क्या पढ़ते हैं ओबामा और मोदी?

मोदी और ओबामा

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    • Author, चिदानंद राजघट्टा
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

भारत में नेतागण क्या पढ़ते हैं ये शायद ही किसी को पता होगा.

आज भी हम प्रधानमंत्री मोदी या उनके पूर्ववर्ती मनमोहन सिंह की पढ़ने की आदतों के बारे में ज़्यादा नहीं जानते.

लेकिन इसके विपरीत अमरीका में राष्ट्रपति क्या पढ़ते हैं यह साफ़ होता है और इससे उनके फ़ैसलों को समझना आसान होता है.

ओबामा ने पिछले साल से अब तक कौन सी किताबें ली हैं इससे अंदाज़ लगाया जा सकता है कि वह किस दिशा में सोच रहे हैं.

पढ़िए पूरी रिपोर्ट

जवाहरलाल नेहरू
इमेज कैप्शन, भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू अक्बूटबर 1948 में बीबीसी के स्टूडियो में एक संदेश रिकॉर्ड करते हुए

भारत इस मायने में ख़ुशनसीब था कि उसका पहला प्रधानमंत्री एक विद्वान व्यक्ति था. जवाहरलाल नेहरू एक प्रतिष्ठित लेखक-इतिहासकार थे जिन्होंने अन्य चीज़ों के अलावा प्रभावशाली किताब डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया, ग्लिम्प्स ऑफ़ वर्ल्ड हिस्ट्री और एक दमदार आत्मकथा लिखी.

उनकी बेटी, भारत की तीसरी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी (अंतरिम को छोड़ दें) भी जानी-मानी पढ़ाकू व्यक्ति थीं. अगर बाकी चीज़ें छोड़ भी दें तो उनके पिता के नियमित रूप से लिखे जाने वाले ख़त उन्हें जानकारियां देते रहे होंगे.

देश के नौवें प्रधानमंत्री, पीवी नरसिम्हा राव भी पुस्तक प्रेमी और विद्वान तो थे ही वह मातृभाषा तेलुगु के अलावा मराठी और स्पेनिश में भी मूल साहित्य पढ़ सकते थे.

इनके बीच के और बाद के प्रधानमंत्रियों के पढ़ने की आदतों के बारे में कम ही पता है.

जैसे कि, इसके अलावा कि स्वामी विवेकानंद का उन पर गहरा प्रभाव है, हमें यह जानकारी बहुत कम है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रोज़मर्रा के जीवन में क्या पढ़ते हैं, फ़ाइलों और काग़ज़ों के अलावा.

अमरीका में ऐसा नहीं है. वहां राष्ट्रपति की पाठ्य सामग्री को विशेष रूप से समयानुसार दर्ज किया जाता है और समय-समय पर पुनर्जांच की जाती है ताकि इसका सरकार और नीतियों पर असर देखा जा सके.

राष्ट्रपति को अक्सर हवाई जहाज़ में आते या जाते हुए किताब लिए हुए देखा जा सकता है और कई बार तो वह जो पढ़ रहे होते हैं, उस पर सार्वजनिक रूप से बात भी करते हैं.

ओबामा की ख़रीदी किताबें

अमरीका राष्ट्रपति ओबामा पिछले शनिवार को वॉशिंगटन डीसी में एक किताबों की दुकान, पॉलिटिक्स एंड प्रोस, में गए और छुट्टियों में पढ़ने और उपहार देने के लिए किताबें लीं.

उनका किताबों के लिए बाहर जाना, अब एक वार्षिक कार्यक्रम बनता जा रहा है. इससे राजनीतिक और साहित्यिक विश्लेषकों को विषय पर अपने अधिकार के साथ उनके निष्पादन को आंकने का मौका मिलता है. यह ऐसी चीज़ है जिसे भारत में बहुत कम तवज्जो मिलती है.

लेखक और पाठक

नेहरू की तरह ओबामा भी जाने माने लेखक हैं और उनकी किताबें ड्रीम्स ऑफ़ माय फ़ादर और ऑडेसिटी ऑफ़ होप- लाखों की संख्या में बिकी हैं. ये दोनों बेस्ट सेलर किताबें उन्होंने राष्ट्रपति बनने से पहले लिखी थीं.

