मोदी विरोध और किसान के ‘मन की बात’

दिल्ली में धरना देते अण्णा हजारे और अन्य नेता

इमेज स्रोत, MUKUL DUBE

    • Author, अजित साही
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार

सबका साथ, सबका विकास का नारा देकर सत्ता में आई नरेंद्र मोदी की सरकार के भूमि अधिग्रहण अध्यादेश का संसद से लेकर सड़क तक पर विरोध हो रहा है.

गांधीवादी अन्ना हज़ारे, वामपंथी दलों और उनसे जुड़े किसान और जन संगठनों ने दिल्ली में में धरना-प्रदर्शन किया. इस मुद्दे पर विपक्ष एक नज़र आ रहा है. संसद में सरकार इस क़ानून को पास करने के लिए विपक्ष को साधने में लगी है.

लेकिन सरकार विपक्ष को साध पाएगी या विपक्ष की एकता उसे और मज़बूत बनाएगी.

पढ़ें, पूरा विश्लेषण

दिल्ली में धरना देते किसान

इमेज स्रोत, MUKUL DUBE

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत की लड़खड़ाई अर्थव्यवस्था को दोबारा बुलंद करना चाहते हैं. पिछले साल लोकसभा चुनाव में उन्होंने दावा किया था कि यदि वो जीते तो आर्थिक मंदी ख़त्म करेंगे और करोड़ों नए रोज़गार के साथ देश को समृद्ध करेंगे.

ग़ुरबत से उकताई जनता को निश्चित ही ये वादा भाया. उसने मोदी को भारी बहुमत दिया. प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी ने नुस्ख़ा बताया कि भारत को चीन की तरह एक विशाल औद्योगिक मुल्क में तब्दील करना होगा.

इसके लिए मोदी ने "मेक इन इंडिया" यानी "भारत में निर्माण" का नारा दिया. उन्होंने 30 दिसंबर को एक अध्यादेश जारी कर उद्योग के लिए भूमि अधिग्रहण को आसान बनाने का ऐलान किया. ये फ़ैसला मोदी कार्यकाल की सबसे बड़ी चुनौती बन गया है.

अंग्रेज़ों का क़ानून

दिल्ली में धरना देते किसान संगठन

इमेज स्रोत, MUKUL DUBE

पिछले साल तक भारत में भूमि अधिग्रहण अंग्रेज़ी शासकों के एक 120-वर्ष पुराने क़ानून के तहत होता था. उस क़ानून में ज़मीन मालिक की रज़ामंदी का प्रावधान न था. मोदी के पूर्ववर्ती प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जनवरी 2014 में उस क़ानून को बदल कर कम से कम 70 फ़ीसदी ज़मीन मालिकों की रज़ामंदी अनिवार्य कर दी. मोदी के अध्यादेश ने इसे फिर से रद्द कर दिया है.

24 फ़रवरी को सरकार ने इस अध्यादेश को क़ानून बनाने के लिए लोकसभा में प्रस्ताव पेश किया तो विरोध प्रखर हो गया.

इस क़ानून के विरोध में विपक्ष के दो ध्रुव नज़र आते हैं. एक तो आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल जो इस महीने दिल्ली के मुख्यमंत्री बने हैं.

24 फ़रवरी को जब सरकार लोकसभा में प्रस्तावित क़ानून पेश कर रही थी तो एक किलोमीटर दूर उसके विरोध में गांधीवादी समाजसेवी अण्णा हज़ारे द्वारा बुलाई जनसभा में केजरीवाल और उनकी पार्टी के वरिष्ठ नेता शरीक़ हो रहे थे.

विपक्ष को राहत

भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के खिलाफ दिल्ली में धरना देतीं महिलाएं.

इमेज स्रोत, MUKUL DUBE

केजरीवाल की जीत ने तमाम विपक्षी नेताओं को राहत की साँस दी है. पिछले नौ महीनों में पहले लोकसभा और फिर महाराष्ट्र, झारखंड और हरियाणा विधानसभाएं जीत कर मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा ने इन क़द्दावर नेताओं की चूलें हिला दी थीं.

