पाकिस्तान पर मोदी की पहल, क्या होंगे नतीजे?

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- Author, शकील अख़्तर
- पदनाम, बीबीसी उर्दू संवाददाता, दिल्ली
भारत में आज़ादी के बाद पहली बार किसी ग़ैर कांग्रेसी राजनीतिक दल को स्पष्ट बहुमत के साथ केंद्र में सत्ता मिल रही है.
मनोनीत प्रधानमंत्री ने ऐतिहासिक जीत दर्ज करने के बाद अपने शपथ ग्रहण समारोह में सभी पड़ोसी देशों को भी शामिल होने की दावत दी. यूं तो ये दावत सभी आठ एशियाई देशों के लिए थी, लेकिन यह पाकिस्तान के कारण अत्याधिक महत्वपूर्ण हो गई.
भारत में मोदी के इस क़दम की प्रशंसा की गई और पूरी दुनिया में इसे मोदी सरकार की एक सकारात्मक शुरुआत के तौर पर देखा गया.
भारत में यह उम्मीद की जा रही है कि बीते दस साल के बाद ठंडे पड़े रिश्तों को इस मुलाक़ात से एक बार फिर गर्माने का मौक़ा मिल सकता है.
पाकिस्तान नहीं गए मनमोहन
दस वर्ष पहले निवर्तमान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से जब पूछा गया था कि प्रधानमंत्री के तौर पर वह कौन से अहम काम हैं जो वह करना चाहेंगे, तो उनका जबाव था कि वह अगर अपने कार्यकाल में सिर्फ भारत और पाकिस्तान के रिश्तों को बेहतर करने में कामयाब हो गए तो वह समझेंगे कि उन्होंने अपने कार्यकाल का मक़सद हासिल कर लिया है.
डॉक्टर मनमोहन सिंह दस वर्ष तक सत्ता में रहे लेकिन बीजेपी के विरोध के डर से पाकिस्तान का दौरा करने तक की हिम्मत नहीं कर सके.

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इस्लामाबाद में तीन दिनों तक मोदी के निमंत्रण पर सलाह-मश्विरे के और दो बार फैसले के एलान को स्थगित किए जाने के बाद प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ ने आने का एलान किया. इससे दोनों देशों के रिश्तों की पेचीदगी ही नहीं बल्कि पाकिस्तान की अंदरूनी राजनीति की मुश्किलों का भी पता चलता है.
ज़ाहिर है नवाज़ शरीफ़ का दिल्ली आने का फ़ैसला आसान नहीं था. भारत में आम धारणा यह है कि पाकिस्तान के राजनीतिक संस्थाओं और चुनी हुई सरकार पहले दिन से ही दिल्ली के दौरे के हक़ में थी और इसे वह एक सकारात्मक शुरुआत मानती है. लेकिन इनके ख़्याल में पाकिस्तान की सेना दिल्ली दौरे के हक़ में नहीं थी.
यही नहीं भारतीय विश्लेषक शुक्रवार को हेरात में भारतीय वाणिज्य दूतावास पर चरमपंथी हमले को भी पाकिस्तानी सेना के समर्थित हमले के तौर पर देख रहे हैं और इसे मोदी की दावत पर पाकिस्तान की फ़ौज का जबाव क़रार दिया जा रहा है.
नवाज़ शरीफ़ के आने से ऐसा नहीं है कि तल्ख़ रिश्तों में अचानक कोई बड़ी तब्दीली आ जाएगी लेकिन ये ज़रूर है कि एक अरसे से ठंडे पड़े रिश्तों में कुछ हलचल ज़रूर होगी.
स्पष्ट तौर पर प्रधानमंत्री बनने के फ़ौरन बाद मोदी सबसे पहले अपने पड़ोसी देशों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं. दोनों प्रधानमंत्रियों की 27 मई को अलग से भी मुलाक़ात होनी है और यह भविष्य में बातचीत की शुरुआत का आधार बन सकता है.
मास्टर स्ट्रोक

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नवाज़ शरीफ़ को शांतिवार्ता के लिए एक गंभीर नेता समझा जाता है और मोदी और शरीफ़ की यह मुलाक़ात दोनों तरफ़ के कट्टरपंथी तत्वों को भी कमज़ोर कर सकती है.
भारतीय मीडिया में बीते तीन दिनों से नवाज़ शरीफ़ के संभावित दौरे के बारे में हर तरह की चर्चाएं की जा रही हैं. शपथ-ग्रहण के समारोह में पाकिस्तान को शामिल होने की दावत देने के मोदी के फ़ैसले पर सभी को हैरानी हुई.
मोदी ने अपनी सरकार की शुरुआत एक सकारात्मक कदम से की है और रिश्तों के गतिरोध को तोड़ने की यह एक अच्छी कोशिश है जिसे राजनयिक हल्को में 'मास्टर-स्ट्रोक' का नाम दिया जा रहा है.
भारत और पाकिस्तान में किसी ना किसी चरण पर बाक़ायदा बातचीत दोबारा शुरु होनी ही है और बातचीत की शुरुआत के लिए दोनों सरकारों के लिए एक आधार तलाशना अब मुश्किल नहीं रहा.
दिल्ली की मुलाक़ात रिश्तों में कोई क्रांति तो नहीं लाएगी लेकिन यह मौजूदा अविश्वास और संदेह के माहौल को ज़रूर बदल सकती है.
पूर्व राजनयिकों का मानना है कि भारत पाकिस्तान संबंध दुनिया के सबसे पेचीदा और मुश्किल संबंधों में से एक है.
ऐसे में बातचीत में कोई भी प्रगति राजनीतिक इच्छाशक्ति से ही मुमकिन हो सकती है.
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