अमरीका से भारत को क्या चाहिए?

ओबामा और मोदी

इमेज स्रोत, Getty

अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा तीन दिन की यात्रा पर 25 जनवरी को भारत आ रहे हैं.

यह यात्रा प्रतीकात्मकता तक ही सीमित रहेगी या इससे कुछ ठोस निकलेगा? क्योंकि दोनों देशों के संबंधों में एक लंबे समय तक गतिरोध बना रहा था. कई ऐसे मुद्दे हैं जिनमें दोनों देशों के हित टकराते हैं.

क्या इस दौरे में नागरिक परमाणु समझौते जैसे इन मुद्दों पर कुछ ख़ास प्रगति हो पाएगी?

इससे भी महत्वपूर्ण सवाल है कि इस दौरे में ओबामा का एजेंडा क्या होगा और मोदी अपने एजेंडे में कितना सफल हो पाएंगे.

इस संबध में बीबीसी संवाददाता बृजेश उपाध्याय ने कार्नेगी एंडाउमेंट फ़ॉर इंटरनेशनल पीस संस्था के साउथ एशिया प्रोग्राम के एसोसिएट मिलान वैष्णव से बात की.

पढ़ें बातचीत के अंश

मोदी ओबामा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अमरीका-भारत संबंध को आप कैसे देखते हैं? संबंधों में कितना बदलाव आया है और क्यों?

लोकप्रिय उम्मीदों के संदर्भ में देखें तो अमरीका-भारत संबंध कहीं उससे भी सहज गति से आगे बढ़ा है, जितना लोगों ने कल्पना की थी. याद करें, मोदी के क़रीबी समेत अधिकांश विश्लेषकों ने अनुमान लगाया था कि लंबे समय तक अमरीका में प्रवेश न देने के कारण मोदी अमरीका को ठंडी प्रतिक्रिया देंगे. लेकिन प्रधानमंत्री ने बिल्कुल अलग रुख़ अख़्तियार किया और ओबामा प्रशासन ने नए प्रधानमंत्री के साथ संबंधों को सुधारा. लेकिन संबंध के मूल में बहुत महत्वपूर्ण बदलाव नहीं आया है, कम से कम अभी तक तो नहीं. लेकिन खोब्रागड़े मामले के बाद दोनों के बीच आई कटुता के बाद दोनों पक्षों को संबंधों में सुधार लाने में सफलता मिली है. शब्दाडंबर और प्रतीकात्मक ही सही, दोनों ही पक्षों ने लगातार महत्वपूर्ण क़दम उठाए हैं, लेकिन प्रतीकात्मकता ज़ल्द ही धरातल पर उतरेगी.

देवयानी खोब्रागड़े

इमेज स्रोत, AFP

ओबामा की इस यात्रा के उद्देश्य का मुख्य बिंदु क्या होगा और उनकी भारत यात्रा का दोनों देशों के लिए प्रतीकात्मक महत्व कितना है?

राष्ट्रपति ओबामा भारत की यात्रा पर जाने वाले हैं. एक पूरा दिन वो मोदी सरकार के अधिकारियों से मुलाक़ात करेंगे, उसके बाद राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के साथ रात्रिभोज करेंगे. इस दौरे की सबसे अहम प्रतीकात्मक बात होगी भारत के गणतंत्र दिवस की परेड में, उनका मुख्य अतिथि होना. ऐसी भी ख़बरें हैं कि सीईओ के साथ बैठक, दिल्ली टाउन हॉल में एक सभा और आगरा में ताज महल देखने का कार्यक्रम है. इस दौरे के साथ जुड़ी हुई प्रतीकात्मकता अधिक महत्व की है क्योंकि यह पहली बार हो रहा है कि अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति दो बार भारत आए और पहली बार एक अमरीकी राष्ट्रपति गणतंत्र दिवस में मुख्य अतिथि बनने जा रहे हैं. राष्ट्रपति के पास, प्रधानमंत्री के आमंत्रण को ठुकराने के कई अच्छे कारण थे, लेकिन उन्होंने उसे स्वीकार किया. इसलिए आगामी दौरे से स्वतः ही वाशिंगटन की नज़रों में भारत की स्थिति ऊंची हो गई है.

मोदी

इमेज स्रोत, Reuters

इस दौरे में ओबामा के एजेंडा के मुख्य लक्ष्य क्या होंगे?

