'मोदी सरकार को और बहुत कुछ करना होगा'

भारतीय रिज़र्व बैंक ने मूल ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया है, लेकिन साथ ही आने वाले समय में ब्याज दरों में कटौती किए जाने की संभावनाओं से इनकार भी नहीं किया है.
इससे पहले कयास लगाए जा रहे थे कि सुस्त आर्थिक विकास की दर और मुद्रास्फीति में ताज़ा कमी को देखते हुए भारतीय रिज़र्व बैंक हस्तक्षेप कर सकता है.
रिज़र्व बैंक कह चुका है कि केंद्र की मोदी सरकार ने निवेश को बढ़ाने के लिए कई उपाय किए हैं, लेकिन आर्थिक विकास को गति देने के लिए और बहुत कुछ करना होगा.
बीबीसी संवाददाता समीर हाशमी ने भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन से इस बारे में <link type="page"><caption> ख़ास बातचीत</caption><url href="http://www.bbc.com/news/business-30309550" platform="highweb"/></link> की.
आर्थिक सुधार

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केंद्र सरकार ने चालू वित्त वर्ष के लिए आर्थिक विकास की दर का लक्ष्य 5.5 प्रतिशत निर्धारित किया है.
क्या आर्थिक विकास को गति देने के लिए मोदी सरकार ने पर्याप्त क़दम उठाए हैं, इस सवाल पर रघुराम राजन का कहना था, "मुझे लगता है कि सरकार ने काफ़ी क़दम उठाए हैं और उठा रही है."
वो कहते हैं, "आर्थिक विकास को और गति देने के लिए तीन या चार क्षेत्रों पर ध्यान देने की ज़रूरत है- ऊर्जा, खनन, भूमि अधिग्रहण और बड़ी निवेश परियोजनाएं जैसे रेलवे. इन चारों क्षेत्रों में सरकार ने कुछ क़दम उठाए हैं."
"कुछ अन्य काम भी किए जा रहे हैं जिनका प्रभाव लंबे अंतराल में दिखेगा जैसे व्यवसाय के अनुकूल माहौल बनाना, श्रम क़ानूनों में बदलाव की कोशिश करना और कर प्रबंधन."

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आने वाले समय में भारत के विकास के बारे में उनका कहना है, "मुझे लगता है कि 2017 तक हम हर वर्ष विकास दर में एक प्रतिशत की वृद्धि दर्ज करेंगे. हम उम्मीद करते हैं कि अगले वित्त वर्ष में विकास दर 6.5 प्रतिशत और इसके अगले वित्त वर्ष में 7.5 प्रतिशत विकास दर होगी."
विकास दर
वह कहते हैं, "इसके आगे विकास दर इस इस बात पर निर्भर करेगी कि जो आर्थिक सुधार होने हैं वो कैसे होते हैं और वैश्विक परिस्थितियां कैसी होती हैं."
कुछ समय पहले रघुराम राजन ने विकसित देशों की मौद्रिक नीति की आलोचना की थी. आख़िर इस नीति के क्या ख़तरे हो सकते हैं, इस पर वह कहते हैं, "पहला ख़तरा है कि इस तरह की नीति से मुद्रा प्रवाह का रुख़ एक अर्थव्यवस्था से दूसरे की ओर हो जाता है."

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उनका कहना है, "अगर दूसरे देश को इसे ठीक से इस्तेमाल करने की योजना बनानी होती है और यदि वह इसे ठीक तरह से संभाल नहीं पाया तो देश में क़र्ज़ की बाढ़ आ जाती है और परिसंपत्तियां महंगी हो जाती हैं. भारत समेत कई विकासशील अर्थव्यवस्थाएं क़र्ज़ की बाढ़ के संकट से पहले ही जूझ रही हैं."
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