लेकिन शायद ही केजरीवाल बाक़ी विपक्षी नेताओं का हाथ थाम सकें, क्योंकि केजरीवाल सभी दलों पर भ्रष्ट होने का आरोप लगा चुके हैं. दिल्ली जीतने के बाद उनकी पार्टी देशभर में स्वतंत्र विस्तार की महात्वाकांक्षी होती दिख रही है.

इसलिए भूमि अधिग्रहण क़ानून के विरोध में विपक्ष का दूसरा ध्रुव बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के इर्द संभव दिखता है. नीतीश ने मोदी के प्रस्ताव को "काला क़ानून" बताते हुए ऐलान कर दिया है कि वो बिहार में इस पर अमल नहीं करेंगे.

नीतीश का निशाना

भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के खिलाफ दिल्ली में धरना देते विभिन्न संगठऩ

इमेज स्रोत, MUKUL DUBE

दरअसल इस वक़्त नीतीश के निशाने पर अक्तूबर में होने वाले बिहार विधानसभा चुनाव हैं. वे अभी फिर बिहार के मुख्यमंत्री बने हैं.

जीतन राम माझी और नीतिश की रस्साकशी के चलते पिछले सप्ताह नीतीश की जनतादल (युनाइटेड) एकबारगी टूटने की कगार पर दिखी. ये नीतीश लिए घातक होता क्योंकि उनका और उनके सहयोगी ग़ैर-भाजपाई दलों का राजनीतिक भविष्य अक्तूबर के चुनाव पर टिका है.

बिहार में नीतीश की सीधी टक्कर भाजपा से है. यदि मोदी भाजपा को बिहार जिता पाते हैं तो देश के भाजपा-विरोधी दलों के हौसले फिर पस्त हो जाएँगे. इसीलिए बिहार के भाजपा नेता माँझी सरकार को बचाने की कोशिश कर रहे थे. लेकिन बहुमत के अभाव में माँझी को इस्तीफ़ा देना पड़ा. कल तक सत्तालोलुप दिखने वाले नीतीश एक झटके में सहानुभूति के योग्य हो गए.

बिहार चुनाव से पहले ग़ैर-भाजपाई (और ग़ैर-'आप') विपक्षी दल नीतीश को मज़बूत जरूर करना चाहेंगे. 22 फ़रवरी को नीतीश के शपथग्रहण में ममता बनर्जी की उपस्थिति का यही संदर्भ है.

ममता की लड़ाई

दिल्ली में धरना देते विभिन्न संगठनों के लोग

इमेज स्रोत, MUKUL DUBE

मोदी ने ममता पर भ्रष्टाचार और आतंकवाद को बढ़ावा देने के आरोपों की बौछार लगा रखी है. मोदी से अकेले जूझना ममता को भारी पड़ रहा है.

इसीलिए भूमि अधिग्रहण क़ानून पर मोदी सरकार का संसदीय प्रस्ताव नीतीश, ममता और अन्य विपक्षी दलों के लिए राजनीतिक वरदान हो सकता है.

इस विवादित क़ानून के विरोध में जन आंदोलन जरूर ही तेज़ होता जाएगा. मोदी के ख़िलाफ़ मोर्चा खोलने के लिए विपक्षी दल ऐसे जन सैलाब के सामने जाकर खड़े होने की ज़रूर कोशिश करेंगे.

वैसे भी भाजपा और उसके सहयोगी दल राज्यसभा में अल्पमत में हैं. उस सदन में भूमिग्रहण क़ानून पारित करवाने के लिए उनको विपक्ष की ज़रूर आवश्यकता पड़ेगी. लेकिन विपक्ष की कोशिश रहेगी कि क़ानून ना पारित हो जिससे वो अपने आप को ज़मीनधारी किसानों के मसीहा के रूप में पेश कर मोदी के ख़िलाफ़ चुनावी जीत हासिल करने की कोशिश कर सकें.

<bold>(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए <link type="page"><caption> यहां</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi" platform="highweb"/></link> क्लिक करें. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi " platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)</bold>