प्रतीकात्मकता से परे, दोनों तरफ़ की उम्मीदें काफ़ी ज़्यादा हैं कि इस दौरे से कुछ ठोस प्रगति हो. पिछले सितम्बर में प्रधानमंत्री की वॉशिंगटन यात्रा बहुत कुछ 'जानने समझने' जैसी थी. इसमें कोई शक नहीं कि मूलभूत मुद्दों पर बात हुई और नए वादे किए गए, लेकिन इस यात्रा की सबसे मुख्य बात कोई है तो वो है दोनों सरकारों के बीच कामकाजी रिश्ता क़ायम करना, जो कि स्वाभाविक रूप से दोनों नेताओं के बीच का भी रिश्ता है. भारत के संदर्भ में ओबामा के पास चार मुख्य मुद्दे हैं: आर्थिक, रक्षा, नागरिक परमाणु सहयोग और ऊर्जा एवं जलवायु परिवर्तन. इस सूची में और न जाते हुए, मैं समझता हूं कि राष्ट्रपति प्राथमिकता के आधार पर इन मुद्दों पर कुछ ठोस प्रगति की उम्मीद कर रहे हैः भारत के परमाणु उत्तरदायित्व क़ानून के कारण परमाणु सहयोग में आई रुकावट से पार पाना, कार्बन उत्सर्जन पर भारत से नया वादा कराना, भारत-अमरीका के बीच एक नया रक्षा समझौता और आर्थिक सुधारों पर नए सिरे से आश्वासन पाना ताकि विदेशी निवेशकों को मदद मिल सके.

मेक इन इंडिया

इमेज स्रोत, AFP

भारत के लोग ओबामा और अमरीकी सरकार से क्या उम्मीद करते हैं?

भारतीय सूची भी उतनी ही लंबी है, लेकिन कुछ मुद्दे शीर्ष पर हैं. जलवायु परिवर्तन और ऊर्जा बातचीत के अलावा भारत अमरीका से निर्यात होने वाली शेल गैस में अपना हिस्सा सुरक्षित करना चाहता है. वर्तमान में, यह निर्यात केवल उन्हीं देशों तक सीमित है, जिनके साथ अमरीका ने मुक्त व्यापार समझौता कर रखा है और इस सूची में भारत नहीं है. भारत इससे स्थाई छूट चाहता है. इसके अलावा, भारतीय टेक्नोलॉजी और स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में अमरीकी निवेश को प्रोत्साहित करना पसंद करेंगे. अपने 'मेक इन इंडिया' योजना के मार्फ़त भारत सरकार घरेलू रक्षा उत्पादन को पुनर्जीवित करने को उत्सुक है. यह एक ऐसी जगह है, जहां अमरीकी कम्पनियां और तकनीक काफ़ी मूल्यवान साबित हो सकती है. और अंततः भारत का अपने पड़ोसियों के साथ मुद्दा है. अफ़ग़ानिस्तान से अमरीकी सेना की वापसी के बाद वहां अस्थिरता की आशंका को लेकर भारत चिंतित है.

अफ़गानिस्तान राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी

इमेज स्रोत, EPA

इमेज कैप्शन, अफ़गानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी.

वे इस बारे में फ़िर से सुनिश्चित होना चाहेंगे कि अमरीकी ऐसे ही न चले जाएं और इस देश से हाथ साफ खींच लें. लेकिन अफ़ग़ानिस्तान पर तब तक बात नहीं हो सकती जब तक पाकिस्तान बातचीत में हिस्सा न ले. भारतीय अधिकारियों को चिंता है कि अमरीका के हालिया बयान और पाकिस्तान को लेकर उसकी कार्रवाईयां दोनों के संबंध में सुधार का संकेत हैं. यह भारत के पक्ष में नहीं है, जो हिंसक जिहादी संगठनों के प्रति पाकिस्तान के रक्षा-ख़ुफ़िया प्रशासन के रुख़ को लेकर हमेशा आशंकित रहता है.

आने वाले महीनों में भारत-अमरीका संबंध के कैसे विकसित होने की उम्मीद करते हैं?

मैं समझता हूं कि अमरीका-भारत के संबंध के आसार काफ़ी सकारात्मक हैं. संबंधों की अधिकांश बाधाएं- चाहे वो व्यापार, बौद्धिक सम्पत्ति या अप्रवासन हो, अभी ख़त्म नहीं हुई हैं.

भारत में प्रदर्शन

इमेज स्रोत, AP

लेकिन दोनों ओर से इन्हें हल करने और आगे बढ़कर मुश्किल मुद्दों पर काम करने की इच्छा दिखाई देती है.

इंच दर इंच प्रगति हो रही है; रातोंरात कोई बहुत बड़ा बदलाव नहीं होने जा रहा है.

यहां तक कि यदि राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री अपने-अपने एजेंडे के मुद्दों पर कुछ आगे बढ़ने में सफ़ल हो जाते हैं, तो भी इन्हें लागू करना कठिन होगा. मैं समझता हूं कि इस दौरे की महत्वपूर्ण बात है कि संबंधों का ढर्रा दक्षिण दिशा की ओर मुड़ रहा है.

<bold>(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप <link type="page"><caption> यहां क्लिक</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi" platform="highweb"/></link> कर सकते हैं. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)</bold>