आपकी गाड़ी क्यों सुरक्षित नहीं है?

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- Author, वैभव दीवान
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
एक मोटरसाइकिल पर लदा पूरा परिवार, ट्रैफ़िक को चीरते, सरपट बढ़ते दोपहिया वाहन भारत में हर जगह हैं.
यहां ज़्यादातर मध्यवर्गीय परिवार दोपहिया गाड़ी के सहारे ही है.
पर जब यही स्कूटर या बाइक चलाने वाला खुद को एक कदम आगे बढ़ाना चाहता है- यानी दो से चार पहिये पर जाता है तो ये उसे सुरक्षित महसूस कराता है. पहली कार सोशल स्टेटस लाती है.

गाड़ी के आने से धूप, छाँव, बारिश, गर्मी - सबसे मुक्ति और परिवार को सेफ़्टी मिलती है.
पर इस सबके बीच एक मध्यवर्गीय परिवार के गाड़ी खरीदने के सपनों को तब लात पड़ी जब एक अंतरराष्ट्रीय संस्था ने भारत की सबसे किफ़ायती और पसंदीदा कार मारुति आल्टो को असुरक्षित बताया.
यूरोप की इस संस्था ग्लोबल ऍनकैप ने भारत में बनी 7 गाड़ियों का क्रैश टेस्ट किया.

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टेस्ट से पता चला की अगर इन गाड़ियों के साथ कोई भीषण हादसा होता है तो ना तो ये गाड़ी बचेगी और ना ही इसमें बैठे लोग.
टेस्ट में ये गाड़िया वो थीं जो आम तौर पर मध्यवर्गीय परिवारों की पहली पसंद होती है.
इन गाड़ियों में नाम था टाटा नैनो, हुंडई आई 10, सुज़ूकी मारुति स्विफ़्ट, फ़ोर्ड फ़िगो, डैटसन गो और भारत में ही बनी फ़ॉक्सवैगन पोलो का.
सुरक्षा या कीमत?
इन गाड़ियों को क्रैश टेस्ट पास करने के लिए और सुरक्षा के मानको पर ख़रा उतरने के लिए ज़रूरी है की गाड़ी में एयरबैग्स और एंटी लॉक ब्रेक्स हों.
कार बनाने वाली कंपनियों का कहना है कि, जो मध्यवर्गीय एक पहली कार लेता है- उसके लिए कार की सुरक्षा से ज़्यादा दाम मायने रखता है.
मारुति सुज़ूकी के चेयरमैन आरसी भार्गव का कहना है कि जिस मापदंड को इस यूरोप की कंपनी ने भारतीय गाड़ियों के लिए इस्तेमाल किया है उस तरह भारत में गाड़ियां नहीं चलती.

भार्गव कहते हैं, ''यहां शहर में गाड़ियों की स्पीड कम होती है और इसीलिए शहरी गाड़ियों में एयरबैग्स और एबीएस की ज़रूरत नहीं है.
आज से 20 साल पहले यूरोप में भी ये सुरक्षा के उपाय मौजूद नहीं थे.''
भार्गव के हिसाब से आज का भारत 30 साल पहले के यूरोप जैसा है. आज वहां लोग इस मामले में भारतियों से ज़्यादा सचेत हैं.
कार कंपनियों का ये भी कहना है कि वो भारतीय नियमों और मानको के तहत ही गाड़ियों को बाज़ार में उतारती हैं.
पर एयरबैग्स और अन्य मॉडर्न फ़ीचर्स एक गाड़ी को इतना महंगा बना देते हैं कि एक कार खरीदार गाड़ी खरीदने से कतराने लगता है.
बहरहाल भारत में रोड सेफ़्टी एक जटिल विषय है. कोई एक अकेला क़दम भारत की सड़कों को महफ़ूज़ करने के लिए काफ़ी नहीं होगा जहां हर चार मिनट में एक व्यक्ति दुर्घटना का शिकार होता है.
सरकार ने कहा है कि वो अगले साल तक एक ख़ुद का कार क्रैश टेस्ट शुरू करेगी.
जिसके बाद ही पता चलेगा कि क्या आने वाली भारतीय गाड़ियों में सुरक्षा के उपाय अनिवार्य होंगे या उन्हें कम पैसों में ही उपभोक्ता को दिया जायेगा.
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