'बेटी वापस मिल जाए, फिर चाहे मर जाए'

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- Author, सीटू तिवारी
- पदनाम, पटना से, बीबीसी हिन्दी डॉटकॉम के लिए
बिहार में दरभंगा के रहने वाले राजकुमार प्रसाद को सातवीं कक्षा में पढ़ने वाली बिटिया सरिता (बदला हुआ नाम) की पल-पल याद आती है. आज वो 23 साल की होती.
सरिता की मां ने तो आज तक उसके कपड़े भी संभाल कर रखे हैं. राजकुमार परचून की दुकान चलाते हैं. उनके तीन बच्चे हैं.
दो बेटे से पहले थी सरिता जिसे अच्छे कपड़ों का खूब शौक था. बिना दरवाजे के घर में अब भी उन्होंने उसके प्लास्टिक के खिलौने, स्कूल की कॉपी संभाल कर रखी है, इस उम्मीद में कि जाने कब बिटिया आ जाए और इन्हें देखने की ज़िद कर बैठे.
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कभी बिहार में अपहरण किसी उद्योग की तरह फला फूला. बदली शासन व्यवस्था में उस पर लगाम तो ज़रूर लगी लेकिन पीड़ित परिवार आज भी अपनों के अंतहीन इंतजार में हैं.
और ऐसा लंबा इंतज़ार ज्यादातर मामलों में उनका है जिनके पास प्रशासन और पुलिस से कार्रवाई करने के लिए सवाल उठाने की हिम्मत नहीं है.
राजकुमार और उनका परिवार भी ऐसे ही पीड़ितों में एक हैं. जिस समय सरिता का अपहरण हुआ वो दरभंगा शहर के सरकारी स्कूल में पढ़ती थीं.
राजकुमार बताते हैं कि मई 2007 की एक दोपहर अपहरणकर्ता उनके घर में घुस कर बंदूक की नोक पर उनकी बच्ची को ले गए.
मुख्यमंत्री तक गुहार

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2007 से 2009 तक वो 14 बार मुख्यमंत्री दरबार तक अपनी गुहार ले कर गए. ग़रीब मां-बाप रविवार को पटना आते और फिर सोमवार को दरबार में गुहार लगाकर लौट जाते.
मां पुष्पा बताती हैं, "पटना जाते तो बिटिया की याद और गहरा जाती. उसे कभी पटना नहीं लाए, लेकिन ढूंढने में हमने पटना के बहुत चक्कर लगाए."
सरिता को मछली बहुत पसंद थी. मछली आती तो सरिता रसोई के चक्कर काटने लगती और बार-बार पूछती, मां मछली कब पकाओगी.
पुष्पा कहती हैं, "उसके जाने के एक साल तक यहां मछली नहीं बनी, जब भी ऐसा कुछ होता, घर में सब रोने लगते."
ऐसे छुड़ाया बेटी को

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2009 में परिवार को ख़बर मिली कि वो बेगूसराय में एक वेश्यालय में क़ैद थीं. पुलिस की मदद से वो वहां से छूटी जहां उसके बयान के मुताबिक उसे खूब मारा जाता था और शारीरिक शोषण होता था.
पुष्पा बताती हैं कि सरिता जब घर आई तो बेहद सहमी हुई थी. वो पिता और अपने दो भाइयों के सामने जाने से कतराती थी, लेकिन धीरे धीरे सामान्य हुईं.
उनकी खिलखिलाहट और बातों से घर फिर से गुलज़ार हो गया.
दोबारा अपहरण

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सरिता फिर से तालीम हासिल करना चाहती थीं. मां बताती हैं कि सरिता को खून न बनने की बीमारी थी और कर्ज लेकर उनका इलाज हुआ.
वो सरिता को इलाज के लिए ले जाते तो बस एक ही बात कहती, "मां, मैं बड़ी होकर डॉक्टर बनूंगी."
सरिता अपने पुराने स्कूल नहीं जाना चाहती थी, इसलिए अगस्त 2010 में राजकुमार टीसी के लिए अपनी बेटी को लेकर स्कूल गए, लेकिन यहां उनका दोबारा अपहरण हो गया.
राजकुमार का आरोप है कि स्कूल के ही एक शिक्षक की मदद से बच्ची को अगवा कर लिया गया.
मुश्किल से दर्ज हुई रिपोर्ट

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जब स्थानीय थाने में उनकी शिकायत लेने से इनकार कर दिया गया तो कोर्ट की दखलंदाजी के बाद एफआईआर दर्ज हुई.
पुष्पा कहती हैं, "मेरी बच्ची उस दिन अपने मनपसंद कपड़े पहनकर गई थी. कपड़ों का उसे बहुत शौक था, लेकिन मैं उसे दोबारा नहीं देख पाई."
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी लेनिनवादी) के महिला संगठन की दरभंगा जिलाध्यक्ष साधना शर्मा कहती हैं, "ये मामला समाज के सामंती ताने-बाने और यौन हिंसा से जुड़ा है."
शर्मा के अनुसार मुख्य अभियुक्त ऊंची जाति का है और एक बार अपहृत की मां ने उसके ग़लत व्यवहार के कारण उसे थप्पड़ मार दिया था जिसके बाद बच्ची का अपहरण हुआ.
चार गुना मामले बढ़े

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अभियुक्त की मां चन्द्रकला देवी का कहना है, "लड़की पागल है. मेरा बेटा इंजीनियर बनने की तैयारी कर रहा था लेकिन इन लोगों ने उसे फंसा दिया."
अमित फ़िलहाल ज़मानत पर हैं. बीते साल 15 अगस्त को सरिता के मां-बाप ने उसकी बरामदगी की मांग करते हुए चार दिनों तक दरभंगा में धरना दिया था.
बिहार पुलिस के आंकड़ों के मुताबिक़, 2001 में अपहरण के 1,689 मामले दर्ज हुए, 2014 में ये बढ़कर 6,570 हो गए, हालांकि फिरौती के लिए 385 अपहरण हुए थे, वहीं 2014 में ये घटकर 62 रह गए.
आंकड़ों के मुताबिक़ 2013 में अपहरण के कुल 5,474 मामलों में 3803 मामले शादी को लेकर अपहरण करने या घर से भागने के मामले थे.
राजकुमार और पुष्पा अपनी 23 साल की बेटी का आज भी इंतज़ार कर रहे है.
राजकुमार कहते हैं, "मेरी बच्ची कीचड़ में फंसी है. वो हमारे पास आकर मर जाए तो हम उसका अंतिम संस्कार कर दें. लेकिन बस वो वापस आ जाए."
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