बेगूसराय के बीहट में लड़कियों की हु-तू-तू

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- Author, सीटू तिवारी
- पदनाम, पत्रकार, बेगूसराय (बिहार) से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
बिहार के बेगूसराय के बीहट गांव की सुबह ही कबड्डी के हु तू तू से शुरू होती है. लड़कियां शॉर्ट्स पहनकर अपनी विरोधी टीम पर दांव आजमाती हैं.
जांघों पर थाप देकर जब वो खुद में उत्साह भरती हैं तो उससे निकलने वाली आवाज़ बिहार के सामंती समाज को चुनौती देती लगती है.
बीहट गांव की आबोहवा में कबड्डी रचती बसती है. बिहार के विभाजन के बाद से ही राज्य टीम में हर साल बीहट गांव के दो से तीन खिलाड़ी रहते हैं.
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और ये संख्या लगातार बढ़ती जा रही है. साल 2014 की बात करें तो सब जूनियर, जूनियर और सीनियर राज्य स्तरीय टीम में यहां के नौ लड़के और 13 लड़कियां थीं.
आलम ये है कि बीते नौ साल से सब जूनियर और जूनियर स्तर की स्टेट चैंपियनशिप पर बीहट की बदौलत बेगूसराय का कब्जा है.
यही वजह है कि बीहट को अब कबड्डी की नर्सरी कहा जाने लगा है. इस कबड्डी की नर्सरी की एक पौध रेमी है.
अखबार में फोटो

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रेमी राष्ट्रीय स्तर पर कबड्डी खेलती है और एशियाड के कैम्प में उनका चुनाव हो चुका है.
रेमी बताती है, "2005 में जब खेलना शुरू किया तो शॉर्ट्स पहनने पर ताने मिलते थे. खुली जांघों को देखकर लड़कियां कहती थीं कि पेपर लपेट लो. पापा को भी दो साल तक ये पता था कि मैं सिलाई सीखने जाती हूं लेकिन एक दिन <link type="page"><caption> अखबार में फोटो</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/sport/2011/11/111109_kabaddi_va" platform="highweb"/></link> निकला तो बात घर में खुल गई."
किसान परिवार

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बीहट में फिलहाल कबड्डी सिखाने की बागडोर श्याम सिंह उर्फ पन्ना लाल ने संभाल रखी है जो अंतरराष्ट्रीय रेफरी हैं.
पन्ना लाल बताते हैं, "70 के दशक से ही यहां लड़के–लड़कियां कबड्डी खेलते हैं. 80 के दशक में ही यहां के सुनील सिंह ने नैशनल खेला और लड़कियों में विभा कुमारी ने."
दिलचस्प है कि कबड्डी से जुड़े ज्यादातर खिलाड़ी किसान परिवार के हैं और एक खास अगड़ी जाति से आते हैं. पिछड़ी जाति से आने वाले खिलाड़ियों की संख्या बेहद कम है.
नैशनल खेल

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सरिता उनमें से एक है. सातवीं में पढ़ने वाली सरिता की पांच बहनों की शादी 15 साल में ही कर दी गई लेकिन सरिता की शादी करने से उसके पिता ने इंकार कर दिया.
वजह बताते हुए सरिता कहती हैं, "मेरे घर के बगल में एक देवंती दीदी थी जिन्हें कबड्डी के जरिए ही सचिवालय में नौकरी लगी. जब ये बात पापा को पता चली तो उन्होंने मुझे कबड्डी सीखने को कहा. मैं तीन बार नैशनल खेल चुकी हूं और कबड्डी खेलकर नौकरी में जाउंगी."
अनुशासन के साथ

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बीहट की तरह ही बरौनी में भी ये खेल लड़कियां बड़े अनुशासन के साथ खेलती हैं. भक्तियोग पुस्तकालय के कैम्पस (खेलगांव) में रोजाना 30 लड़कियां सुबह शाम प्रैक्टिस करती हैं.
इन लड़कियों में से रीति और नीतू नैशनल खेल चुकी हैं. रीति की बड़ी बहन प्रीति ने भी 16 बार नैशनल खेला. लेकिन शादी के बाद प्रीति कबड्डी ग्रांउड पर वापस नहीं लौटीं.
आर्थिक मदद

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रीति इस मुश्किल के बारे में बताती हैं, "हम सब गरीब परिवार से आते हैं. कबड्डी खेलकर भी जब कुछ नहीं मिलता तो घर वाले परेशान हो जाते हैं. वो ताने देते हैं कि हॉफ पैंट पहनकर नौकरी नहीं मिलेगी, उल्टे बदनामी हाथ लगेगी."
हालांकि कबड्डी के लिए आधारभूत संरचना की बात करें तो इन गांवों में हर तरफ इसका अभाव है. यहां ना तो स्टेडियम है और ना ही कबड्डी खेलने के लिए मैट.

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वामपंथियों के गढ़ रहे इस इलाके में कबड्डी तो फल फूल रही है लेकिन उसे आगे बढ़ने के लिए आर्थिक मदद चाहिए.
जैसा कि बेगूसराय ज़िला कबड्डी संघ के सहसचिव परमानंद कहते है, "12 लड़कियां कबड्डी सीखने के लिए इस सत्र में कह चुकी हैं लेकिन हमारे पास जब उनकी जर्सी के पैसे हों तब तो हम उनकी भर्ती करें."
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