अरुंधति रॉय जैसा ताप हिंदी में क्यों नहीं लगातार चला आया, ये चिंता की बात है.
बौद्धिकता के झगड़े

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हिंदी भूभाग के छोटे शहरों, कस्बों में ऐसे लेखक एक्टिविस्ट भी ज़रूर हैं जो दिन रात समाज की बेहतरी के लिए संघर्षरत हैं.
लेकिन कुल मिलाकर लेखक जनता से दूर है और जनता भी आंदोलनों से दूर है. जहां संघर्ष जारी हैं वे अपनी अपनी हिम्मत और अपनी अपनी उम्मीदों पर 'जब तक हैं, तब तक हैं.'
यहां के बुद्धिजीवियों में आपसी समझदारी नहीं है. भाईचारा तो छोड़ ही दीजिए. श्रेय लेने की होड़ है और दूसरे की तारीफ़ या प्रोत्साहन लगभग ग़ायब है.
हिंदी का मेनस्ट्रीम मीडिया तो विकराल रूप से वाचाल हो चुका है. वहां हाशियों और चुप्पियों की जगह नहीं बची.
लेखक होना काफ़ी नहीं

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हिंदी में खलबली और उत्पात जमा है. एक अच्छा विचार हिंदी से बाहर नहीं उठता, सोचिए इतना प्रदूषण हिंदी के वायुमंडल पर फैला हुआ है.
अंग्रेज़ी के वर्चस्व का रुदन भी बहुत है. लेकिन बाज़ार और उपयोगितावाद का पूरा बोलबाला है. ऐसे में जवाबदेही का अभाव है और वैचारिकता से परहेज़ है.
आख़िरकार भारत के संदर्भों में भी देखें तो आम जन की बेचैनियों को रास्ता दिखाने वाली कोई सांस्कृतिक-साहित्यिक-राजनैतिक शख़्सियत नज़र नहीं आती है.
संस्कृति, भाषा और राजनीति की विविधता वाले देश में आज हिंसा की विविधता तो दिखती और डराती है लेकिन मनुष्यता की पक्षधर विविधताएं क्यों इतनी बिखरी हुई हैं, ये सवाल से ज़्यादा चुनौती बन गई है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं)
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