बिहारः सियासी महाभारत की मुकम्मल तस्वीर

- Author, मनीष शांडिल्य
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी डॉट कॉम के लिए
बिहार में सत्तारूढ़ जनता दल यूनाइटेड (जदयू) में मचा सियासी घमासान अब खुलकर सामने आ गया है.
इसकी शुरुआत गुरुवार को तब हुई जब लंबे अंदरूनी खींचतान के बाद जदयू की ओर से शनिवार को पार्टी विधानमंडल दल की बैठक बुलाने की घोषणा की गई थी.
बिहार के मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी ने इस बैठक को असंवैधानिक क़रार दिया है. इस बीच मांझी ने महाभारत के पात्रों और घटनाओं के ज़रिए पार्टी में अपने साथ हो रहे व्यवहार को सामने रखा.
‘नीतीश बने भीष्म’
उन्होंने सहरसा में आयोजित एक जनसभा में कहा कि पार्टी के कुछ नेता उनका राजनीतिक ‘चीरहरण’ कर रहे हैं और ऐसे में नीतीश कुमार ‘भीष्म पितामह’ बने बैठे हैं.
मांझी ने यह भी कहा कि वह इस राजनीतिक लड़ाई में अब पीछे हटने वाले नहीं हैं. लेकिन बिहार के इस सियासी महाभारत में आगे क्या होगा इसको लेकर अभी हालात स्पष्ट नहीं हैं.
'हिंदुस्तान' अख़बार के राजनीतिक संपादक विनोद बंधु कहते हैं, ''बिहार की सियासी तस्वीर जदयू विधानमंडल दल की बैठक में आने वाले विधायकों की संख्या से साफ़ होगी.''

इस बीच सियासी महाभारत की एक झलक जदयू के प्रदेश कार्यालय के बाहर मांझी और नीतीश समर्थकों के बीच हुई मारपीट के रूप में भी सामने आई जिसमें क़रीब दर्जन भर लोग घायल हुए.
राजद-जदयू साथ
हाल के दिनों में मांझी को लालू प्रसाद और उनकी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल (राजद) का समर्थन और सहानुभूति मिलती रही है. लेकिन शुक्रवार को लालू ने साफ़ किया कि राजद जदयू के फ़ैसले के साथ होगा.
माना जा रहा है कि राजद ने फ़िलहाल यह फ़ैसला इस कारण लिया है चूंकि वर्तमान में मांझी ख़ेमे का झुकाव भाजपा की ओर है और भाजपा विरोध राजद का प्रमुख राजनीतिक एजेंडा है.
भाजपा के संकेत
बिहार में मचे सियासी घमासान का एक दिलचस्प पहलू फ़िलहाल यह भी है कि पूरा विपक्ष अभी मांझी के पक्ष में दिखाई दे रहा है.

हाल के दिनों में बिहार की मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा मांझी को लेकर नरम रवैया अपनाती रही है. जदयू में मचे उठा-पटक के बीच प्रदेश भाजपा ने संकेत भी दिए हैं कि उसके सभी विकल्प खुले हुए हैं.
मांझी का कद
राजनीतिक विश्लेषक प्रभात शांडिल्य मांझी के वर्तमान राजनीतिक क़द को इन राजनीतिक संकेतों की वजह मानते हैं.
प्रभात कहते हैं, ''महादलितों के मंडलीकरण के दौर में मांझी नीतीश कुमार और शरद यादव पर भारी पड़ते दिखाई दे रहे हैं. और ऐसे में हर दल उन्हें समर्थन देने को मजबूर है.''

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माना जा रहा है कि मांझी ख़ेमा अगर कम-से-कम तीस विधायकों को अपने पाले में कर ले तभी भाजपा मांझी के समर्थन में खुलकर सामने आएगी.
लेकिन विनोद बंधु के अनुसार शुक्रवार शाम तक मांझी के समर्थन में आने वाले विधायकों की संख्या बीस का आंकड़ा भी नहीं छू पाई थी.
क़ानूनी दांव-पेंच
तीस विधायकों का समर्थन जुटानेे के बाद मांझी ख़ेमे के सामने दल-बदल विरोधी क़ानून सहित कई दूसरे क़ानूनी और संवैधानिक पेंच भी सामने आ सकते हैं.

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लेकिन ये तब सामने आएंगे जब शनिवार शाम की बैठक के बाद दोनों ख़ेमों के राजनीतिक दावे सामने आएंगे.
इन सबके बीच शनिवार की बैठक के जवाब में मुख्यमंत्री मांझी ने भी 20 फ़रवरी को विधायक दल की बैठक बुलाई है.
लेकिन इस पर जदयू के प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ ने चुटकी ली है कि आज की जदयू की बैठक के बाद मांझी को यह बैठक बुलाने की ज़रुरत नहीं पड़ेगी.
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