पंजाब के 'मिनी श्रीलंका' को है पुल का इंतज़ार

मंड टापू, कपूरथला, पंजाब, सुल्तानपुर लोदी
    • Author, अजय शर्मा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, होशियारपुर, पंजाब से लौटकर

कोई भी शख़्स टापू नहीं, ख़ुद में पूरा. हर शख़्स है एक महाद्वीप, पूरे का हिस्सा..’ जॉन डन ने जब ये लाइनें लिखी थीं, तो उन्हें शायद टापू मंड का पता नहीं था.

मंड वो जगह है जिसे मीडिया पंजाब का मिनी श्रीलंका कहता है. पता तो शायद पंजाब के बड़े हिस्से को भी न हो क्योंकि जालंधर से सिर्फ़ 50 किलोमीटर दूर होने के बावजूद इसका बाक़ी दुनिया से कोई सीधा रिश्ता नहीं है, एक पॉन्टून पुल को छोड़कर.

वह भी जून में हटा लिया जाता है और अक्टूबर में तब लगता है, जब बाढ़ का पानी नीचे उतर आता है.

पंजाब सरकार का मंड से बहुत पुराना रिश्ता है, चरमपंथ के दिनों का, जब खालिस्तान कमांडो फ़ोर्स और बब्बर खालसा इंटरनेशनल की इस पनाहगाह को उखाड़ फेंकने के लिए पंजाब के पुलिस महानिदेशक केपीएस गिल ने यहां अभियान चलाया था, और शायद इसीलिए बाक़ी पंजाब मंड से रिश्ता रखना भी नहीं चाहता.

पिछले साल जब बाढ़ आई और निंदर सिंह का घर डूबने लगा तो उसकी चीखें भी किसी ने न सुनीं. बहन की शादी सिर्फ़ तीन दिन दूर थी. बड़े अरमानों से घर बनाया था. निंदर और उनके पिता जोगिंदर सिंह ख़ुद कश्ती पर ढो-ढोकर 70 हज़ार ईंटें और 15 हज़ार टाइलें लाए थे.

खेती से जो मिला था, वह मकान में लग चुका था. अब वह भी डूब रहा था, उसकी आंखों के सामने.

बहन की शादी से तीन दिन पहले..

"बाप-दादों की ज़मीन थी. आज से 40 साल पहले मेरे दादा ने ली थी. उसके बाद मेरे पिता यहीं रहे. पिता को लगा कि मैंने ज़मीन आबाद की थी. अब हम सुख की रोटी खाएंगे. जिस दिन यह हुआ, उस दिन वह सुल्तानपुर लोदी से आए थे. यहां आकर बाढ़ में घर को पानी में समाते देखा, तो उनका मन ख़राब हो गया. उन्होंने हमें कुछ नहीं बताया और.."

डबडबाई आंखों से निंदर मुझे जब यह बता रहे थे, तो हम टापू मंड में उनके गांव रामपुर गौरा की उसी जगह खड़े थे, जहां कभी उनका दो कनाल में बना घर हुआ करता था.

मंड टापू, कपूरथला, पंजाब, सुल्तानपुर लोदी

जिस दिन बाढ़ में निंदर का घर डूबा, उनकी बहन के ब्याह में सिर्फ़ तीन दिन बचे थे. पिता जोगिंदर सिंह ने उसी दिन ख़ुदकुशी कर ली.

निंदर बताते हैं, "शादी थी इसलिए हमने पुलिस को भी नहीं बताया क्योंकि तीन दिन रह गए थे. चुन्नी चढ़ाकर बहन की शादी कर दी."

निंदर का घर और सारा सामान पानी में समा चुका था. उफ़नती हुई ब्यास नदी से जूझते हुए निंदर किसी तरह पास के ज़िले तरनतारन पहुंचे और वहां अपने एक रिश्तेदार के घर में शरण ली.

‘वोट न अकालियों को, न कांग्रेस को’

निंदर ने उस जगह इशारा किया जहां उनका घर ब्यास नदी की गोद में डूबा हुआ है. निंदर में अब इतनी हिम्मत नहीं कि वह दोबारा यहां घर बनाएं.

मंड टापू पर निंदर सिंह समेत क़रीब 3000 वोटर हैं, मगर बहुत कम ऐसे ख़ुशनसीब हैं, जिन्हें वोट डालने के लिए आठ से नौ किलोमीटर का सफ़र न तय करना पड़े. निंदर को भी लखबरयां गांव तक का सफ़र तय करके वोट डालने जाना होगा.

निंदर को पता है कि वोट क्या होता है, और निंदर को यह भी पता है कि पार्टियों को वोट क्यों नहीं देना चाहिए.

मंड टापू, कपूरथला, पंजाब, सुल्तानपुर लोदी

वो कहते हैं, "हम इस बार न तो अकाली दल को वोट देंगे और न कांग्रेस को. अगर ज़रूरत पड़ी तो आम आदमी पार्टी को अपना वोट देंगे या फिर किसी को नहीं (नोटा) का बटन दबा देंगे."

पिछले साल जब बाढ़ आई थी तो मंड पर खड़ी फ़सल चार से पांच फ़ीट तक पानी में थी. हालात इतने ख़राब थे कि कई घर ब्यास ने निगल लिए थे.

मुश्किलें इस क़दर थीं कि तीन किसानों ने इनसे जूझने के बजाय ख़ुद को ख़त्म करना बेहतर समझा. इन्हीं में जसविंदर कौर के पति प्रीतम सिंह भी थे.

