ड्रैगन की जकड़ से निकलेगा श्रीलंका?

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- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
भारत और श्रीलंका भौगोलिक और ऐतिहासिक रूप से भले ही पड़ोसी हों पर महिंदा राजपक्षे के शासन के दौरान दोनों देश के बीच दूरी उतनी ही अधिक थी जितनी हो सकती है.
राजपक्षे के चीन के तरफ़ झुकाव के कारण श्रीलंका की भारत से कूटनीतिक दूरी बढ़ी. तीन दशकों तक चला गृहयुद्ध 2009 में ख़त्म होने के बाद से चीन श्रीलंका का प्रमुख आर्थिक मददगार रहा है.
शायद यही वजह है कि मैत्रीपाल सिरिसेना के पिछले महीने श्रीलंका के राष्ट्रपति चुने जाने पर भारतीय मीडिया में ख़ुशी का माहौल था.
भारत के राजनीतिक हलकों में राहत का भाव देखा गया. उम्मीद की जाने लगी कि नई सरकार से भारत के संबंध बेहतर होंगे क्योंकि माना जाता है कि सिरिसेना का झुकाव भारत की तरफ़ है.
पहला बड़ा दौरा

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सिरिसेना ने अपने पहले विदेश दौरे के लिए भारत को चुना. इसे सकारात्मक संकेत माना जा रहा है. यहां वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी सहित कई अन्य नेताओं से मिल रहे हैं.
भारत के विदेश मंत्रालय के बयान के अनुसार दोनों के बातचीत के एजेंडे में आपसी आर्थिक सहयोग और 'दोनों देशों के सभी तबकों के बीच' शांति बहाली प्रमुख हैं.
भारत चाहता है कि नई श्रीलंका सरकार तमिलों के अधिकारों की रक्षा करे और चीन के बढ़ते प्रभाव पर लगाम लगाए.
चीन ने पिछले पांच सालों में निवेश या ऋण के रूप में क़रीब पांच अरब डॉलर श्रीलंका की विकास परियोजनाओं में लगाए हैं. 2003 से अब तक भारत का निवेश एक अरब डॉलर से कम रहा है.
सैन्य सहयोग

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विशेषज्ञों के अनुसार श्रीलंकाई वायुसेना में चीन के कल-पुर्ज़ों की साझेदारी क़रीब 60 फ़ीसदी हो चुकी है. इस पर भारत का परेशान होना स्वाभाविक है.
सिरिसेना के आने के बाद भारत को उम्मीद की किरण दिखने लगी है. उन्होंने कहा है कि वह पिछली सरकार में चीन के साथ हुए समझौतों की समीक्षा करेंगे.
विशेषज्ञों के अनुसार चीन की श्रीलंका पर आर्थिक पकड़ इतनी मज़बूत है कि सिरिसेना के लिए इससे बाहर निकलना आसान नहीं होगा.
कुछ विशेषज्ञों के अनुसार, सिरिसेना के लिए एक नए अमीर दोस्त और सैकड़ों सालों के साझा इतिहास वाले एक पुराने दोस्त के बीच चुनाव करना काफ़ी कठिन होगा.
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