अमिताभ बच्चन से मिला कि उनके किरदार से?

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- Author, राजेश जोशी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
होटल सन-एंड-सैंड के उस सीलन की बू वाले बड़े से हॉल में घुसते ही लगा कि यहाँ के पर्दे और क़ालीन बरसों से नहीं बदले गए हैं, और न ही एक अरसे से ताज़ा हवा और धूप यहाँ आई है.
हालाँकि बाहर मुंबई की गुनगुनी धूप और सामने विस्तृत अरब सागर पसरा हुआ था. पर भीतर एकदम उदास अँधेरा.
अवसाद पैदा करने वाली ऐसी घुप्प अँधेरी जगह पर “सदी के महानायक” के साथ मेरी मुलाक़ात हुई.
पर उनसे मिलने वाला मैं अकेला नहीं था. हॉल में अलग-अलग जगहों पर ‘षमिताभ’ फ़िल्म के पोस्टरों वाले पार्टिशन खड़े करके अस्थायी टीवी स्टूडियो बना दिए गए थे. वीडियो कैमरे तैयार थे.
इंटरव्यू करने वाले और उनके सहयोगी यहाँ-वहाँ चहलक़दमी करते हुए ‘उनके’ आने का इंतज़ार कर रहे थे.
प्लीज़ कीप क्वायट!
एक कोने में बने काउंटर के पीछे चाय सर्व करने वाले दो लड़के (दोनों इलाहाबादी) आपस में चुहलबाज़ी कर रहे थे. मैंने उनसे पूछा – “आप लोग नहीं मिलेंगे उनसे?”
किनसे या क्या पूछने की ज़रूरत दोनों लड़कों ने नहीं समझी. स्पष्ट था कि मैं किसका ज़िक्र कर रहा हूँ. जवाब आया – “अरे यहाँ दिन में हज़ार आते हैं. अब बोर हो गए हैं.”

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तभी दूसरे कोने से किसी ने लगभग डाँटने वाले ऊँचे स्वर में कहा – “प्लीज़ कीप क्वायट!”
महानायक अभी पहुँचे नहीं थे पर उनके आने के अंदेशे में एक सतर्कता भरे माहौल को बुनने की कोशिश शुरू हो चुकी थी.
पब्लिक रिलेशंस की नर्वस लड़कियाँ मुस्कुराने की कोशिश में थीं और तभी पूरे हॉल में एक हलचल सी उठी – जैसे किसी ने एक कोने से दूसरे कोने तक करंट फैलाया हो.
“ही इज़ कमिंग” – पीआर की एक लड़की ने सरग़ोशी में बताया. चारों ओर ख़ामोशी सी तारी हो गई.
पर ये फ़ॉल्स अलार्म साबित हुआ.
नपातुला अंदाज़
ये समझते ही हॉल में एक बार फिर बातचीत की गुनगुनाहट फैल गई जो फिर तभी टूटी जब सफ़ेद झक पठानी सूट पहने, (राजीव गाँधी के स्टाइल में) एक कंधे के ऊपर काला शॉल ओढ़े, बॉडी गार्डों से घिरे, सफ़ेद रंग की फ़्रेंच दाढी, चश्मा पहने लहीम-शहीम क़द के उस शख़्स ने सीलन की बू और अँधेरे-से हॉल में क़दम रखा.
उसके बाद सब कुछ एकदम मशीनी ढंग से हुआ – एक अच्छी रिहर्सल के बाद मंच पर खेले जाने वाले नाटक की तरह. जिसमें सब कुछ ऐसा नाटक जिसे उस शख़्स ने जवानी के दिनों में खेलना शुरू किया और मंच के एक कोने से दूसरे कोने तक पहुँचते-पहुँचते वो बुज़ुर्ग हो गया हो.

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मैं अमिताभ बच्चन से रू-ब-रू था. वो आकर सबसे पहले हमारे इंटरव्यू के लिए लगाए गए सोफ़े में बैठ गए. सामने टीवी कैमरे लगे थे. वो ‘शॉट’ देने को तैयार थे.
आज अमिताभ बच्चन को ‘षमिताभ’ के प्रमोशन के लिए एक के बाद एक कई इंटरव्यू देने थे. उनको बस वही और उतनी ही बात कहनी थी जितनी फ़िल्म के प्रोड्यूसरों ने तय की थी: कहानी की बस झलक भर देनी है, क्या हुआ और क्यों हुआ इस पर कोई चर्चा नहीं करनी.
मैं सवाल पूछ रहा हूँ और वो जवाब दे रहे हैं – एकदम नपातुला अंदाज़. सोचे-समझे वाक्य. चेहरे पर लगातार बनी हुई गंभीरता. कहीं कोई और भाव ग़लती से भी न आने पाए. एकदम सपाट चेहरा.
मेरे सवाल जारी हैं: ‘षमिताभ’ में आप सफ़ेद बिखरी बाल-दाढ़ी में आए हैं, इस किरदार को कैसे आपने रचा? एक दृश्य में आप टॉयलेट सीट पर बैठकर गाते नज़र आते हैं. इस दृश्य की क्या कहानी है? आपने ख़ुद को ‘एंग्री यंगमैन’ की इमेज से बाहर निकालने के लिए क्या किया?
आप एक कलाकार के तौर पर ख़ुद को कैसे ‘री-डिफ़ाइन’ करते हैं? अमर सिंह से आपके रिश्तों में खटास क्यों आई? राजनीति से चिढ़ क्यों? मीडिया से नरम-गरम रिश्तों का कारण? इलाहाबाद की, बचपन के दिनों की यादें?
मशीनी जवाब

