करोड़ों का कोयला, इंसानों का मोल कौड़ियों में

झारखंड के झरिया में सरकारी अनुमान के मुताबिक़ क़रीब 56 हज़ार परिवार आग के ढेर पर जी रहे हैं. विस्थापन और तंगहाली के बीच चलती झरिया की ज़िंदगी.

झरिया, क़तार के आख़िरी
इमेज कैप्शन, झारखंड की दामोदर नदी के एक छोर पर बसा है झरिया. कोलकाता से क़रीब 250 किलोमीटर और रांची से 175 किलोमीटर दूर. यह इलाक़ा कोयले के लिए मशहूर रहा है, पर अब यह कोयला यहां के लोगों के लिए जानलेवा बन चुका है. (तस्वीर: रोहन सिंह/बीबीसी)
झरिया, क़तार के आख़िरी
इमेज कैप्शन, 1916 में झरिया में पहली बार आग लगी थी, जो आज तक नहीं बुझी. इलाक़े के सामाजिक कार्यकर्ताओं के मुताबिक़ शहर तीन तरफ़ से आग से घिरा हुआ है. (तस्वीर: रोहन सिंह/बीबीसी)
झरिया, क़तार के आख़िरी
इमेज कैप्शन, झरिया के 435.24 वर्ग किलोमीटर में बसा है कोलफ़ील्ड क्षेत्र. दावों के मुताबिक़ सबसे अच्छा कुकिंग कोल यहीं से निकलता है और 1894 में यहां कोयले की खुदाई शुरू हुई थी. (तस्वीर: रोहन सिंह/बीबीसी)
झरिया, क़तार के आख़िरी
इमेज कैप्शन, झरिया के कुजामा कुम्हार बस्ती के मज़दूर मणिशंकर दड़बानुमा घर में रहते हैं. सालों से उनकी ज़िंदगी कोयले में झुलसकर रह गई है. अब मणिशंकर जानना चाहते हैं कि चुनावी पर्व की खुशी उन जैसे लोगों तक क्यों नहीं पहुँचती? (तस्वीर: नीरज सिन्हा/बीबीसी)
झरिया, क़तार के आख़िरी
इमेज कैप्शन, झरिया कोलफ़ील्ड बचाओ समिति के कार्यकारी अध्यक्ष अशोक अग्रवाल कहते हैं कि झरिया ने देश को बहुत कुछ दिया, लेकिन बदले में देश ने झरिया को क्या दिया है. यह तो वही बात हुई कि "करोड़ों का कोयला, इंसानों का मोल कौड़ियों में." (तस्वीर: रोहन सिंह/बीबीसी)
झरिया, क़तार के आख़िरी
इमेज कैप्शन, सरकारी महकमे की नज़र में झरिया में 56 हज़ार परिवार आग के ऊपर बसे हैं, पर समिति का आकलन है कि कम-से-कम एक लाख परिवार आग पर बैठे हैं. अग्रवाल के मुताबिक़ राज्य सरकार का झरिया एक्शन प्लान धोखा है. (तस्वीर: नीरज सिन्हा/बीबीसी)
झरिया, क़तार के आख़िरी
इमेज कैप्शन, अर्थशास्त्री और सामाजिक कार्यकर्ता स्मिता गुप्ता ने हाल ही में झरिया और आग पर एक किताब लिखी है. उनके मुताबिक़ इलाके के सात लाख लोग आग की चपेट में हैं. (तस्वीर: रोहन सिंह/बीबीसी)
झरिया, क़तार के आख़िरी
इमेज कैप्शन, इलाक़े की महिलाएं, जगह-जगह कोयले के चूरे से जलावन का गुल बनाती दिख जाती हैं और कई लोग बंद पड़े खदानों से चोरी-छिपे कोयला निकालते हैं. दूसरे कुछ लोग उनसे कोयला ख़रीदकर शहरों के गली-मुहल्ले या दूसरी बस्तियों में बेचते हैं. (तस्वीर: रोहन सिंह/बीबीसी)
झरिया, क़तार के आख़िरी
इमेज कैप्शन, झरिया बाज़ार से आगे खंडहर में बदले रेलवे स्टेशन, केबिन और बंद पड़ी चिमनियां, ज़मीन से निकलता धुआं और गैस अहसास कराते हैं कि सालों से धरती के नीचे यहां आग धधक रही है. (तस्वीर: रोहन सिंह/बीबीसी)
झरिया, क़तार के आख़िरी
इमेज कैप्शन, झरिया की पूरी बस्ती के नीचे सुलगती रहती है आग, तपिश से जब-तब झोपड़ियों की कच्ची दीवारें ढह जाती हैं. पल-पल धुआं और गैस लोगों की सांस में घुलती रहती है. (तस्वीर: रोहन सिंह/बीबीसी)
झरिया, क़तार के आख़िरी
इमेज कैप्शन, कुजामा पहले बड़ी और घनी बस्ती थी, मगर जलती हुई ज़मीन लगातार धंसती रही और लोगों को यहां से हटना पड़ा. कड़वा सच ये है कि यहां विस्थापन का दर्द गहरा है.(तस्वीर: रोहन सिंह/बीबीसी)
झरिया, क़तार के आख़िरी
इमेज कैप्शन, झरिया शहर से दूर बेलगड़िया में 12 सौ ग़रीब परिवारों के लिए घर बनाए गए, पर उनके रोज़गार के लिए कोई उपाय नहीं किए गए. अब लोग उन घरों को छोड़ रहे हैं. (तस्वीर: रोहन सिंह/बीबीसी)
झरिया, क़तार के आख़िरी
इमेज कैप्शन, झरिया के बड़े इलाक़े में कोयला, मिट्टी और राख हज़ारों लोगों के जीने का ज़रिया है. बड़ी संख्या में लोग दिहाड़ी मज़दूरी करते हैं. काम के लिए वे सुबह ही झरिया बाज़ार में खड़े हो जाते हैं. (तस्वीर: रोहन सिंह/बीबीसी)