क्या स्पाइस जेट की उड़ानें जारी रहेगी?

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- Author, कपिल कौल
- पदनाम, उड्डयन मामलों के जानकार
कर्ज़ का भुगतान न होने के कारण भारतीय विमान कंपनी स्पाइस जेट के विमानों के 'ग्राउंड' होने के बाद कंपनी को ईंधन की आपूर्ति दोबारा शुरु हो गई है.
कंपनी के नगद भुगतान करने के बाद ऐसा संभव हो पाया लेकिन तेल कंपनियों को भुगतान की तलवार लगातार स्पाइस जेट पर लटक रही है.
कंपनी का कर्ज़ लगभग 2000 करोड़ रुपए है.
ईंधन नहीं मिलने की वजह से स्पाइस जेट की उड़ानों पर बुरा असर पड़ा है और यात्रियों शिक़ायत करने पर मजबूर हुए हैं.
इन शिक़ायतों के बाद सरकार मदद के लिए आगे आई और बैंकों को उधार देने के लिए कहा.
स्पाइस जेट को बचाने की कवायद में सरकार के शामिल होने होने पर सवालों का सिलसिला शुरू हो गया है.
बेलआउट पैकेज !

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कुछ हलकों से ये आवाजें उठ रही हैं कि स्पाइस जेट को आर्थिक मदद दिए जाने की मांग किस हद तक जायज़ है.
हालांकि विश्लेषक इसे बेलआउट पैकेज मानने से इनकार कर रहे हैं. सरकार ने बैंकों से गुजारिश की है कि स्पाइस जेट के आवेदन पर सहानुभूतिपूर्वक विचार किया जाए.
यह एयरइंडिया की तरह करदाताओं का पैसा किसी कंपनी को दिए जाने का मामला नहीं है.
अगर बैंक स्पाइस जेट को लोन देने का फैसला करते हैं तो इसके प्रमोटर को कर्ज़ से कम से कम डेढ़ गुना ज्यादा रकम प्रतिभूति के तौर पर जमा करनी होगी.
यह किसी भी लिहाज से बेलआउट नहीं है लेकिन सरकार ने एक अच्छा कदम उठाया है.
अर्थव्यवस्था

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स्पाइस जेट को सरकार की तरफ से जिस तरह की मदद मिल सकती है, दी जा रही है. लेकिन किसी तरह का नगद भुगतान नहीं किया गया है.
उसे टैक्स में कोई छूट नहीं दी गई है, न ही कोई शुल्क कम किया गया है. अर्थव्यवस्था के लिए एयरलाइन सैक्टर बड़ी भूमिका रखता है. तेल कंपनियों और सरकार के लिए भी इसका ख़ासा महत्व है.
इस सेक्टर में 5,000 लोग काम कर रहे हैं. इसके अलावा 20,000 और लोगों की रोजी़-रोटी इससे किसी न किसी तरह जुड़ी हुई है.
सरकार सकारात्मक भूमिका निभा रही है कि अगर एयरलाइन को बचाया जा सकता है तो बचाया जाना चाहिए.
किंगफिशर से तुलना

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कई लोग इसे किंगफिशर के दिवालिया होने की घटना के दोहराव के तौर पर देख रहे हैं.
लेकिन किंगफिशर का मामला इससे अलग है. तब उसकी हालत खराब होने का सिलसिला लगभग डेढ़ साल पहले से ही चला आ रहा था.
उसे बंद होने में भी दो साल लग गए थे. हालांकि किंगफिशर के प्रमोटर उसे बचाने के लिए आखिरी दिन तक रोज़ाना चार से पांच करोड़ रुपये तक का निवेश कर रहे थे.
उनके आख़िरी एक-दो साल मुश्किल भरे बीते थे. उन्हें विमानन सेवाएँ मुहैया कराने में अधिक लागत आ रही थी और देश का सकल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) गिर रहा था.
तब विकास दर भी गिर रही थी और बाज़ार में कड़ी प्रतिस्पर्द्धा का माहौल था. तब विदेशी निवेश की इजाज़त नहीं थी.

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स्पाइस जेट उस तरह से कर्ज़ में नहीं डूबा है और किंगफिशर से कहीं बेहतर स्थिति में है.
लेकिन मुश्किल ये है कि स्पाइस जेट नगदी के संकट से जूझ रहा है और हालात ऐसे हैं कि रोज़मर्रा के ख़र्चे के लिए ज़रूरी रकम भी उसके पास नहीं है.
कंपनी के प्रमोटर फिलहाल इस स्थिति में नहीं हैं कि वे इसमें और पैसा लगा सकें.
वैसे भी किंगफिशर की घटना के बाद विमानन बाज़ार की स्थिति देखते हुए बैंक इसमें पैसा लगाने से हिचक रहे हैं.
हालांकि हालात अब पहले की तरह खराब नहीं हैं, ईंधन की कीमतें कम हैं और आर्थिक विकास की रफ्तार तेज़ हो रही है.
मुश्किल चुनौती

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ऐसे में ये सवाल उठता है कि स्पाइस जेट के हवाई सफर को फिर से शुरू करने का रास्ता अब क्या है. कंपनी को नए निवेश की ज़रूरत है.
एक अनुमान के मुताबिक, स्पाइस जेट को 1500 करोड़ रुपये के फौरी निवेश की दरकार है जिससे कंपनी की हालत बेहतर हो सके.
हालांकि कंपनी को पैसे की ज़रूरत आगे भी पड़ेगी. ऐसे में या तो प्रमोटर पैसा लगाएं या फिर नया निवेशक खोजा जाए या फिर दोनों मिलकर पैसा लगाएं.
अगर कंपनी इस पर फौरी अमल कर पाएगी, तभी उसकी हालत सुधरने के आसार हैं. हालांकि ये एक मुश्किल चुनौती है पर संभावनाएं बरकरार हैं.
(बीबीसी सहयोगी वैभव श्रीवास्तव से बातचीत पर आधारित)
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