हरीश का दांव और सतपाल का वार

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- Author, शिव जोशी
- पदनाम, देहरादून से, बीबीसी हिन्दी डॉटकॉम के लिए
उत्तराखंड की कांग्रेस सरकार और उसके मुख्यमंत्री हरीश रावत के साथ वही हो रहा है जिसकी आशंका पहले से थी.
पहले दिन से जब निर्दलियों और बीएसपी के समर्थन से सरकार बनी थी और उसका मुखिया विजय बहुगुणा को बनाया गया था तब से ही संशय का माहौल था.
दो साल पूरा होते होते बहुगुणा की विदाई हुई और हरीश रावत ने कमान संभाली लेकिन बहुगुणा के ख़िलाफ़ मोर्चाबंदी में हरीश को जहां दो साल का समय लगा वहीं उत्तराखंड में कांग्रेस के तीसरे कद्दावर नेता सतपाल महाराज ने उन्हें दो महीने पूरा होते-होते ही ज़ोर का झटका दे दिया.
उन्होंने उस पार्टी को ही विदा कह दिया जिस पार्टी के टिकट पर वो गढ़वाल से दो बार सांसद रह चुके हैं.
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सतपाल महाराज ने एक तीर से कई निशाने साधने का दांव चला है. पार्टी छोड़ी लेकिन सरकार पर अब बादल बनकर मंडरा रहे हैं. अगर उनके साथ, जैसा कि बताया जा रहा है, छह विधायक भी चले गए तो सरकार गिर सकती है.
लेकिन क्या ऐसा संभव है? क्या हरीश रावत इतने कच्चे खिलाड़ी हैं? जब वो सतपाल महाराज को भड़काने और उकसाने वाले बयान दे रहे थे तो क्या उन्हें अंदाज़ा न रहा होगा कि सतपाल कोई बहुत कड़ा कदम भी उठा सकते है.
सरकार गिराने के लिए दो तिहाई विधायकों का टूटकर अलग दल बनाना या किसी अन्य को समर्थन चाहिए होता है, सतपाल के पास इतने विधायक नहीं है. उनके वफ़ादार विधायकों को इस्तीफा देना होगा. फिर चुनाव होंगे. जो कि एक लंबी प्रक्रिया है तो सरकार को तत्काल कोई संकट नज़र नहीं आता.
पद छोड़ने की दिलेरी

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दूसरी बात, विधायक का पद छोड़ने की दिलेरी दिखाना कितनों के लिए संभव है. जैसा कि कांग्रेस के ही सूत्र बताते हैं कि हरीश रावत पिछले कई दिनों से इसी होमवर्क पर जुटे हुए हैं.
वरिष्ठ पत्रकार जयसिंह रावत के मुताबिक, “हरीश रावत ने एक तरह से सतपाल महाराज को बाहर का रास्ता दिखाया है. ये उनकी एक रणनीति ही रही होगी. कुछ जोखिम है लेकिन लगता तो यही है कि हरीश रावत सरकार पर संभावित ख़तरे को न्यूट्रलाइज़ कर देंगे.”
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गढ़वाल की सीट पर इस बार बीजेपी से बीसी खंडूड़ी मैदान में हैं. खंडूड़ी केंद्र में मंत्री रह चुके हैं, उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रह चुके हैं, उनकी साफ छवि मानी जाती है, लोगों में उनके प्रति एक भरोसा और सहानुभूति भी है क्योंकि पिछला विधानसभा चुनाव भितरघात की वजह से वो हार गए थे. तो उनकी सीट इस बार पक्की मानी जा रही है.
सतपाल महाराज के लिए ये एक कड़ा मुकाबला था और उन्होंने चुनाव न लड़ने की इच्छा भी जता दी थी. उनके विरोधी दबे स्वरों में कहते थे कि महाराज मैदान छोड़ रहे हैं. इस बीच सतपाल महाराज ने खुले रूप से नाराज़गी दिखाना और ये आभास देना शुरू कर दिया कि पार्टी और सरकार में उनकी कद्र नहीं है.
आलाकमान को संदेश
सूत्रों के मुताबिक हरीश रावत ने भी इसी बिसात पर उनका स्वागत किया और इस तरह से पार्टी आलाकमान को संदेश देने की कोशिश की कि सतपाल मुकाबले से भाग रहे हैं और देहरादून में कथित रूप से मोलभाव कर रहे हैं.
ये स्थितियां सतपाल के लिए नागवार थीं. आखिर उत्तराखंड में कांग्रेस की राजनीति में उनका गहरा दखल रहा है, उनके पास बताया तो जाता था कि दर्जन भर से ज़्यादा विधायकों का समर्थन था, सीएम वो नहीं बन पाए, अपनी मंत्री पत्नी अमृता रावत को ठीकठाक महकमा नहीं दिला पाए.
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सतपाल महाराज लोकसभा चुनावों में बीजेपी को फ़ायदा पहुंचा सकते हैं. हरीश रावत तो कह रहे हैं कि राज्य में कांग्रेस को तीन सीटे मिल जाएंगी, जिन दो सीटों की उन्होंने बात नहीं की उनमें एक सीट गढ़वाल की भी है जहां से सतपाल सांसद हैं. कहते हैं कि हरीश का यही बयान सतपाल को बहुत चुभा.
वरिष्ठ पत्रकार जयसिंह रावत कहते हैं, "कांग्रेस के खिलाफ एक संदेश तो मतदाताओं में जाएगा कि बड़े नेता छोड़-छोड़ कर जा रहे हैं. दूसरी बात उत्तराखंड के संदर्भ में ये है कि गढ़वाल सीट पर सतपाल की टक्कर का नेता ढूंढने में कांग्रेस के पसीने छूट जाएंगे. उसे सतपाल महाराज का विकल्प लाना होगा. जो फिलहाल दूर-दूर तक दिखता नहीं है.”
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