करीब पांच साल, जबसे वह राष्ट्रपति बने हैं, उनकी पाठ्य सामग्री की बारीकी से जांच की जा रही है ताकि उनके नीति निर्धारण को समझा जा सके.

उदाहरण के लिए एक बार प्रचार के दौरान उन्हें जहाज़ से उतरते वक्त फ़रीद ज़कारिया की, दि पोस्ट-अमेरिकन वर्ल्ड, लिए हुए देखा गया (इसे उनके कुछ विरोधियों को यह कहने का मौका मिल गया कि वह अमरीका के पतन के बारे में एक मुस्लिम लेखक की किताब पढ़ रहे हैं.)

लेकिन ज़कारिया की लिखी वह किताब अमरीका के पतन के बारे में नहीं है बल्कि बाकी सभी देशों के उत्थान के बारे में है, ख़ासतौर पर चीन और भारत के. यह वही विचार है जो ओबामा के भाषणों का आधार बना है कि अमरीका को आगे रखना है.

ओबामा की ख़रीदी किताबें

शनिवार को ओबामा की ख़रीदी किताबों के आधार पर नीतिगत कदम की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती, लेकिन यह उल्लेखनीय है कि उन्होंने जाने-माने भारतीय मूल के अमरीकी डॉक्टर, अतुल गवांडे की किताब- बीइंग मॉर्टल, ख़रीदी.

न्यूयॉर्कर पत्रिका के नियमित लेखक गवांडे एक सर्जन होने के साथ ही हॉर्वर्ड मेडिकल स्कूल के प्रोफ़ेसर भी हैं. वह राष्ट्रपति क्लिंटन के समय में व्हाइट हाउस के सहायक भी रहे हैं.

बीइंग मॉर्टल उनकी चौथी किताब है और यह ऐसे समाज में बुढ़ाती स्वास्थ्य सेवा और जीवन स्तर पर केंद्रित है जो आसानी से उम्र बढ़ने और मृत्यु की प्रक्रिया को स्वीकार नहीं करता.

इसी तरह 2013 में ख़रीदी गई ओबामा की किताबें उनकी ताज़ा रुचि की झलक दिखाती हैं. उन्होंने एशियाई मूल के दो अमरीकी लेखकों की किताबें ख़रीदीं जो झुंपा लाहिड़ी की दि लोलैंड और ख़ालिद हुसैनी की काइट रनर है.

यकीनन कोई बकैत 1960 के नक्सल प्रभावित भारत में राजनीतिक विद्रोही दो भाइयों की ज़मीनी कहानी के कुछ अर्थ निकाल सकता है लेकिन अन्य लोग ली कैरे की तर्ज वाले जासूसी रोमांच कथा, रेड स्पैरो, को देखेंगे जो अमरीका और रूस के बीच तनाव पर है और इसे रूस के प्रति ओबामा के नज़रिए पर परखेंगे.

मोदी और मनमोहन

ओबामा के पूर्ववर्ती जॉर्ज बुश भी, उनकी बुद्धिमत्ता को लेकर किए जाने वाले मज़ाक के विपरीत, घोर पढ़ाकू बताए जाते हैं. हालांकि कुछ लोग यह भी कहते हैं कि उनमें यह आदत उनकी लाइब्रेरियन बीवी, लॉरा बुश, ने डाली थी.

बिल क्लिंटन

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माना जाता है कि 90 के दशक की शुरुआत में बाल्कन संकट पर राष्ट्रपति क्लिंटन के नज़रिए पर रॉबर्ट कपलान की, बाल्कन घोस्ट्स, किताब का असर था.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारत के हालिया प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और अटल बिहारी वाजपेयी के पढ़ने के बारे में कम ही पता है.

हालांकि दिल्ली के कुछ समीक्षकों का कहना है कि वह अपनी फ़ाइलों, विवरणों और काग़ज़ों के अलावा कम ही पढ़ते थे.

लेकिन मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार रहे संजय बारू के अनुसार तत्कालीन प्रधानमंत्री और उनकी पत्नी दोनों ही बहुत उत्सुक और घोर पढ़ाकू थे जो जीवनियां, अंतरराष्ट्रीय मुद्दों, इतिहास, अर्थशास्त्र, सामयिक राजनीति के बारे में पढ़ा करते थे. उनके सप्ताहांत तो किताबें पढ़ने में ही बीतते थे.

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