भारत की पहली ट्रांसजेंडर न्यूज़ एंकर

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- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
पिछले हफ़्ते एक भाई-बहन टेलीविजन एंकर के लिंग को लेकर आपस में बहस कर रहे थे.
डॉक्टर यू श्रीकुमार ने बताया,"मेरी बहन ने जोर देकर कहा कि वह एक महिला हैं. जो तुम कह रहे हो ऐसा नहीं है. मैंने कहा कि नहीं, बेशक वह एक ट्रासजेंडर ही हैं."
इस बहस की वजह तमिलनाडु के कोयंबटूर शहर में चलने वाला एक प्राइम टाइम न्यूज़ शो है जिसकी एंकर पद्मिनी प्रकाश है.
पद्मिनी देश की पहली ट्रांसजेंडर न्यूज़ एंकर है.
इमरान कुरैशी की रिपोर्ट
गृहिणी वैजंती कहती हैं, "ईमानदारी से कहूँ तो मैं उनमें और दूसरी महिला एंकर में कोई फ़र्क़ नहीं कर सकी."
पिछले पांच हफ़्तों से पद्मिनी स्थानीय टेलीविजन चैनल लोटस टीवी पर दर्शकों से मुखातिब हैं.
किसी अन्य एंकर की तरह वह भी अपने शो को लेकर रोमांचित रहती हैं. ऐसा सिर्फ़ इसलिए नहीं है क्योंकि वह प्राइम टाइम पर शाम के 7 बजे आती हैं.
बड़ा बदलाव

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इससे उनकी और उनके समुदाय के लोगों की ज़िंदगी में एक बड़ा बदलाव आया है.
अभी आईटी सेक्टर में पेशेवर प्रशिक्षक के तौर पर काम कर रही रोज भी टीवी एंकर रह चुकी है. उन्होंने दो चैनलों के लिए दो सालों तक काम किया है. लेकिन रोज एक साप्ताहिक शो की एंकर थी जबकि पद्मिनी एक न्यूज़ एंकर है.
ये रोज ही थी जिन्होंने पद्मिनी को टीवी की दुनिया से जोड़ा.
पद्मिनी के लिए रोज रोल मॉडल है. पद्मिनी कहती है, "मैं वाकई में बहुत ख़ुश हूँ. दूसरे ट्रांसजेंडर को भी ऐसे मौके देने चाहिए. सामाजिक वर्जनाएं टूटनी चाहिए."
सम्मान
पद्मिनी का कहना है कि लोग अब उन्हें सम्मान की नज़र से देखते हैं. उनके लिए यह सम्मान मायने रखता है.
यह सम्मान उन्हें अपने परिवार तक से नहीं मिला था. वह कहती है, "मेरा बचपन परेशानियों में गुजरा. घर छोड़ने के बाद मैं हर जगह गई."

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उन्होंने भरतनट्यम सीखा, सौंदर्य प्रतियोगिता जीती और तमिल सीरियल में भी काम किया.
वह पत्राचार से कॉमर्स में स्नातक कर रही थीं लेकिन उन्हें और उनके साथियों को फ़ीस जमा नहीं कर पाने की वजह से बीच में ही कोर्स छोड़ना पड़ा.
बुरा व्यवहार
कुछ महीने पहले संगीत कुमार और सरवण रामकुमार का ध्यान ट्रांसजेंडरों के साथ होने वाले बुरे व्यवहार और इनके प्रति समाज के नकारात्मक रवैए की ओर गया.
उन्होंने इसके बारे में लोटस टीवी के अपने प्रबंधन से बात की. टीवी के चेयरमैन जी के सेल्वा कुमार किसी ट्रांसजेंडर को नौकरी पर रखने को सहजता से तैयार हो गए.
भारत में ट्रांसजेंडर की संख्या को लेकर कोई स्पष्ट आंकड़ा मौजूद नहीं है. केवल पांच महीने पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजेंडर को तीसरे लिंग के रूप में मान्यता दी थी.
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