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उनके जवाब भी पूरे मशीनी अंदाज़ में जारी हैं: आज इस फ़िल्म के बारे में ही बात करें तो ठीक है. टॉयलेट सीट पर गाने का दृश्य निर्रथक नहीं है. आप फ़िल्म देखेंगे तो समझ जाएँगे. अब उम्र हो गई है जैसे रोल मिलते हैं कर लेते हैं. अमर सिंह हमारे मित्र हैं और रहेंगे. राजनीति मुझे नहीं आती. मीडिया के हमेशा गरम रिश्ते रहे. यादें तो बचपन की बनी ही हुई हैं.
कहीं कोई आवेश नहीं. न उत्तेजना. न नॉस्टेल्जिया. न ख़ुशी. न हँसी. न कोई बेसाख़्तापन. न उतार. न चढ़ाव. गोया सब कुछ किसी मशीन ने तय कर दिया हो और सब कुछ उसी प्रोग्रामिंग के हिसाब से चल रहा हो.
मैं लगातार सोच रहा हूँ –ज़िंदा इंसानों के सामने क्या अमिताभ बच्चन अपने मानवीय भाव कभी नहीं लाते होंगे? क्या अपने सभी मानवीय भाव सिर्फ़ कैमरे के सामने प्रकट करने के लिए रख छोड़े हैं?
कैमरे के सामने उन्होंने क्या-क्या नहीं किया – रोए, गाए, चीख़े, चिल्लाए, प्रेम किया, छेड़छाड़ की, चोरी की, क़त्ल किए, पर्दे के माँ-बाप के मरने पर दहाड़ें मारीं. यहाँ तक कि ख़ुद अपनी मृत्यु को भी उन्होंने कैमरे के सामने जी लिया. एक नहीं कई कई बार.

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अब तक मैंने दूसरों की तरह सिनेमा के पर्दे पर उस शख़्स को देखा था जो अमिताभ बच्चन नहीं होता. वो एक किरदार होता है जिसे अमिताभ बच्चन नाम का कलाकार जीने की कोशिश करता है. हम अक्सर उस कलाकार के व्यक्तित्व और उसके किरदारों में घालमेल करते हैं.
और उम्मीद करते हैं कि वो व्यक्ति पर्दे के बाहर निकल कर भी अपने किसी न किसी सिनेमाई किरदार की तरह व्यवहार करे – हमारे सामने नाचे, गाए, रोए, चिल्लाए या किसी न किसी तरह की ‘परफ़ॉर्मेंस’ ही करता रहे.
काश कि ऐसा होता
सुपर स्टार जब सिनेमा के पर्दे से बाहर निकल कर एक एक किरदार नहीं बल्कि एक इंसान की तरह व्यवहार करता है तो ये उसके दर्शकों को स्वीकार्य नहीं होता. पत्रकार भी मूलत: सिनेमा का दर्शक ही तो होता है.
मैं चाहता था अमिताभ बच्चन मेरे पाँच सेकेंड के सवाल पर दो मिनट तक बोलें. अपना कलेजा खोल के रख दें. मेरे पुट्ठे पर हाथ मारकर कहें – अरे भाई, इलाहाबाद की तो बात ही क्या है!! अपना सुख-दुख मेरे साथ बाँटें.

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अरे, मैं ये क्या चाह रहा था?
मेरे पास अभी और वक़्त था पर अमिताभ बच्चन के नपे-तुले (और कई बार दिए जा चुके) जवाब आख़िर कहाँ तक सुन सकता था? मैंने बीस मिनट में ही इंटरव्यू ख़त्म कर ‘सदी के महानायक’ से इजाज़त ले ली. पीआर वाली लड़की हैरान थी कि मैंने पूरा वक़्त क्यों नहीं लिया?
होटल सन-एंड-सैण्ड के उस हॉल में सीलन की बू और अँधेरा अब भी फैला था. मैं बाहर आ गया जहाँ जनवरी की खुली धूप और सामने अरब सागर का खुला विस्तार था.
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