स्कॉटलैंड में जनमत संग्रह, असर कश्मीर पर?

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- Author, एंड्रयू व्हाइटहेड
- पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस
गुरुवार को स्कॉटलैंड के लोग स्वतंत्रता के मुद्दे पर हो रहे जनमत संग्रह में हिस्सा ले रहे हैं.
इस जनमत संग्रह पर उन क्षेत्रों के लोगों की नज़र भी टिकी है, जहां जनमत संग्रह की बात होती रही है, लेकिन कभी मतदान नहीं हुआ.
उनमें कश्मीर भी शामिल है - भारत प्रशासित कश्मीर और पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर.
क्या स्कॉटलैंड के जनमत संग्रह का असर जम्मू और कश्मीर में भी होगा. बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के संवाददाता एंड्रूय व्हाइटहेड का आकलन:
एंड्रयू व्हाइटहेड का विस्तृत आकलन:
कई हज़ार कश्मीरी इस सप्ताह स्कॉटलैंड के ऐतिहासिक जनमत संग्रह में हिस्सा ले रहे हैं.
इन लोगों का मत ये तय करेगा कि वे अपनी पुरानी सांस्कृतिक और राजनीतिक पहचान के साथ बने रहना चाहते हैं या फिर एक स्वतंत्र देश के तौर पर स्थापित होना चाहते हैं.
ये कश्मीरी लोग अपना मत ग्लास्गो में ज़ाहिर करेंगे - श्रीनगर, मीरपुर या फिर जम्मू में नहीं. स्कॉटलैंड के सबसे बड़े शहर ग्लासगो में पाकिस्तानी मूल के 20 हज़ार से ज़्यादा लोग रहते हैं, इसमें ज़्यादातर पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के हैं.
कश्मीर में जनमत संग्रह की बात सबसे पहले 1947 में उठी थी. तब स्कॉटिश नेशनल पार्टी अपने शुरुआती दिनों में थी. तब ब्रितानी संसद में इस पार्टी का कोई सदस्य नहीं था और स्कॉटलैंड की स्वतंत्रता की बात काल्पनिक मानी जाती थी.
लगभग 70 साल बाद, हम कहां हैं?
स्वतंत्रता की हिमायती स्कॉटिश नेशनल पार्टी, स्कॉटलैंड में मज़बूती से उभरी और यूनाइटेड किंगडम की सरकार को जनमत संग्रह कराने के लिए सहमत किया. इस जनमत संग्रह को लेकर किए गए सर्वेक्षणों के मुताबिक ये दौड़ बेहद नज़दीकी साबित होने वाली है.

कश्मीर में जनमत संग्रह की मांग अभी भी बनी हुई है, लेकिन इसके होने की संभावना दूर-दूर तक नहीं दिख रही है.
दक्षिण एशियाई के प्रमुख इतिहासकारों में शामिल यास्मिन ख़ान बताती हैं, "कश्मीर में जनमत संग्रह वह सबसे महत्वपूर्ण जनमत संग्रह है जो कभी नहीं हुआ."
दूसरे विश्वयुद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र के सदस्यों में करीब 30 देश ऐसे हैं जो जनमत संग्रह के बाद आज़ाद हुए हैं.
कश्मीर से छोटे क्षेत्रफल वाले कई देश हैं जो जनमत संग्रह की बदौलत स्वतंत्रत हो चुके हैं. उदाहरण के लिए पूर्वी तिमोर इनमें एक है.
हालांकि कई दूसरे क्षेत्र ऐसे भी हैं जहां जनमत संग्रह की बात होती रही है, लेकिन वहां जनमत संग्रह नहीं हो पाया है. इनमें पश्चिमी सहारा शामिल है.
क्या कश्मीर में भी भविष्य में जनमत संग्रह संभव है या नहीं?
कश्मीर का आधुनिक इतिहास काफी 'जटिल मुद्दा' है. लेकिन संक्षेप में देखें तो भारत में ब्रितानी शासन के दौरान जम्मू एवं कश्मीर में वहां के महाराज का शासन था.
1947 में कश्मीर मुस्लिम बहुसंख्यक राज्य था, जिस पर हिंदू महाराजा का शासन था. कश्मीर ने दोनों देशों के साथ जाने से इनकार कर दिया.
लेकिन कश्मीर पर पाकिस्तान की सेना ने आक्रमण कर दिया. तब जम्मू एवं कश्मीर के महाराजा ने भारत से हाथ मिलाया और भारत के साथ इंस्ट्रूमेंट ऑफ़ एक्सेशन पर हस्ताक्षर हुए.

