कच्ची उम्र का प्यार और वो नाज़ुक मोड़...

स्कूल, शिक्षा, यौन शिक्षा, तालीम, पढ़ाई लिखाई

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    • Author, इमरान क़ुरैशी
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

स्कूल बस में जा रहा 15 साल का एक लड़का अपने एक सहपाठी का हाथ थामे पकड़ा गया. उसकी बैचमेट एक लड़की थी.

और ये साफ़ मालूम दे रहा था कि हाथों में हाथ लेने के मामलों में दोनों की मर्ज़ी शामिल थी. इससे ज़्यादा किसी बात की गुंजाइश कम ही थी.

इसके ठीक बाद लड़के को अभिभावकों के साथ आने के लिए कहा गया.

बच्चे के अभिभावकों से स्कूल ने 'दरियादिली दिखाते हुए' कहा कि वह परीक्षा में तो शामिल हो सकेगा, लेकिन अकादमिक सत्र के आख़िरी कुछ महत्वपूर्ण हफ़्तों में उसे क्लास आने की इजाज़त नहीं होगी.

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बच्चे के बर्ताव को लेकर स्कूल प्रबंधन ने उसके मां बाप से कथित तौर पर उसे 'भटका हुआ' कहा.

एक दूसरे मामले में एक लड़की के माता-पिता को स्कूल की ओर से बुलाकर कहा गया कि उनकी बेटी की पढ़ाई लिखाई में दिलचस्पी नहीं है और "उसका मन केवल लड़कों से बातचीत करने में लगता है."

छोटी उम्र के बच्चों और स्कूलों के प्रबंधन और शिक्षक और उनके क़ायदे क़ानूनों के लिहाज़ से देखें तो ये मामले कोई अजीबोग़रीब घटना नहीं हैं.

स्कूलों के लिए काउंसिलिंग करने वाले लोग कहते हैं कि को-एड स्कूलों में लड़के लड़कियों का एकदूसरे से इस तरह से लगाव ज़ाहिर करने के मामले साल दर साल बढ़ रहे हैं.

छोटी उम्र

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एक स्कूल के काउंसलर ने नाम न ज़ाहिर करने की शर्त पर कहा, "स्कूल कैम्पस में लड़के लड़कियों का एक दूसरे का हाथ पकड़ना या गले लगना, आपस में लगातार बातचीत करना, एक दूसरे के क़रीब जाना, कोई अनूठी बात नहीं है. पिछले कुछ सालों से हमने अपने स्कूल में ऐसे तीन-चार जोड़े देखे हैं."

बेंगलुरु में कुछ हफ़्ते पहले की एक घटना के बाद छोटी उम्र के आकर्षण को लेकर शिक्षकों, स्कूल प्रबंधन और बड़ों की प्रतिक्रिया का मुद्दा अचानक उभर गया है.

एक ख़बर में कहा गया कि स्कूल के अहाते में किसी लड़के को कथित तौर पर गले लगाने वाली एक लड़की को स्कूल ने डेढ़ दिनों के लिए स्कूल से निलंबित कर दिया.

यौन शिष्टाचार

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लड़की की मां को स्कूल के प्रिंसिपल ने बेटी के 'ख़तरनाक बर्ताव' के लिए फटकार लगाई. दोनों जैसे ही घर लौटीं, लड़की ने बिल्डिंग की दसवीं मंजिल से छलांग लगाकर ख़ुदकुशी कर ली.

निम्हांस (नैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंसेज़) में बाल मनोविज्ञान के प्रोफ़ेसर डॉक्टर शेखर शेषाद्री कहते हैं, "सभी तरह के लगावों को यौन रुझान के नज़रिये से नहीं देखा जाता है. स्कूलों को यौन शिष्टाचार पर खुलापन लाने की ज़रूरत है. संबंधों के बारे में आमतौर पर बातचीत किए जाने की ज़रूरत है."

उन्होंने कहा, "एक परिवार में संबंधों का क्या मतलब होता है, सामाजिक रूप से किसी से जुड़ना क्या होता है, औपचारिक संबंध क्या होते हैं, नज़दीकी क्या है, गहरा लगाव क्या है और वफ़ादारी का क्या मतलब होता है. कहां ख़ुद पर रोक लगाए जाने की ज़रूरत है और सार्वजनिक तौर पर प्यार जतलाने के पूरे मुद्दे पर बातचीत होनी चाहिए."

'अपमानजनक बर्ताव'

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डॉक्टर शेषाद्री का कहना है, "अगर किसी स्कूल के पास बच्चों के इन मुद्दों से सकारात्मक तरीक़े से निपटने की कोई व्यवस्था नहीं है तो यह स्कूलों के लिए चिंता का एक कारण है. बच्चों के लिए दोस्ताना नज़रिये से देखें तो स्कूलों का ढांचा ठीक नहीं कहा जा सकता."

मुंडकुर लॉ एसोशिएट्स की दिव्या बालगोपाल कहती हैं, "क़ानून कहता है कि बच्चों को प्यार से समझाया जाना चाहिए. अगर कोई इसे नहीं मानता तो उसे सज़ा दिए जाने की ज़रूरत है. कोई स्कूल बच्चों के साथ अपमानजनक बर्ताव नहीं कर सकता, क्योंकि इसका उसके व्यक्तित्व पर लंबा असर पड़ता है."

सही या ग़लत!

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एक अन्य काउंसलर ने बताया, "कई बार तो हमें शिक्षकों से भी बात करनी होती है क्योंकि उनकी अपनी सामाजिक पृष्ठभूमि भी बेहद पारंपरिक किस्म की होती है. उन्हें ये बताए जाने की ज़रूरत है कि बच्चों को अपने रूढ़िवादी नज़रिये से देखने से बेहतर उनके दृष्टिकोण से देखे जाने की ज़रूरत है."

काउंसिलिंग इंडिया की प्राजक्ता रायबागी कहती हैं, "सही या ग़लत को देखने का सबका अपना नज़रिया होता है. लेकिन शिक्षक बच्चों से ये नहीं कहते कि क्या ठीक है और क्या नहीं. अगर आप किसी बच्चे से बात करें और उससे कहें कि उसने जो कुछ भी किया है, वह उनके हिसाब से तो ठीक हो सकता है, लेकिन दूसरे छोटे बच्चों पर इसका ग़लत असर पड़ सकता है तो वह बच्चा आपकी बात सकारात्मक तरीक़े से लेगा. निश्चित रूप से शिक्षकों को और स्कूल प्रबंधन को इस पहलू पर विचार करने की ज़रूरत है."

शारीरिक दंड

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इंफोल्ड इंडिया प्रोएक्टिव हेल्थ ट्रस्ट के डॉक्टर शैबिया सलदनहा कहते हैं, "दो पीढ़ियों के बीच का पारंपरिक फ़ासला अब घटकर पांच साल रह गया है. इसकी वजह से सोशल मीडिया तक उनकी पहुंच है. यह कुछ ऐसा है कि वयस्क लोग समझ नहीं पा रहे हैं और उन्हें पता नहीं है कि इससे कैसे निपटें. बच्चों को आज़ादी, विचारधारा और जीवन मूल्य सिखाये जाने की बहुत ज़रूरत है. इसलिए आपको उन्हें समझने की ज़रूरत है और वे जबाव देंगे."

डॉक्टर शेषाद्री इशारा करते हैं कि स्कूलों में बच्चों को शारीरिक दंड पर रोक लगाए जाने को लेकर पहले से ही दिशानिर्देश दिए गए हैं. इनका पालन किए जाने की ज़रूरत है ताकि भविष्य में ऐसे हादसों को रोका जा सके.

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