भारत-रूस: पुरानी दोस्ती के नए इम्तिहान

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- Author, सिद्धार्थ वरदराजन
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ऐसे समय में भारत आए जब उनका देश अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यूक्रेन संकट को लेकर घिरता नज़र आ रहा है.
उनके इस दौरे पर नज़रें इसलिए भी टिकी थीं कि भारत पश्चिमी देशों के साथ खड़ा होगा या फिर रूस का साथ देगा.
वैसे भारत के साथ रूस की पुरानी दोस्ती रही है और दोनों देशों के बीच व्यापक सहयोग में इसकी झलक भी मिलती है.
फिर भी, बदलते सामरिक समीकरणों में रूस और भारत के संबंध भी नई-नई कसौटियों पर परखे जा रहे हैं.
पढ़िए विस्तार दोनों देशों के संबंधों का विश्लेषण
भारत का दशकों पुराना साझेदार रूस उन तमाम चीज़ों की आपूर्ति के लिए पहले से कहीं अधिक आतुर है जिन्हें भारत पश्चिमी देशों से ख़रीदना चाहता है.

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ऐसी चीज़ें जिन्हें पश्चिमी देश भारत को बेचने से कतराते रहे हैं.
गुज़रे दिनों में इन चीजों में स्टील प्लांट, विशाल टरबाइन, सैन्य विमान-टैंक और परमाणु संयंत्र शामिल थे जबकि अब इस सूची में परमाणु हथियार सम्पन्न पनडुब्बी, बाहरी अंतरिक्ष जगत-रॉकेट विज्ञान और असैन्य परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में तकनीक की हस्तांतरण जैसे पहलू शामिल हैं.
भारत पर जब भी क्षेत्रीय या अंतरराष्ट्रीय दबाव पड़ा, रूस भारत के पक्ष में खड़ा हुआ. रूस के प्रति भी भारत का यही रुख़ रहा. भारत के ज़्यादातर युद्धों में रूस भारत का एक मज़ूबत सहयोगी रहा है.
इसी तरह भारत ने रूस का साथ दिया. हंगरी, चेकोस्लोवाकिया और अफ़ग़ानिस्तान पर जब तत्कालीन सोवियत संघ ने आक्रमण किया, तब पश्चिमी जगत ने रूस को अलग-थलग करना चाहा लेकिन तब भी भारत ने पश्चिमी देशों की बजाए रूस का साथ दिया.
आर्थिक प्रतिबंधों का विरोध
भारत और रूस की दोस्ती में यही बात आज भी नज़र आती है.
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने बैठक के समापन पर दिल्ली में ‘भारत और रूस’ नाम से जो विज़न डाक्यूमेंट जारी किया, उसमें दो टूक शब्दों में कहा गया है, ''हम उन आर्थिक प्रतिबंधों का विरोध करते हैं जिन्हें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से मंज़ूरी नहीं मिली है.''

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यहां इस बयान में साफ़ इशारा अमरीका की ओर है. रूस ने यूक्रेन में दख़ल दिया है और अमरीका इस दख़ल के लिए रूस पर शिकंजा कसना चाहता है.
भारत और रूस विज़न डॉक्यूमेंट में दोनों देशों के बीच परमाणु ऊर्जा, रक्षा व्यापार और निर्माण के साथ-साथ बाहरी अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण इस्तेमाल पर सहयोग को बढ़ाने की भी बात कही गई है.
इसमें कोई संदेह नहीं है कि गुज़रते वक़्त ने भारत और रूस के संबंधों में नए आयाम जोड़ दिए हैं. अमरीका भारत को सैन्य साज़ोसामान देने वाले सबसे बड़े आपूर्तिकर्ता के तौर पर उभरा है.
लेकिन व्यापकता के साथ देखें तो पता चलता है कि भारत और रूस के बीच वर्ष 2014 में जो समझौते हुए हैं, उनके पीछे जो सामरिक लक्ष्य हैं, वो उन लक्ष्यों से बहुत अलग नहीं हैं जो एक, दो, चार या पांच दशक पहले थे.
'रूस भारत का सबसे अहम साझेदार'

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूसी राष्ट्रपति पुतिन के साथ वार्ता के समापन पर जब मीडिया को संबोधित किया तो उन्होंने इस बात का ज़िक्र किया कि आज कुछ क्षेत्रों में ख़ासतौर पर रक्षा क्षेत्र में भारत के पास कई विकल्प हैं, लेकिन रूस भारत का सबसे महत्वपूर्ण साझेदार बना रहेगा.
इसकी वजह ये है कि रूस भारत को वो चीज़ें देता है जो अन्य देश नहीं दे सकते. भारत के परमाणु हथियार सम्पन्न पनडुब्बी कार्यक्रम के लिए बेहद ज़रूरी सहयोग इसका उदाहरण है.
मोदी-पुतिन की मुख्य घोषणा के साथ ही असैन्य परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में एक सामरिक विज़न भी जारी किया गया है.
इसमें पुरानी योजना को दोहराते हुए कहा गया है कि भारत में तमिलनाडु राज्य के कुडनकुलम और एक अन्य जगह कुल 12 रूसी रिएक्टर बनाए जाएंगे. इसमें तकनीक के हस्तांतरण की बात हुई जो नई बात है.
गुरुवार को मोदी-पुतिन मुलाक़ात में जो बात अनकही रही, वो ये थी कि पश्चिमी देशों को उम्मीद थी कि भारत, रूस के साथ थोड़ी सामरिक दूरी बनाकर रखने की कोशिश करेगा.
क्राइमिया को जिस तरह यूक्रेन से निकालकर रूस ने अपना हिस्सा बनाया, उस बारे में भारत सरकार की अपनी कुछ आशंकाएं रहीं होंगी, लेकिन ऐसी कोई बात सार्वजनिक रूप से सुनाई नहीं दी.
सामरिक चुनौतियां

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क्राइमिया प्रकरण के बावजूद दक्षिण एशिया, पश्चिम एशिया और समूचे एशिया प्रशांत क्षेत्र में जो सामरिक चुनौतियां हैं, उन्होंने भारत के लिए रूस के महत्व को दोबारा रेखाकिंत कर दिया है.
भारत और रूस प्रमुख वैश्विक मुद्दों पर एक-दूसरे का साथ निभाते रहेंगे लेकिन आर्थिक मोर्चे पर क्या रोमांचित करने वाली वाकई कोई बात है?
मोदी और पुतिन हीरों से जुड़े कारोबार और हाइड्रोकार्बन के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन द्विपक्षीय संबंधों में क़ारोबारी समझौते बहुत मज़ूबत कड़ी साबित नहीं होते.
भारत के पास अपना समृद्ध मानव संसाधन है. रूस के पास गणित, विज्ञान और इंजीनियरिंग में दक्षता है. भारत और रूस को इन दोनों का मेल कराने के तरीक़े तलाशने होंगे.
जब तक ऐसा नहीं होगा, पश्चिमी जगत तकनीक के मामले में महंगा होने के बावजूद आकर्षक बना रहेगा.
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