अब महाराष्ट्र की राजनीति में आगे क्या?

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- Author, कुमार केतकर
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिन्दी डॉटकॉम के लिए
महाराष्ट्र की राजनीति बड़े बदलाव के दौर से गुज़र रही है. भारतीय जनता पार्टी पहली बार राज्य में सबसे बड़े दल के रूप में सरकार बना रही है.
राज्य में सबसे अधिक समय तक सत्ता में रही कांग्रेस इस चुनाव में तीसरे स्थान पर पहुँच गई है.
इसका असर राज्य के ग्रामीण से लेकर शहरी इलाक़ों में होगा. इस बदलाव का असर औद्योगिक क्षेत्रों पर भी पड़ेगा.
वहीं, शिवसेना जैसे दलों को अपनी राजनीति का रंग-ढंग बदलना होगा.
कुमार केतकर का विश्लेषण
अपने शासनकाल में कांग्रेस ने कभी शहरी मुद्दों पर ज़्यादा ध्यान ही नहीं दिया था और ग्रामीण इलाक़ों की ही राजनीति की थी.

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यह भी भाजपा के सामने बड़ी चुनौती होगी. अगर भाजपा इस चुनौती का सामना नहीं कर पायी तो फिर वो कहीं की नहीं रह जाएगी.
मुझे लगता है कि भाजपा भी अपनी भूमिका स्पष्ट नहीं कर पाई है. कभी वो कहती है कि विकास उसका एजेंडा है तो कभी हिंदुत्व.
जबकि, दोनों ही उसके असल एजेंडे नहीं है. ऐसा प्रतीत होता है कि उनके हिंदुत्व का मतलब मुस्लिम विरोध है और विकास की उनकी व्याख्या है सिर्फ़ बड़े उद्योगों को प्रोत्साहित करना, उन्हें सहूलियतें देना है.
भाजपा पर लगातार किसानों की ज़मीनें सस्ते दामों पर उद्योगपतियों को देना का आरोप लगता रहा है, यहाँ तक की कई आलोचक कटाक्ष करते हैं कि यही उनके लिए कृषि नीति है.

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भाजपा के लिए चुनौती इसलिए भी है क्योंकि उसके पास महाराष्ट्र के लिए कम से कम फ़िलहाल कोई ठोस नीति भी नहीं दिखाई पड़ती.
लेकिन फिर भी कांग्रेस के हट जाने से महाराष्ट्र का पूरा राजनीतिक परिदृश्य ही बदल गया है.
शिवसेना की भूमिका बदलेगी
बदली हुई राजनीतिक परिस्थितियों में शिवसेना को भी बदलना पड़ेगा. उसे अपना आक्रामक तेवर छोड़ कर अपने आप को एक नयी भूमिका में ढालना होगा.
अब वो अपनी पुरानी भूमिका में नहीं रह सकते हैं जिसमें वो बात-बात पर बंद बुलाते थे और हड़ताल कराया करते थे.
शिवसेना को पहले जैसे लड़ाकू तरीकों से अब दूर रहना पड़ेगा. संभावना कम ही नज़र आ रही कि शिवसेना राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना यानी एमएनएस के साथ हाथ मिलाए. एमएनएस राजनीतिक रूप से काफी कमज़ोर संगठन है.

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जहां तक बात राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी यानी एनसीपी की है तो वो किसी के साथ रहे न रहे, उसे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता.
कांग्रेस के विरुद्ध सत्ता विरोधी लहर इसलिए थी कि कांग्रेस-एनसीपी सरकार महाराष्ट्र के वोटरों की उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी.
देवेन्द्र फडणवीस पढ़े-लिखे हैं और युवा हैं. इसलिए उम्मीद की जा रही है कि वो महाराष्ट्र को एक नयी दिशा में ले जाने में कामयाब रहेंगे.
(बीबीसी संवाददाता सलमान रावी से बातचीत पर आधारित)
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