भाजपा-पीडीपी: 'उम्मीद जगाने वाला गठजोड़'

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- Author, सुमांत्रा बोस
- पदनाम, प्रोफेसर, लंदन स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स एंड पॉलिटिकल साइंस (एसएसई)
भारत प्रशासित जम्मू कश्मीर में भारतीय जनता पार्टी और पीडीपी का गठबंधन बीते 25 साल में सबसे ज़्यादा उम्मीदें जगाने वाला घटनाक्रम है.
कश्मीर में 1989 में शुरू हुआ भारत विरोधी उग्रवाद बीते एक दशक में ठंडा पड़ चुका है, लेकिन वहां स्थिति लगातार अस्थिर बनी हुई है, ख़ासकर कश्मीर घाटी में.
कश्मीर के जिस क्षेत्र को लेकर विवाद है उसकी आबादी लगभग 1.8 करोड़ है जिसमें 1.3 करोड़ लोग भारत प्रशासित कश्मीर में रहते हैं जबकि बाकी लोग नियंत्रण रेखा के उस पार पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में.
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कश्मीर विवाद के मुख्य तीन बिंदु हैं:
- भारत और पाकिस्तान के बीच संप्रभुता का विवाद क्योंकि दोनों ही देश पूरे क्षेत्र पर अपना हक़ जताते हैं.
- कश्मीर घाटी में रहने वाली आबादी का भारत से अलगाव.
- मुस्लिम बहुल कश्मीर घाटी और हिंदू बहुल जम्मू क्षेत्र के बीच मतभेद.
भाजपा और पीडीपी का गठबंधन बाद वाले दो बिंदुओं को सुलझाने के लिए लिहाज़ से अहम साबित हो सकता है.
क़ागज़ों पर देखें तो दोनों पार्टियां सहज सहयोगी नज़र नहीं आती हैं.
1951 में अपने गठन के बाद से ही कश्मीर के मुद्दे पर भाजपा का रुख़ कड़ा रहा है और वो भारतीय संविधान की धारा 370 को ख़त्म करने की मांग करती रही है, जिसके अनुसार, जम्मू कश्मीर को विशेष स्वायत्तता मिली हुई है.
मुश्किल मुद्दे

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पीडीपी कश्मीर को भारत का हिस्सा तो मानती है, लेकिन उसकी राजनीति का आधार घाटी के लोगों की शिकायतें और उम्मीदें हैं.
पीडीपी न सिर्फ़ 370 का बचाव करती है बल्कि वो जम्मू कश्मीर के लिए 'स्वशासन' की भी वकालत करती रही है और उसका ज़ोर पाकिस्तानी प्रशासित कश्मीर से रिश्ते बढ़ाने पर भी रहा है.
पीडीपी मानवाधिकार से जुड़े एजेंडे को भी ज़ोर शोर से उठाती रही है, ख़ास तौर से सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून के ख़िलाफ़ उसने कई बार आवाज़ उठाई है.
इसके अलावा पीडीपी कश्मीर में आज़ादी समर्थक और पाकिस्तान समर्थक गुटों और नेताओं के साथ बातचीत के भी हक़ में रही है ताकि कश्मीर समस्या का स्थायी समाधान तलाशा जा सके.
ये सभी ऐसी मांगें हैं जो कश्मीर के सिलसिले में भारतीय जनता पार्टी को मंज़ूर नहीं होंगी.
मुश्किल वार्ताएं

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नवंबर-दिसंबर में हुए विधानसभा चुनावों में खंडित जनादेश मिलने के बाद भाजपा और पीडीपी के बीच दो महीनों की सियासी मोततोल के बाद ये गठबंधन मुमकिन हो पाया है.
सरकार की कमान पीडीपी के नेता मुफ़्ती मोहम्मद सईद को मिली और मंत्रिमंडल में कैबिनेट रैंक के दो तिहाई सदस्य भी पीडीपी के ही हैं.
एक तरह से देखें तो दोनों पार्टियों की ये वार्ता एक सकारात्मक संकेत है जिसमें एक तरफ़ तो कश्मीर पर भारत के कट्टर रुख़ के पैरोकार थे तो दूसरी तरफ राज्य की स्वायत्तता, गरिमा और मानवाधिकारों की पैरवी करने वाले लोग.
जो न्यूनतम साझा कार्यक्रम बना है, वो धारा 370 पर कहता है, "दोनों दलों के अलग अलग मतों को ध्यान में रखते हुए गठबंधन विशेष दर्जे समेत कश्मीर से जुड़े संविधान के सभी प्रावधानों को लेकर प्रतिबद्ध है."
वहीं सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून के बारे कहा गया है कि सुरक्षा स्थिति का जायज़ा लिया जाएगा ताकि इस कानून को लेकर कोई अंतिम राय क़ायम की जा सके.

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इन विवादित मुद्दों के अलावा न्यूनतम साझा कार्यक्रम उन वादों के लिए लिहाज से कहीं अहम है जो इसमें किए गए हैं.
गठबंधन दस्तावेज के अनुसार, "इस गठबंधन का मकसद नियंत्रण रेखा के आरपार मेललिमाप और विश्वास बढ़ाना है और समावेशी राजनीति के जरिए लोकतंत्र का दायरा बढ़ाया जाएगा ताकि सभी मुद्दों को सुलझाने के लिए उचित वातावरण तैयार हो सके."
साथ ही पाकिस्तान के साथ रिश्ते बेहतर बनाने और लोगों के बीच संपर्क को बढ़ाने पर भी न्यूनतम साझा कार्यक्रम में ज़ोर दिया गया है.
इन सब बातों से उसी तरह की सोच का इशारा मिलता है जिसके ज़रिए लंबे समय तक चले उत्तरी आयरलैंड के संकट को आख़िरकार सुझला लिया गया.
वादों को सच करना होगा

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जम्मू में सरकार का शपथ ग्रहण होना सांकेतिक रूप से बहुत अहम है जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नवनियुक्त मुख्यमंत्री मुफ्ती सईद एक दूसरे से गले मिल रहे थे और उनके सामने मेज पर भारत और जम्मू कश्मीर के झंडे रखे हुए थे.
हिंदू राष्ट्रवादी लंबे समय से इस बात का विरोध करते रहे हैं कि जम्मू कश्मीर का अलग झंडा क्यों है.
ये कहना अभी जल्दबाजी होगी कि भाजपा और पीडीपी के बीच ये गठबंधन कश्मीर के लिए एक नई शुरुआत है, लेकिन ये निश्चित तौर पर कश्मीर घाटी में बीते 25 साल में सबसे अधिक उम्मीद जगाने वाला घटनाक्रम है.
अब आने वालों वर्षों में चुनौती इस बात की होगी कि इन सब सांकेतिक बातों को ठोस नतीजों में तब्दील किया जाए और वादों को हक़ीक़त की ज़मीन पर उतारा जाए.
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