चुनावी मौसम में मदरसों की ओर दौड़ते नेता

- Author, अतुल चंद्रा
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिन्दी डॉटकॉम के लिए
लखनऊ में स्थित नदवातुल उलूम इस्लाम की शिक्षा का विश्व प्रसिद्ध केंद्र है और मुसलमान समुदाय में इसकी प्रतिष्ठा बहुत अधिक है. यही वजह है कि एक भारतीय जनता पार्टी को छोड़कर सभी राजनीतिक दल नदवे के उप-कुलपति से मदद मांगने जाते हैं.
बहुजन समाज पार्टी के नेता सतीश चन्द्र मिश्रा उप-कुलपति मौलाना राबे हसन नदवी से इसी आशय से मिले थे कि उनके ज़रिए मुसलमानों का वोट हासिल किया जा सके.
नदवे में 5,000 छात्र हैं. पहले तो इंडोनेशिया, मलेशिया और सऊदी अरब से छात्र यहाँ इस्लाम की शिक्षा हासिल करने आते थे.
ख़ुद को नदवे का ख़ादिम कहने वाले हारुन रशीद बताते हैं कि पिछले दस वर्षों से विदेशी छात्रों को यहां आने के लिए वीज़ा मिलना बंद हो गया है.
हारुन कहते हैं कि नदवे के मौलाना सियासी मामलों से दूर रहते हैं. आज तक सिर्फ़ एक बार नदवे के किसी भी उप-कुलपति या प्रधानाध्यापक ने खुलकर किसी राजनीतिक दल या नेता का विरोध किया है.
1992 में जब बाबरी मस्जिद गिराई गई, उस समय यहाँ के उप-कुलपति मौलाना अली मियाँ ने कांग्रेस का खुलकर विरोध किया था.
न कांग्रेस गई, न एसपी

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आल-इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की कार्यकारी समिति के सदस्य जफ़रयाब जिलानी एक और वाकया बताते हैं, जब मौलाना अली मियां ने सियासी मसले में अपनी राय दी थी.
जिलानी के अनुसार जिस वक़्त मुलायम सिंह यादव ने कल्याण सिंह के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था, मुसलमान उनसे ख़ासे नाराज़ थे.
लेकिन पर्सनल लॉ बोर्ड की एक मीटिंग के बाद अली मियां ने बातों-बातों में सिर्फ़ इतना कहा कि इस शख्स (मुलायम) के अलावा कोई दूसरा नज़र नहीं आता. उनका इतना कहना ही काफी था.
इस्लाम धर्म की शिक्षा का एक और केंद्र सहारनपुर स्थित दारुल उलूम देवबंद है. इसकी स्थापना सन 1866 में बढ़ते हुए अंग्रेज़ी साम्राज्य और ईसाई धर्म से लड़ने के लिए हुई थी.
नदवे के शिक्षकों के मुकाबले यहाँ के शिक्षक राजनीति में ज़्यादा दखल रखते हैं. लेकिन गुजरात से आए मौलाना वस्तानवी को देवबंद इसलिए छोड़ना पड़ा क्योंकि उन्होंने नरेंद्र मोदी के बचाव में बयान दिया था.
हाल ही में आम आदमी पार्टी के मनीष सिसोदिया देवबंद के मौलाना ख़ालिक़ संभली से मिले थे. इस मुलाक़ात के बाद देवबंद की ओर से बयान जारी हुआ जिसमें कहा गया था कि देवबंद राजनीति से दूर रहता है.

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इसके अलावा हैदराबाद की जामिया निज़ामिया भी इस्लाम धर्म का एक पुराना शिक्षण केंद्र है.
चुनाव आते ही इन सभी केन्द्रों में नेताओं का आना-जाना बढ़ जाता है.
फिलहाल सतीश चन्द्र मिश्रा के अलावा अभी अन्य किसी दल के नेता ने मौलाना राबे हसन से मुलाक़ात नहीं की है.
संभवतः मुलायम सिंह यादव को वहाँ जाने की ज़रूरत न पड़े क्योंकि जिलानी आजकल समाजवादी पार्टी को वोट देने के लिए मुसलमानों को ज़ोर-शोर से प्रेरित कर रहे हैं. जिलानी की राय भी मुस्लिम बुद्धिजीवियों में मायने रखती है. मुलायम के वहाँ न जाने का एक कारण यह भी हो सकता है कि वे देवबंद का समर्थन ले चुके हैं.
माना जाता है कि कांग्रेस के नेताओं को नदवे जाने या ना जाने से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा क्योंकि मुसलमानों की नज़र में वो पार्टी अभी भी पूरी तरह से उनका विश्वास नहीं जीत पाई है.
भाजपा के विरुद्ध

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दूसरी ओर यह माना जा रहा है कि शिया धार्मिक गुरु मौलाना कल्बे जव्वाद से भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह की मुलाक़ात के बाद शिया मुसलमानों का वोट भारतीय जनता पार्टी को जाएगा.
लेकिन क्या यह कहना आसान है कि लखनऊ के मुसलमान सिर्फ जफरयाब जिलानी और मौलाना कल्बे जव्वाद के कहने के अनुसार ही अपना वोट देंगे?
जिलानी इससे इंकार करते हैं. वह कहते हैं कि समुदाय का मुख्य उद्देश्य भारतीय जनता पार्टी को रोकना है. उसके लिए वोटिंग से एक दिन पहले भी वे तय कर सकते हैं कि कौन भाजपा को हरा सकता है और वोट उसी को जाएगा.
जिलानी के अनुसार लखनऊ से कांग्रेस की प्रत्याशी रीता बहुगुणा जोशी "फाइट में नहीं हैं", इसलिए सपा के अभिषेक मिश्रा को समर्थन दिया जा रहा है.
राजनाथ और जव्वाद की मुलाक़ात को भी वह गंभीरता से नहीं लेते हैं क्योंकि उनका मानना है कि मुसलमान किसी भी सूरत में भाजपा को वोट नहीं देगा.
यदि जिलानी की बात मानी जाए तो पहले चरण के मतदान में भी मुसलमानों ने इसी आधार पर वोट दिया था.
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