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भारत की सेना ने कश्मीर को बचाया और बहुत सारे हिस्सा पर कब्जा किया. हालांकि पूरे कश्मीर तब भी भातीय सेना का कब्ज़ा नहीं हुआ. तब से कश्मीर में भारतीय सेना मौजूद है.
भारत के पहले गर्वनर जनरल लार्ड माउंटबेटन ने कश्मीर की जनता के बीच जनमत संग्रह कराने की बात की.
भारत के तब के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू भी अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों की मौजूदगी में जनमत संग्रह कराने के पक्ष में थे. बाद में यह मसला संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद तक पहुंचा.
तब कश्मीर के प्रमुख नेता शेख अब्दुल्लाह थे, उन्होंने शुरू में भारत के शासन का समर्थन किया. वे जनमत संग्रह के पक्ष में नहीं थे. लेकिन समय के साथ वे भी जनमत संग्रह के पक्ष में बोलने लगे. हालांकि नेहरू ने बाद में जनमत संग्रह कराने से इनकार कर दिया.
जम्मू एवं कश्मीर के मौजूदा मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह, शेख अब्दुल्लाह के पोते हैं. वे भारतीय शासन के समर्थक हैं और चुनाव जीतकर मुख्यमंत्री बने हैं.
अगर कश्मीर में जनमत संग्रह हुआ, तो क्या होगा?

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कश्मीर में जनमत संग्रह हुआ तो क्या होगा? इसका जवाब कोई नहीं जानता.
भारत प्रशासित कश्मीर में 25 सालों से अलगाववादी हिंसा होती रही है. भारतीय सेना के साथ अलगाववादी संघर्ष में दसियों हज़ार लोगों की मौत हुई है. ऐसा माहौल बन गया है कि लोग जैसा सोचते हैं, वो बताना नहीं चाहते.
साल की शुरुआत में मैं कश्मीर घाटी में था. वहां के एक भरोसेमंद राजनीतिक कमेंटेटर ने मुझसे कहा था कि कश्मीर में भारत की तुलना में पाकिस्तान को लेकर ज्यादा समर्थन है और दोनों देशों से अलग स्वतंत्र होने को लेकर उससे भी ज़्यादा.
लेकिन दो बातें ध्यान में रखनी होंगी- संयुक्त राष्ट्र ने स्वतंत्र कश्मीर की परिकल्पना को मंजूरी नहीं दी है. संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक कश्मीर या तो भारत के साथ रहे या फिर पाकिस्तान के साथ और इसमें पूरा कश्मीर शामिल है. जबकि कश्मीर घाटी में पूरी आबादी के आधे से भी कम लोग रहते हैं.
पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में स्वतंत्रता के लिए समर्थन कम है. भारत प्रशासित कश्मीर के जम्मू के हिंदू भी स्वतंत्रता के पक्ष में नहीं है.
मामला बेहद उलझा हुआ है.
स्कॉटलैंड के जनमत संग्रह से कश्मीर में कोई बदलाव आएगा?
जम्मू एवं कश्मीर लिबरेशन फ्रंट स्वतंत्रता की हिमायती है. जेकेएलएफ पहले ही कह चुका है कि स्कॉटलैंड के जनमत संग्रह से सबक लेते हुए भारत को कश्मीर में इसे अपनाना चाहिए.

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कश्मीर इन दिनों बाढ़ के कहर का सामना कर रहा है, लेकिन स्कॉटलैंड के जनमत संग्रह पर श्रीनगर का भी ध्यान है.
स्कॉटलैंड और कश्मीर में कई भिन्नताएं हैं. लेकिन स्कॉटलैंड अगर स्वतंत्र हुआ तो फिर कश्मीर की स्वतंत्रता की बात भी होगी.
कश्मीर के अलगाववादियों को कहा जाता रहा है कि कश्मीर स्वतंत्र होने के लिहाज़ से काफ़ी छोटा है लेकिन हो सकता है वे तर्क दें कि स्कॉटलैंड की आबादी तो कश्मीर घाटी जितनी ही है.
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