सागरनामा-8: ...अगर उनका वोट होता?

- Author, मधुकर उपाध्याय
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
उम्र सपनों और आकांक्षाओं के पर कुतरती चलती है. यही उसका सबसे प्रिय भोजन है.
धीरे-धीरे, कुतरे परों वाली कल्पनाओं की उड़ान सीमित होती जाती है और एक वक़्त आता है, जब वह उम्र के मकड़जाल में इस तरह फँस जाती है कि बाहर निकलने का रास्ता तक नहीं मिलता.
STYसागरनामा-4: क्या गुजरात में मुसलमान डरे हुए हैं?सागरनामा-4: क्या गुजरात में मुसलमान डरे हुए हैं?डर के कई चेहरे हो सकते हैं और इसका एक पहलू गुजरात के मुसलमानों से मिलकर समझा जा सकता है. वे बात करने से कतराते हैं. लगता है कि हवा पर भी पहरा हो. वरिष्ठ पत्रकार मधुकर उपाध्याय की आँखोंदेखी.2014-03-25T16:23:37+05:302014-03-26T12:37:39+05:30PUBLISHEDhitopcat2
इस बात का विस्तार किसी एक गाँव-खेड़े, मोहल्ले-क़स्बे से लेकर पूरे देश तक किया जा सकता है. दीगर विषयों का विस्तार और संकुचन भी. हाल सब जगह एक जैसा है. पीढ़ियों का अंतर जिस बात से पैदा होता है वह दरअसल उम्र नहीं बल्कि कुतरे जाने से बचे रहे सपनों का अंतर है.
महाराष्ट्र के कोंकण इलाक़े में अलीबाग़ के समुद्र तट पर अलस्सुबह बहुत से लोग घूमने आते हैं. कुछ बेहतर सेहत के लिए, कुछ मौज-मस्ती के मूड में और कुछ राजनीतिक एजेंडा तय करने के इरादे से. इस दौरान तमाम बातें होती हैं. बहस-मुबाहिसे चलते हैं.
निश्चित रूप से क़स्बाई चरित्र वाले ऐसे शहरों के तट शहर की राय क़ायम करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं.
तीन सीढ़ियाँ

