क्या है रक्त चंदन जिसकी वजह से बहा रक्त?

लाल चंदन

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    • Author, अखिल रंजन
    • पदनाम, बीबीसी मॉनिटरिंग

आख़िर क्या है यह लाल चंदन जिसकी वजह से तमिलनाडु-आंध्र प्रदेश सीमा पर शेषाचलम में इतनी जानें गईं, यह सफ़ेद चंदन से कैसे अलग है और इतने बड़े पैमाने पर इसकी तस्करी की वजह क्या है?

लाल रंग का होने की वजह से इसे रक्त चंदन भी कहते हैं, पूजा-पाठ में इसका प्रयोग होता है.

पीले चंदन का इस्तेमाल आम तौर वैष्णव मत को मानने वाले करते हैं जबकि रक्त चंदन शैव और शाक्त मत को मानने वाले अधिक प्रयोग करते हैं.

क्या है रक्त चंदन?

आंध्र प्रदेश वन विभाग के अतिरिक्त मुख्य संरक्षक बी मुरलीकृष्णा बताते हैं कि रक्त चंदन एक अलग जाति का पेड़ है जिसकी लकड़ी लाल होती है लेकिन उसमे सफ़ेद चंदन की तरह कोई महक नहीं होती.

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इमेज कैप्शन, चीन में तो लाल चंदन की कलाकृतियों के लिए संग्रहालय भी है.

बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने बताया, "रक्त चंदन को वैज्ञानिक नाम टेरोकार्पस सैन्टनस है जबकि सफ़ेद चंदन को 'सैंटलम अल्बम' के नाम से जाना जाता है और ये दोनों अलग जाति के पेड़ हैं."

मुरलीकृष्णा के मुताबिक़ सफ़ेद चंदन की तरह रक्त चंदन का उपयोग अमूमन दवाएँ या इत्र बनाने और हवन-पूजा के लिए नहीं होता लेकिन इससे महंगे फर्नीचर और सजावट के सामान बनते हैं और इसका प्राकृतिक रंग कॉस्मेटिक उत्पाद और शराब बनाने में भी इस्तेमाल होता है.

अंतराष्ट्रीय बाजार में इसकी क़ीमत तीन हज़ार रुपए प्रति किलो है.

क्यों है खास?

लाल चंदन के पेड़ मुख्यतः तमिलनाडु से लगे आंध्र प्रदेश के चार ज़िलों - चित्तूर, कडप्पा, कुरनूल और नेल्लोर - में फैले शेषाचलम के पहाड़ी इलाक़े में उगते हैं.

लगभग पांच लाख वर्ग हेक्टेयर में फैले इस जंगली क्षेत्र में पाए जाने वाले इस अनोखे पेड़ की औसत उंचाई आठ से ग्यारह मीटर होती है और बहुत धीरे-धीरे बढ़ने की वजह से इसकी लकड़ी का घनत्व बहुत ज़्यादा होता है.

लाल चंदन

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जानकर बताते है कि लाल चंदन की लकड़ी अन्य लकड़ियों से उलट पानी में तेजी से डूब जाती हैं क्योंकि इसका घनत्व पानी से ज़्यादा होता है, यही असली रक्त चंदन की पहचान होती है.

कहाँ है मांग?

आंध्र प्रदेश सरकार के वन विभाग की वेबसाइट के मुताबिक पिछले साल दिसंबर में हुई नीलामी में चीन, जापान, सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया, संयुक्त अरब अमीरात के अलावा कुछ पश्चिमी देशों से लगभग चार सौ व्यापारियों ने बोली लगाई थी. इन चार सौ में लगभग डेढ़ सौ चीनी कारोबारी थे.

मुरलीकृष्णा भी बताते है कि वर्तमान में लाल चंदन की मांग सबसे ज़्यादा चीन में ही है क्योंकि वहां पर इसकी लोकप्रियता चौदहवी से सत्रहवीं शताब्दी के मध्य तक राज करने वाले मिंग वंश के समय से बनी हुई है.

वे कहते हैं, "पहले जापान में भी इसकी काफ़ी माँग थी जहां शादी के वक़्त दिए जाने वाले पारंपरिक वाद्य शामिशेन बनाने के लिए लाल चंदन की लकड़ी इस्तेमाल होती थी, लेकिन अब यह परंपरा धीरे-धीरे ख़त्म हो रही है इसलिए वहां इसकी मांग भी घट रही है."

लाल चंदन

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अंग्रेजी अख़बार चाईना डेली के मुताबिक मिंग वंश के शासकों को लाल चंदन से बने फर्नीचर और सजावटी सामान इतने पसंद थे कि उन्होंने इसे सभी संभावित जगहों से मंगवाया.

मिंग वंश और उसके बाद के शासकों के बीच लाल चंदन की लकड़ी के प्रति दीवानगी का पता इस बात से चलता है कि वहां 'रेड सैंडलवुड म्यूज़ियम' नाम का एक विशेष संग्रहालय है जहां लाल चंदन से बने अनगिनत फर्नीचर और सजावटी सामान संजोकर रखे गए हैं.

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