बिहारः गवर्नर की भूमिका क्यों है अहम?

- Author, मनीष शांडिल्य
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी डॉट कॉम के लिए
बिहार में संवैधानिक संकट की स्थिति पैदा हो गई है. ऐसा लंबे समय के बाद हुआ है.
दो अलग नेता- मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी और भूतपूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार विधानसभा में बहुमत का दावा कर रहे हैं.
बिहार की सियासी उठापटक के बीच, ऐसे कई सवाल उठे हैं जिनके जवाब उत्सुकता पैदा करते हैं.
मसलन, मुख्यमंत्री के विधानसभा भंग करने की सिफारिश के मायने क्या हैं.
ये भी कि जीतनराम मांझी और नीतीश कुमार के दावों के बीच बहुमत के फ़ैसला का संवैधानिक तरीका क्या है?
बहुमत का फ़ैसला
मांझी ने रविवार को दिल्ली में फिर दोहराया कि वे 20 तारीख को बुलाई गई विधायक दल की बैठक में अपना बहुमत सिद्ध कर देंगे.

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दूसरी ओर बहुमत का दावा करते हुए जदयू की ओर से रविवार को 129 विधायकों के समर्थन संबंधी पत्र राजभवन को सौंपा गया.
खबरें हैं कि नीतीश कुमार सोमवार को सुबह अपने समर्थक विधायकों की ‘परेड’ राजभवन में करा सकते हैं.
ऐसे में सवाल यह है कि इस परेड का औचित्य क्या है, दावे-प्रतिदावों के बीच बहुमत का फैसला कैसे होगा?
इन सवालों पर त्रिपुरा के भूतपूर्व राज्यपाल सिद्धेश्वर प्रसाद कहते हैं, ‘‘जब गुटों द्वारा विरोधी दावे किए जा रहे हों, तो राज्यपाल विधायकों को बुलाकर यह पूछ सकते हैं कि वे किस गुट के साथ हैं.’’
साथ ही सिद्धेशर यह भी बताते हैं कि सामान्य स्थिति में विधानसभा ही वह सर्वोच्च संस्था है जहां बहुमत का फैसला किया जाना चाहिए.
मांझी अधिकृत
शनिवार को मुख्यमंत्री मांझी ने कैबिनेट बैठक की थी और उसमें विधानसभा भंग करने के प्रस्ताव पर उचित समय पर उचित निर्णय लेने के लिए मुख्यमंत्री को अधिकृत किया गया है.
लेकिन शनिवार को इस बैठक से बाहर निकलते हुए नीतीश खेमे के मंत्रियों ने यह दावा किया था कि इस प्रस्ताव का समर्थन केवल सात मंत्रियों ने किया जबकि 21 मंत्रियों ने इसका विरोध किया था.
अगर मुख्यमंत्री आने वाले दिनों में विधासभा भंग करने की सिफारिश करते हैं तो क्या ये सिफारिशें कानूनन वैध है?
‘कानूनन अवैध’
इस सवाल पर बिहार के पूर्व महाधिवक्ता शशि अनुग्रह नारायण कहते हैं, ‘शनिवार की बैठक में मंत्रियों का बहुमत इस प्रस्ताव के विरोध में था और इस बीच जदयू के नए नेता भी चुन लिए गए हैं.’’

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नारायण के अनुसार ऐसे में अगर मुख्यमंत्री विधानसभा भंग करने की सिफारिश करते हैं तो यह कानूनन अवैध होगा.
वहीं पटना हाइकोर्ट के वरिष्ठ वकील नीतिरंजन झा का मानना है कि राज्यपाल को पहले इस फैसले के प्रति संतुष्ट हो जाना चाहिए.
वे बताते हैं, ‘‘कैबिनेट का फैसला सर्वसम्मति से होता है. लेकिन जहां सर्वसम्मति पर सवालिया निशान हो, वहां राज्यपाल को पहले तहकीकात कर संतुष्ट हो जाना चाहिए कि मंत्रिमंडल ने सर्वसम्मति से फैसला लिया है या नहीं.
राज्यपाल की भूमिका
बिहार में मुख्यमंत्री और राज्यपाल के आवास महज कुछ सौ मीटर के फ़ासले पर हैं. और अब यह तय करने में राज्यपाल की महत्वपूर्ण भूमिका मानी जा रही है कि उनके पड़ोसी जीतन राम मांझी बने रहेंगे या नीतीश फिर से उनके पड़ोसी बनेंगे.
दूसरी ओर एक स्थिति यह भी हो सकती है कि राज्यपाल को बिना पड़ोसी के भी रहना पड़े. ऐसा होगा, अगर मांझी-नीतीश दोनों ही बहुमत साबित करने में नाकाम रहते हैं या फिर विधानसभा भंग कर दी जाती है.
बिहार के कार्यकारी राज्यपाल केसरीनाथ त्रिपाठी पटना पहुंच रहे हैं. और बिहार के वर्तमान सियासी हालात में आने वाले दिनों में नजरें राजभवन पर भी टिकी रहेंगी.
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