मंगलयान सबसे कम ख़र्च में कैसे बना?

मंगल मिशन

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    • Author, जोनाथन एमोस
    • पदनाम, विज्ञान संवाददाता, बीबीसी न्यूज़

भारत की मंगलयान परियोजना पर सिर्फ़ साढ़े चार सौ करोड़ रुपए ख़र्च हुए हैं. यह हॉलीवुड की फ़िल्म 'ग्रैविटी' से भी कम है.

और पश्चिमी देशों के अंतरिक्ष अभियानों के मुक़ाबले तो यह ख़र्च और भी कम है.

तो भारत का अंतरिक्ष अभियान इतना किफ़ायती कैसे है? बता रहे हैं बीबीसी के विज्ञान संवाददाता जोनॉथन एमोस

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अमरीका का मेवन ऑर्बिटर जो सोमवार को मंगल की कक्षा में पहुँचा है, भारत के मंगलयान से दस गुना महंगा है.

इससे पहले जून में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि भारत का पहला मंगल अभियान हॉलीवुड फ़िल्म 'ग्रैविटी' से भी सस्ता है.

किफ़ायती

भारत का मंगलयान

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तो फिर भारत ने ये काम इतने सस्ते में कैसे किया?

ऐसे अभियानों पर काम करने वाले वैज्ञानिकों और इंजीनियरों पर ही सबसे ज़्यादा ख़र्च आता है और भारत में मानव संसाधन सस्ते हैं.

महंगे विदेशी पुर्ज़ों के बजाए सस्ते देसी पुर्ज़े लगाए गए.

मंगलयान

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इमेज कैप्शन, मंगलयान मंगल के वातावरण में मीथेन का अध्ययन करेगा.

साथ ही भारत ने चीज़ों को सरल करने पर फ़ोकस किया.

साल 2018 में यूरोप के मंगल रोवर के प्रमुख अन्वेषक एंड्रयू कोट्स कहते हैं, "उन्होंने सबकुछ छोटा रखा है. पेलोड सिर्फ़ पंद्रह किलो का है. इसकी तुलना अगर आप मेवन के पेलोड से करेंगे तो कम क़ीमत के बारे में बहुत कुछ समझ जाएंगे."

उन्होंने कहा, "इसे कम करने का मतलब ये है कि वैज्ञानिक रूप से यह कम सक्षम होगा, लेकिन भारत ने समझदारी से उन महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित रखा है जो दूसरों के कामों में मददगार हो सकते हैं."

संभावनाएं

भारत का मंगलयान

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मंगलयान मंगल के वातावरण में मीथेन गैस का अध्ययन करेगा.

धरती पर अरबों टन मीथेन है जिसका अधिकतर हिस्सा छोटे जीवाणुओं से आता है जो पशुओं की आंत में पाए जाते हैं.

ऐसी अटकलें हैं कि मीथेन का उत्पादन करने वाले कुछ बग या मीथेनोजेंस मंगल पर भी हो सकते हैं, जोकि मंगल के कठिन वातावरण के कारण सतह के नीचे मौजूद हों.

इसलिए मंगलयान मंगल के बारे में सबसे बड़े सवालों का जबाव तलाश सकता है.

पश्चिमी वैज्ञानिक भी मंगलयान को लेकर उत्साहित हैं.

बड़ी उपलब्धि

मंगल की सतह

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कोट्स कहते हैं, "मंगलयान की गणनाएं मेवन और यूरोप के मार्स एक्सप्रेस के साथ जुड़ेंगी. यानी हमें तीन बिंदुओं पर गणनाएं मिलेंगी, जो बड़ी बात है."

इससे बेहतर ढंग से यह समझा जा सकेगा कि अरबों साल पहले मंगल ग्रह ने अपने वातावरण का बड़ा हिस्सा कैसे गँवाया और क्या वहाँ कभी जीवन था?

मंगलयान और भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की बहुत आलोचना हुई है.

बहुत लोग कहते हैं कि अंतरिक्ष कार्यक्रम अमीर औद्योगिक देशों के खेल हैं और विकासशील देशों के लिए बेमतलब.

उनके अनुसार पैसे का बेहतर इस्तेमाल शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में किया जा सकता है.

बाज़ार में पकड़

भारत का मंगलयान

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लेकिन ये बात नज़रअंदाज़ कर दी जाती है कि विज्ञान और तकनीक में निवेश योग्यता और क्षमता विकसित करता है और ऐसे लोगों का विकास करता है जो व्यापक रूप में समाज और अर्थव्यवस्था को फ़ायदा पहुँचाते हैं.

अंतिरक्ष में जो पैसा लगाया जाता है, उससे ज़मीन पर भी पैसा बनाया जाता है.

अमीर देश इस बात को समझते हैं और इसीलिए वो अंतरिक्ष में इतना भारी निवेश करते हैं.

भारत भी इस क्षेत्र में हिस्सेदारी करना चाहता है और मंगलयान और अपने बाकी उपग्रह व रॉकेट कार्यक्रमों से भारत ने अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष बाज़ार और अंतरिक्ष उत्पाद और सेवा क्षेत्र में अपनी पकड़ मज़बूत की है.

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