आग के बीच रहकर बुझाते हैं पेट की आग

- Author, नीरज सिन्हा
- पदनाम, झरिया से बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
वे दिहाड़ी मज़दूर हैं. जान हर वक़्त हथेली पर होती है. पूरी बस्ती के नीचे सुलगती रहती है आग. तपिश से जब-तब झोपड़ियों की कच्ची दीवारें ढह जाती हैं. पल-पल धुआं और गैस उनकी सांसों में घुलता रहता है.
झरिया बाज़ार से आगे बढ़ते ही खंडहर में बदले रेलवे स्टेशन, केबिन और बंद पड़ी चिमनियां, जगह-जगह ज़मीन से निकलते धुएं और गैस ने हमें अहसास करा दिया था कि यही वो इलाक़ा है, जहां सालों से धरती के नीचे धधक रही है आग और इन सबके बीच ज़िंदगी जीने की जद्दोजहद भी जारी है.
तक़रीबन चार किलोमीटर पैदल चलकर हम झरिया के कुजामा कुम्हार बस्ती पहुंचे. दिहाड़ी मजदूर मणिशंकर का दड़बानुमा घर इसी बस्ती में है.
आपके लिए वोट के मायने क्या हैं? अभी इतना ही पूछा था कि मणिशंकर बेबाकी से बोले, “वोट उनके (चुनाव लड़ने-जीतने वालों) लिए पर्व है, हमारे लिए मजबूरी. उनका भरेगा बक्सा और बढ़ेगा बैंक बैलेंस. हम तो झुलसते रहेंगे इसी आग में. सच यह कि हम अपना आज भी जानते हैं और कल के बारे में भी पता है."
मणिशंकर जानना चाहते हैं कि पांच साला चुनावी पर्व की खुशी उन जैसे लोगों तक क्यों नहीं पहुंचती?
वे मानते हैं कि चुनावों का वक़्त है. उनके जैसे आम लोगों के एक वोट से कोई संसद पहुंचता है, किसी की सरकारें बनती हैं, पर उनकी हालत नहीं बदलती.
सुबह साढ़े छह बज रहे होंगे, जब हम उनके घर पहुंचे थे. तब तक वे कई काम निपटा चुके थे. उन्होंने बताया कि उनके पास देर तक बात करने का समय नहीं है.
उनकी पत्नी दुलती देवी कहती हैं, सूरज तेज़ है. कोयला लेकर शहर की ओर जाना है. समय पर नहीं पहुंचे तो ग्राहक बिगड़ जाएगा. फिर पति-पत्नी कोयले भरी बोरियों को साइकिल पर लादते हुए खदानों, पहाड़ों के बीच से निकल पड़ते हैं शहर की ओर.
फ़ुरसत नहीं
ढाई घंटे बाद उनकी पत्नी वापस लौटीं. उन्होंने बताया कि अब वो (मणिशंकर) 12 बजे तक लौटेंगे. घर के बाक़ी काम निपटाने के बाद दुलती अपने दरवाज़े पर प्लास्टिक की बोरियों का ढेर लेकर बैठ गईं.

इन बोरियों का क्या करेंगी? यह पूछने पर कहा, इसे ख़रीदकर लाई हैं और उनकी सिलाई करेंगी. कुछ अपने काम आएंगे, बाक़ी बेच दी जाएंगी. एक बोरी पर डेढ़–दो रुपए की कमाई हो जाएगी. ये बोरियां राख, कोयले, मिट्टी ढोने के काम आती हैं.
मणिशंकर के इंतज़ार में हमने बस्ती में कई लोगों से बातें की. पता चला कि झरिया के बड़े इलाक़े में कोयला, मिट्टी और राख हज़ारों लोगों के जीने का ज़रिया है. बड़ी संख्या में लोग दिहाड़ी मज़दूरी करते हैं. काम के लिए वे सुबह ही झरिया बाज़ार में खड़े हो जाते हैं. इसे मज़दूर मंडी कहा जाता है.
महिलाएं, जगह-जगह कोयले के चूरे से जलावन का गुल बनाती दिख जाती हैं और कई लोग बंद पड़ी खदानों से चोरी-छिपे कोयला निकालते हैं. दूसरे कुछ लोग उनसे कोयला ख़रीदकर शहरों के गली-मुहल्ले या दूसरी बस्तियों में बेचते हैं. लोग बताते हैं कि इन कामों के लिए तय ठिकानों पर सुरक्षाकर्मियों को नज़राना भी देना पड़ता है.
संकट
इसी बीच हमारी मुलाक़ात झरिया की ज़िंदगी पर लिखते रहे लेखक तैयब खां से हुई. वे बताने लगे कि कुजामा पहले बड़ी और घनी बस्ती थी, मगर जलती हुई ज़मीन लगातार धंसती रही और लोगों को यहां से हटना पड़ा. कड़वा सच यह है कि यहां विस्थापन का दर्द गहरा है.
वे बताते हैं कि ग़लत खनन नीतियों का बड़ा खमियाज़ा ग़रीबों को भुगतना पड़ा है. आग की वजह से रेलवे स्टेशन, कोयले की खदानें और वाशरी प्लांट बंद हो गए, तब से रोज़ी-रोटी का संकट और बढ़ गया.
इस बीच उधर से ही गुजरते वामपंथी नेता सुरेश प्रसाद गुप्ता भी हमसे मिले. वे बताते हैं, "झरिया की परेशानियां बढ़ती जा रही हैं. शहर से दूर बेलगड़िया में 12 सौ ग़रीब परिवारों के लिए घर तो बना दिया, लेकिन उनके रोज़गार के लिए कोई उपाय नहीं किए गए. अब लोग उन घरों को भी छोड़ रहे हैं. अगर उन घरों में रहेंगे तो खाएंगे क्या?"

