मोदी पर अब क्या कहता है विश्व मीडिया?

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- Author, विकास पांडे
- पदनाम, बीबीसी मॉनिटरिंग
भारत के प्रधानमंत्री के रूप में 100 दिन पूरे करने पर नरेंद्र मोदी अंतरराष्ट्रीय मीडिया की सुर्खी भी बने.
ऐसा लगता है कि अंतरराष्ट्रीय अख़बारों में उनके नेतृत्व के प्रति शुरुआत में अपनाए गए निराशावादी रुख़ के वास्तविक आकलन का समय अब आया है जब कई नीतियां लागू हुई हैं.
पढ़ें अंतरराष्ट्रीय मीडिया में मोदी पर विश्लेषण
पश्चिमी मीडिया ने अप्रैल में हुए चुनाव अभियान के दौरान प्रधानमंत्री की धर्मनिरपेक्ष छवि पर सवाल उठाए थे. इनमें 'द इकॉनमिस्ट' और 'द गार्डियन' प्रमुख हैं.
'द इकॉनमिस्ट' ने मोदी की प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी पर कहा था कि भारत इससे ''बेहतर का हक़दार" है.
पत्रिका ने आगे लिखा था कि वे 'हमें अगर ग़लत साबित करते हैं तो हमें ख़ुशी होगी'.
तो क्या मोदी ने पत्रिका को ग़लत साबित कर दिया है? इसका जवाब है- पूरी तरह से तो नहीं.
देश में हिंदूवाद को बढ़ावा देने वाली बयानबाज़ी, मुद्रास्फीति की ऊंची दर और बड़े आर्थिक सुधार की अनुपस्थिति अब भी मोदी के लिए सवाल हैं.
'द इंडिपेंडेंट' में जॉन इलियट लिखते हैं, "भारतीय जनता पार्टी से जुड़े दक्षिणपंथी विचारधारा वाले संगठनों की ओर से राष्ट्रवादी एजेंडे को बढ़ावा मिलना चिंता का विषय है. 'सभी भारतीय हिंदू हैं', जैसे बयान ने हालात और बदतर बना दिए हैं."

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एक दशक से लंबे वक़्त से मोदी के आलोचक गुजरात में 2002 के दंगे में उनकी भूमिका पर सवाल उठाते रहे हैं.
इन दंगों में एक हज़ार से ज़्यादा लोग मारे गए थे. उन पर दंगे रोकने के लिए उचित क़दम न उठाने का आरोप था, जिससे वे हमेशा इंकार करते रहे हैं.
अंतरराष्ट्रीय अख़बारों ने नई वित्तीय नीतियों को लागू करने में नाकाम होने की ओर भी ध्यान दिलाया है.
क्रांतिकारी सुधार नहीं
हालांकि 'द इकॉनॉमिस्ट' मोदी सरकार की ओर से उठाए गए कुछ क़दमों की प्रशंसा करता है. अख़बार का कहना है, "सरकारी कर्मचारी अब काम पर समय से आते हैं और यहां-वहां नहीं थूकते लेकिन ये सुधार क्रांतिकारी नहीं हैं."
नई सरकार के सत्ता में आए जब दो महीने हुए थे, तो चर्चा थी कि प्रधानमंत्री अपने प्रशासनिक शैली को लेकर मुग्ध हैं जबकि वे अपने राजनीतिक जनादेश का बहुत कम इस्तेमाल करते हैं .

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'न्यूयॉर्क टाइम्स' में ऐलेन बैरी लिखते हैं कि मोदी ने पिछले सरकार की आर्थिक नीतियों को ख़ारिज करने के बजाए जुलाई में पेश बजट में उनको लेकर चलने का फ़ैसला किया है.
प्रधानमंत्री सत्ता में उम्मीदों के भारी दबाव के बीच आए हैं और भारत के मतदाता कम समय में उनसे बड़ा बदलाव चाहते हैं.
लेकिन क्या उन्होंने जो वायदे किए थे, उन्हें वे पूरा करने जा रहे हैं? विश्लेषकों का कहना है कि मोदी ने स्पष्ट रूप से अपनी योजना नहीं बनाई है.
बैरी लिखते हैं, "मोदी से शुरुआती मोहभंग याद दिलाता है कि भारत ने इस साल जिसे अपना रहनुमा चुना है, वे बहुत प्रभावकारी नहीं हैं."
उनकी नीतियों पर सवाल खड़े करने के बावजूद अख़बारों ने उनकी कुछ अप्रत्याशित पहलों के लिए तारीफ़ की है. उनका चुनाव कई कारणों से दुनिया भर में सुर्खियों में था.
उम्मीद से परे
भारतीय मतदाताओं ने तीन दशक में पहली बार किसी पार्टी को स्पष्ट बहुमत दिया है और एक ऐसे व्यक्ति को चुना है जो कभी रेलवे स्टेशन पर चाय बेचता था.

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कई अंतरराष्ट्रीय अख़बारों ने कांग्रेस पार्टी की हार को दिल्ली में "कुलीन वर्ग के शासन" की समाप्ति के तौर पर देखा.
मोदी ने सत्ता संभालने के बाद कुछ सही क़दम उठाए हैं. कई विश्लेषक इससे सहमत हैं कि उन्होंने विदेश नीति में नई जान फूंकी है, ख़ासकर पूर्वी एशिया के अपने पड़ोसी देशों के साथ.
अंतरराष्ट्रीय अख़बारों में 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के मौक़े पर हुए मोदी के भाषण में स्वच्छता का मसला उठाने की भी तारीफ़ की गई है.
किसी ने भी भारत के प्रधानमंत्री से इस ऐतिहासिक दिन यह उम्मीद नहीं की थी कि वे खुले में शौच से जुड़ी बलात्कार की समस्या पर बात करेंगे.
भारतीय प्रधांनमंत्री अमूमन ऐसे मौक़े पर अपनी नीतियों का बखान करते हैं.
लगता है कि मोदी को जापान और चीन जैसे देशों में सकारात्मक कवरेज मिला है. अधिकतर चीनी अख़बारों ने भारत के साथ मोदी के शासन के दौरान रिश्तों पर ज़ोर दिया है.
सकारात्मक कवरेज

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'चाइना यूथ डेली' अख़बार ने जून में लिखा, "चीन-भारत प्रतियोगिता एक फुटबॉल मैच की तरह है. इसमें चीन पहले हाफ़ में बढ़त लिए था. खेल के दूसरे हाफ़ में भारत मोदी युग के साथ शुरुआत कर रहा है."
रूस में कई अभी भी भारत को अपना "सदाबहार दोस्त" मानते हैं. मोदी को यहां व्यापक रूप से सकारात्मक कवरेज मिला है.
शुरुआत में रूसी अख़बार 'कोमरसैंट' में मोदी को लेकर कुछ आशंका जताई गई थी कि वे अंतरराष्ट्रीय पहचान वाली शख़्सियत नहीं हैं.
जुलाई में रूसी अख़बार मोदी के नेतृत्व में भारत-रूस संबंधों की बेहतर संभावनाओं की उम्मीद जताने लगे. मध्यपूर्व के अख़बारों में पिछले तीन महीने से सीरिया और इराक की घटनाएं छाई रहीं, मगर फिर भी मोदी को कवरेज मिला है, भले ही ज़्यादा नहीं.
मिस्र के अख़बार 'अल-मिसरी अल यावम' ने मोदी के महिलाओं की सुरक्षा के लिए शौचालय बनाने की ज़रूरत वाले बयान पर रिपोर्ट छापी है.
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