तमिलनाडु में भाजपा का गठबंधन: एक आग का दरिया है...

नरेंद्र मोदी, रजनीकांत

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    • Author, इमरान क़ुरैशी
    • पदनाम, तमिलनाडु से बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

राजनीतिक गठबंधन आम तौर पर सुविधा के हिसाब से बनाए जाते हैं. लेकिन भाजपा ने तमिलनाडु में जो 'इंद्रधनुषीय गठबंधन' बनाया है उसमें असुविधा ज़्यादा नज़र आती है. इस गठबंधन में ख़ुशी से ज़्यादा ग़म दिखाई दे रहा है.

ये गठबंधन बनाने के पीछे भाजपा का लक्ष्य डीएमडीके के नेता विजयकांत, पीएमके के नेता डॉक्टर रामदास और एमडीएमके नेता वाइको के समर्थन पर सवार होकर सीटें हासिल करना था. कोशिश इस बात की थी कि युवाओं में नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता को भुनाया जाए और ये दिखाया जाए कि भाजपा दक्षिण में भी गठबंधन कर सकती है.

मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ़ डेवलपमेंट स्टडीज़ के प्रोफ़ेसर एस. जनकराजन ने बीबीसी से कहा, ''ये गठबंधन प्यार और नफ़रत की कहानी है. शुरुआत में तो भाजपा ने अपने सहयोगियों में जान फूंकने की कोशिश की लेकिन जब वो ऐसा नहीं कर सकी तो बड़े अभिनेता रजनीकांत और विजय को लुभाने में जुट गई.’’

कोयंबटूर के राजनीतिक विश्लेषक जी. सत्यमूर्ति कहते हैं, ''ये गठबंधन शुरुआत से ही मुश्किल में रहा है. कई नेता हैं और बिल्कुल अलग-अलग विचारधाराएं हैं. किसी मुद्दे पर वो सहमत नहीं हो पाएंगे.’’

सत्यमूर्ति श्रीलंका मुद्दे का उदाहरण देते हैं, ''गठबंधन का बड़ा राजनीतिक दल भाजपा है, उसका मानना है कि तमिल समस्या का हल श्रीलंका के संविधान के ढांचे के अंदर एक राजनीतिक सहमति से होना चाहिए. लेकिन पीएमके और एमडीएमके तमिलों के लिए अलग ईलम चाहती हैं.’’

'खींचतान भरे रिश्ते'

करुणानिधि

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हालांकि ऐसा नहीं है कि श्रीलंका मुद्दा इस चुनाव में बहुत बड़ा है. हालांकि ये दक्षिणी तमिलनाडु में मुद्दा हो सकता है लेकिन ऐसा मुद्दा फिर भी नहीं है जिससे चुनाव प्रभावित हों. लेकिन इस गठबंधन को ख़तरा इस बात से है कि पीएमके और डीएमडीके की नहीं बनती क्योंकि ये पार्टियां राज्य के अलग-अलग सामाजिक समूहों का प्रतिनिधित्व करती हैं.

पीएमके को प्रमुख तौर पर वन्नियारों की पार्टी समझा जाता है, जो एक पिछड़ा वर्ग हैं. वहीं डीएमडीके को दलितों का अच्छा समर्थन हासिल है. ये दोनों दल डीएमके से ही निकले हैं.

बीते साल एक दलित युवक की इसलिए हत्या कर दी गई थी क्योंकि उसने धर्मापुरी ज़िले में एक वन्नियार महिला से शादी कर ली थी, इस घटना से इस गठबंधन में राजनीतिक तनाव और बढ़ा ही है. इन दोनों पार्टियों के बीच जो तनाव भरा रिश्ता है उससे दोनों पार्टियों को राज्य के पश्चिमी और उत्तरी हिस्सों में जो समर्थन मिल रहा है उस पर भी असर पड़ रहा है.

चुनाव प्रचार बिल्कुल ख़त्म होते-होते पीएमके के प्रमुख डॉक्टर रामदास के बेटे अंबुमणि रामदास और डीएमडीके के प्रमुख विजयकांत ने मंच साझा किया. कुछ लोगों ने माना कि इसका गठबंधन को फ़ायदा होगा.

हालांकि सत्यमूर्ति इससे सहमत नहीं हैं. वो कहते हैं, ''दोनों पार्टियों के कार्यकर्ता बिल्कुल विपरीत ढंग से काम कर रहे हैं. उत्तरी तमिलनाडु में इसका फ़ायदा डीएमके या एआईएडीएमके को हो सकता है. उत्तरी तमिलनाडु में ये एक बड़ा मुद्दा होने वाला है. दोनों पार्टियों को एक दूसरे के समर्थन का फ़ायदा नहीं होगा.’’

'कोई मोदी फ़ैक्टर नहीं'

जयललिता

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इस असुविधाजनक गठबंधन की वजह से भाजपा अपने सहयोगियों की ताक़त का इस्तेमाल वहां करने में जुटी है जहां उसके उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं.

एआईएडीएमके के एक नेता नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं, ''जहां उम्मीदवार व्यक्तिगत तौर पर मज़बूत हैं, जैसे कि अंबुमणि रामदास जो कि अपने क्षेत्र से जुड़े हुए हैं, वहां गठबंधन को फ़ायदा हो सकता है.’’

विश्लेषक मानते हैं कि कोयंबटूर में भाजपा के सी. पी. राधाकृष्णन, कन्याकुमारी में भाजपा के पोन राधाकृष्णन और पोलाची में केएमडीएके के नेता ई. आर. ईश्वरन उन नेताओं में हैं जो गठबंधन की समस्याओं के बावजूद कड़ी टक्कर दे सकते हैं. उदाहरण के लिए ईश्वरन को साल 2009 में निर्दलीय चुनाव लड़ने पर 1.27 लाख वोट मिले थे. अब वो भाजपा के चुनाव चिह्न पर लड़ रहे हैं.

जनकराजन कहते हैं, ''भाजपा को उभरते मध्य वर्ग और युवा मतदाताओं पर भरोसा है. असल में कोई मोदी फ़ैक्टर नहीं है. हालांकि इस बात पर शक है कि इसका कोई असर डीएमके या एआईएडीएमके के पारंपरिक वोट बैंक पर होगा. असली लड़ाई तो इन्हीं परंपरागत प्रतिद्वंद्वियों में है.’’

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