कुछ न बदला ख़ुदकुशी से

प्रीतम सिंह की बेवा जसविंदर कौर से मेरी मुलाक़ात मंड के गांव रामपुर गौरे में उनके घर पर हुई. घर पर लोगों की भीड़ थी. हमें देखकर जसविंदर को उम्मीद जगी थी कि शायद हमारे लिखने से उनके जीवन में छाया अंधेरा छंट जाएगा.

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उस दिन को याद करते हुए वह बोलीं, "पानी आया और खेतों में रेता पड़ गया. राखी वाले दिन वह डूबे थे, इसी पानी में. हमारे घर तक किश्ती आ गई थी."

प्रीतम सिंह को लगा था कि जब सब कुछ बर्बाद हो ही चुका, तो उनके जीने का क्या फ़ायदा. मगर उनके ख़ुदकुशी करने से भी कुछ नहीं बदला. बाढ़ का पानी उतरा, चार कीले खेत बर्बाद हो चुके थे, आढ़तिए के क़र्ज़ का बोझ परिवार पर पहले से था. ज़िंदा रहने के लिए उन्हें और क़र्ज़ लेना पड़ा.

"बहुत मुश्किल से पैसा लगाकर रेता हटाया. फिर लड़कों ने गेहूं लगाई. 50-60 हज़ार रुपए लग गए." इसके बाद तीनों बेटों ने मज़दूरी का दामन थामा. यहां तक कि दोनों बेटियां भी दिहाड़ी कर रही हैं.

बाक़ी पंजाब की तरह मंड में भी बिजली मुफ़्त है, पर सिर्फ़ कुछ घंटे ही मिलती है. नतीजा खेती में डीज़ल का बेतहाशा ख़र्च.

वो कहती हैं, "खेती से हमारा काम ही चल जाए वही बहुत है, बेचकर कमाई करना तो दूर की बात है. पूरे साल में सिर्फ़ एक फ़सल मिलती है और वह भी तब, जब बाढ़ न आए."

जसविंदर कौर को पता है कि अगर ज़िंदा रहना है तो दिहाड़ी पर ही जीना होगा. क़र्ज़ ऐसा सच है जिसकी अनदेखी उनके लिए अब नामुमकिन है.

कुंवारों की भीड़

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मंड के लोगों की शादी-ब्याह भी काफ़ी पेचीदा मामला है. इन गांवों की लड़कियों की शादी तो हो जाती है, पर यहां के लड़कों को कोई अपनी बेटी नहीं देना चाहता.

हमारी मुलाक़ात एक बुज़ुर्ग परगट सिंह से हुई. जिनका कहना था कि यहां के हर गांव में आपको ऐसे लोग मिलेंगे जिनके रिश्ते नहीं हो पा रहे.

वे बताते हैं, "मंड में ऐसे 70 से 80 लड़के होंगे, जिनके साथ शादी करने से सबने मना कर दिया है. कोई यहां रिश्ता नहीं करता, न करना चाहता है".

बाढ़ आती है तो गर्भवती औरतों और उनके होने वाले बच्चों की ज़िंदगी भगवान भरोसे होती है. डिलीवरी के लिए उन्हें ले जाना मुश्किल होता है. इस वजह से कुछ बच्चों की मौत भी हो चुकी है. बीमार हो जाएं तो चारपाई पर डालकर ही ले जा सकते हैं, वो भी तब जब किश्ती मिल जाए. इसमें भी क़रीब तीन घंटे लग जाते हैं.

किसान परमजीत सिंह बताते हैं कि बाढ़ के दौरान बीमार कुछ किसानों की मौत भी हो चुकी है.

किसान संघर्ष कमेटी

अब मंड के बाशिंदों की नुमाइंदगी करने के लिए किसान संघर्ष कमेटी बन गई है. जिसके ज़िलाध्यक्ष परमजीत सिंह से बात करने पर लगा कि नेताओं से उनका विश्वास उठ चुका है.

मंड टापू, कपूरथला, पंजाब, सुल्तानपुर लोदी

उन्होंने बताया, "हम तीन साल से धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं सरकार के पास. हमारी ज़मीन बह रही है. हर बार हमें आश्वासन दे देते हैं कि हमने प्रपोज़ल बनाकर भेज दिया है. जब हम पता करते हैं तो कहते हैं डीसी के पास है. डीसी से पूछो तो वह कहते हैं कि सरकार को भेज दिया है. असलियत में हुआ कुछ नहीं है. किसान आत्महत्या करने को मजबूर हैं."

सांगरा गांव के रहने वाले कुलदीप सिंह ने हमें इलाक़े का दौरा कराया और फिर बोले, "बाढ़ का स्थायी हल हो सकता है लेकिन सरकार करती नहीं. तरनतारन की तरफ से 40 फीट ऊँची ज़मीन है. उनकी साइड पर अगर पत्थर लगा दें और ब्यास को मंड में नहर का रूप दे दें, तो पानी सीधा आगे चला जाएगा और हमारी फ़सल बच जाएगी."

मंड टापू पर मौजूद गांव बाऊपुर जदीद के सरपंच गुरमीत सिंह ने हमसे कहा कि सरकार काफ़ी समय से झूठे वादे कर रही है, मगर पक्का पुल नहीं बनवाती. अब चुनाव हैं, तो वोटों की ख़ातिर यहां लोग आ रहे हैं. कांग्रेसियों और अकालियों का दौरा भी हो चुका है पर हमें इनका कोई फ़ायदा नहीं.

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