अमरीकी चिंतक और लेखक डेव बर्ग संभवतः इसी ओर इशारा कर रहे थे, जब उन्होंने लिखा कि ये मामला दो पीढ़ियों का नहीं बल्कि तीन सीढ़ियों का है.
पहली, जब हम सबकुछ जानते हैं, सबकुछ के बारे में.
दूसरी, जब हमें कुछ-कुछ पता होता है, कुछ-कुछ के बारे में.
और तीसरी, जब हमें कुछ भी नहीं पता होता कुछ भी नहीं के बारे में.
FIXकौन हैं चुनाव 2014 के किंगमेकर?कौन है्ं चुनाव 2014 के किंगमेकर?सर्वेक्षणों और विश्लेषकों की मानें तो 2014 के आम चुनाव में किसी एक राष्ट्रीय दल को बहुमत मिलता नहीं दिखता. तो क्या क्षेत्रीय दल किंगमेकर की भूमिका में होंगे? वरिष्ठ पत्रकार मधुकर उपाध्याय की कलम से...कौन हैं चुनाव 2014 के किंगमेकर?2014-03-21T17:13:04+05:302014-03-27T16:46:01+05:30PUBLISHEDhitopcat2
उम्र के हिसाब से, इस क्रम में बिना उलटफेर, अपने में उलझी-लिपटी ज़िंदगियाँ अलीबाग़ तट की सीढ़ियों पर थीं.
तीसरी सीढ़ी पर बैठे लोग छड़ी के सहारे चलते हुए आए और वहीं से लौट गए. जैसे दुआ-सलाम और थोड़ी सी इज़्ज़त से आगे उन्हें कुछ दरकार नहीं थी.
दूसरी सीढ़ी के लोग अपनी मुश्किलें और हताशा-निराशा व्यक्त करते धीमे क़दमों से चल रहे थे. बिजली, पानी, चुनाव, नावों, तांगों और मछलियों के बारे में बात करते.
पहली सीढ़ी वालों की राय सबसे स्पष्ट, दो-टूक और बेबाक थी. वे सीढ़ियों से उठकर तट तक जाते थे कि लहरें उनके पाँव पखार सकें. नई दहलीज़ छूने की हड़बड़ी में थे कि कब उन्हें राजनीतिक अधिकार मिलें.
भविष्य की राय
इस समूह में अभी-अभी बारहवीं कक्षा में पहुँचे सोलह-सत्रह साल की उम्र के लड़के थे, जिनकी बहस सोशल मीडिया के बारे में थी.
STYसागरनामा-2: गुजरात में राजनीति का मछली बाज़ारसागरनामा-2: गुजरात में राजनीति का मछली बाज़ारगुजरात में मछली पकड़ने के कारोबार में बहुत से लोग अपना जीवनयापन कर रहे हैं, पर उनकी अपनी समस्याएँ जिनमें से ज़्यादातर को अनसुना कर दिया जाता है. वरिष्ठ पत्रकार मधुकर उपाध्याय की आंखोंदेखी.2014-03-24T18:29:55+05:302014-03-25T08:03:51+05:30PUBLISHEDhitopcat2
वे अख़बार पढ़ते हैं, इंटरनेट देखते हैं और टेलीविज़न पर ख़बरें सुनकर अपनी राय बनाते हैं. ट्विटर और फ़ेसबुक उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा हैं. ये लड़के गहरे दोस्त हैं और उनकी साझा चिंता देश का भविष्य है.
ज़ाहिर है, हर चीज़ पर उनकी एक राय है. चुनावी चर्चाओं में नियमतः छोड़ दिए जाने वाले इस समूह में सबकी उम्र एक से डेढ़ साल बाद अट्ठारह की होगी, जब उन्हें वोट डालने का हक़ मिलेगा. उनका मानना है कि ऐसा होने तक पूरे राजनीतिक विमर्श में न उनकी पसंद-नापसंद मायने रखती है, न आकांक्षाएं और सपने.
अट्ठारह वर्ष की उम्र की दहलीज़ के ठीक बाहर खड़े इस युवा वर्ग की राय बेहद महत्पूर्ण है. ये लोकतंत्र पर भविष्य की राय जानने की तरह है, जिसका परचम उन्हीं के हाथ आने वाला है.
समय आएगा

ये पूछने पर कि अगर उन्हें वोट डालने का हक़ होता तो वे किसे वोट देते और क्यों, एक लड़के ने कहा कि उसकी पसंद नरेंद्र मोदी होंगे. कारण कि उनमें क्षमता, अनुभव और दूरदर्शिता है.
STYमंज़िल तक पहुंचेगी मोदी की 'पंखों वाली रेलगाड़ी'?मंज़िल तक पहुंचेगी मोदी की 'पंखों वाली रेलगाड़ी'?प्रधानमंत्री पद के लिए नरेंद्र मोदी का दावा जितना मज़बूत दिख रहा है, आशंकाएं भी उतनी ही हैं. क्या मंज़िल तक पहुंचेगी उनकी पंखों वाली रेलगाड़ी. मधुकर उपाध्याय का विश्लेषण. 2014-02-11T22:24:31+05:302014-02-12T16:46:04+05:30PUBLISHEDhitopcat2
दूसरे लड़के की राय अलग थी. उसकी नज़रें राहुल गाँधी पर टिकी हैं. राहुल का नया ख़ून, युवा जोश, विचारों का खुलापन और सबसे मिल-पूछ कर राय बनाने का ढंग उसे आकर्षित करता है.
एक तीसरा लड़का भी था जिसने आम आदमी पार्टी का नाम लिया. भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ अभियान के हामी उस लड़के का कहना था कि ये लोग ईमानदार हैं, पढ़े लिखे हैं और उनमें जुनून है.
अलीबाग़ के तट पर तांगे चलते हैं. पर वे तभी चल सकते हैं जब पानी उतरे और सही वक़्त आए. समुद्र में चारों ओर से पानी से घिरे क़िले तक जाने के लिए उन्हें इंतज़ार करना होता है.
युवा वर्ग भी प्रतीक्षा में है कि जब उसका समय आएगा, वह दृढ़ राय और पूरी तैयारी के साथ लोकतंत्र के समुद्र में उतरेगा.
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