क़रीब सवा 12 बजे पसीने से तर-ब–तर मणिशंकर ने चेहरे पर पानी का छींटा मारने के बाद कुछ पल आराम किया. पत्नी से दोनों बच्चों सूरज और सागर के बारे में पूछा, तो पता चला वे रिज़ल्ट लेने स्कूल गए हैं.
वे बताते हैं कि ग़रीबी की वजह से ख़ुद पढ़ नहीं सके, लेकिन उनके बच्चे जहां तक पढ़ना चाहेंगे, वे उन्हें पढ़ाएंगे. वे बता रहे थे कि जब आकाश पर तारे टिमटिमाते रहते हैं, उसी समय वे लोग जग जाते हैं.
कितनी कमाई कर लेते हैं? यह पूछने पर वे कहते हैं, सब कुछ सामने है. किसी दिन डेढ़ सौ, किसी दिन सौ. और कभी फाका. चुनावों से निराशा के बारे में वे कहते हैं कि कोई बड़ा आदमी या हैसियत वाला राजनेताओं के पास जाएगा, तो उसकी कद्र होगी लेकिन हाशिए पर खड़े मेहनतकश, अपढ़, ग़रीब, मज़दूर के लिए राजनेताओं की नज़रों में कोई क़द्र नहीं है.
मणिशंकर राजनीति में चरित्र भी परखते हैं.
वो कहते हैं, “वोट के समय चुनाव लड़ने वाले ग़रीब-गुरबे के बच्चों को भी गोद में उठा लेंगे. अगर वो बच्चा पखाना-पेशाब कर दे तो मुस्कराकर रह जाएंगे. प्रचार के दौरान लोग ग़ुस्से में कुछ भी कह दें, सह लेंगे. हमारा सवाल भी तो यही है कि चुनाव जीतने के बाद ग़रीबों के बच्चों को वो गोद में क्यों नहीं उठाते. उंगली में गिने लोग होंगे, जो हमारे जैसे लोगों का ख्याल करते हैं."
लोकतंत्र
बातों का सिलसिला आगे बढ़ा. मणिशंकर के ख्याल और भी खुलते चले गए. जब मैंने पूछा कि सरकार और एक चुने हुए जनप्रतिनिधि से आपकी उम्मीदें क्या होती हैं तो वे अपने अंदाज में बोले, “हमें कोई लाख, हज़ार रुपए तो देगा नहीं. हम यह मांगते भी नहीं. अगर एक दिन देह खटा नहीं सके, तो भूखे सोने की नौबत आती है. किसी के पास लाल कार्ड नहीं, तो किसी को वृद्धा पेंशन नहीं. बहुतों की ज़मीन धंस गई, मकान दफ़न हो गए."
देश में तरक़्क़ी बहुत हुई है, क्या इस पर यक़ीन नहीं करते? यह सुनते ही उनका चेहरा तमतमा जाता है. सामने नदी में बहते काले पानी और गंदगी को वे दिखाते हुए कहते हैं, “दर्जन भर बस्ती के लोग यहीं नहाते हैं. बर्तन भी यहीं धोए जाते हैं. चार किलोमीटर दूर से लाना पड़ता है पीने का पानी. गरमी में जब लू के थपेड़ों के बीच आग की चिंगारियां उड़ती हैं, तो इन झोपड़ियों में रहने वालों की देह झुलसकर रह जाती है. क्या यही है तरक़्क़ी?”
इस आग प्रभावित इलाक़े से वे लोग हट क्यों नहीं जाते. मणिशंकर और उनकी पत्नी का कहना है कि कई बार जगह खाली करने के लिए नोटिस मिले हैं, लेकिन कहां जाएं. सिर छुपाने और पेट पालने का सवाल कोई मामूली तो नहीं.
झरिया कोल फ़ील्ड बचाओ समिति के कार्यकारी अध्यक्ष अशोक अग्रवाल कहते हैं कि झरिया ने देश को बहुत कुछ दिया, लेकिन बदले में देश ने झरिया को क्या दिया है. यह तो वही बात हुई कि "करोड़ों का कोयला, इंसानों का मोल कौड़ियों में."

वे बताते हैं कि सरकारी महकमे की नज़र में 56 हज़ार परिवार आग के ऊपर बसे हैं, लेकिन समिति का आकलन है कि कम-से-कम एक लाख परिवार आग पर बैठे हैं. अग्रवाल के मुताबिक़ राज्य सरकार का झरिया एक्शन प्लान धोखा है.
दोपहर का खाना
ढाई बज रहे हैं. इस बीच उनकी पत्नी ने हमसे भी कुछ खा लेने का अनुरोध किया. जब मैंने मना किया तो बोलीं, ग़रीब का घर है, कैसे खाएंगे? हम झेंप गए. इतना भर कहा,“ऐसा नहीं है."
वे लोग चार बजे तक घर से निकलने वाले हैं. बताया कि रात के लिए राशन–पानी ख़रीदेंगे और अगली सुबह के लिए काम का जुगाड़ लगाएंगे.
मणिशंकर की पत्नी दुलारी देवी के पास वोटर कार्ड नहीं है. वैसे उन्हें वोट देने में कोई दिलचस्पी नहीं. सरकार तो उन्हें निराश ही करती है.
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