दो साल में सुधर सकती है अर्थव्यवस्था: कौशिक बसु

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    • Author, सौतिक बिस्वास
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, नई दिल्ली

विश्व बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री कौशिक बसु के मुताबिक ख़राब प्रशासन और अधारभूत ढांचे की कमी के चलते भारत के विकास की राह में बाधा उत्पन्न हो रही है.

भारत की मौजूदा विकास दर पाँच फीसदी से भी कम है. एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था इन दिनों बढ़ती महंगाई, मुद्रा की कमजोर होती साख और विदेशी निवेश में कमी का सामना कर रही है.

खनन और निर्माण उद्योग में भी मंदी से स्थिति बिगड़ रही है. ऐसे में मेरे साथ एक बातचीत में भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार रह चुके कौशिक बसु ने भारतीय अर्थव्यस्था की चुनौतियों पर अपनी राय रखी. इस बातचीत के प्रमुख अंश-

नए साल में भारतीय अर्थव्यवस्था की क्या उम्मीद है और क्या प्रमुख चुनौतियाँ हैं?

मेरा मानना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था का आधार बड़ा ही मज़बूत है. हालांकि अभी यह कहना थोड़ा अलग दिख सकता है क्योंकि भारतीय अर्थव्यवस्था के लिहाज से बीते एक-दो साल अच्छे नहीं रहे हैं.

लेकिन अगर आप लंबे समय में इसे देखें तो 1994 से ही भारतीय अर्थव्यवस्था अच्छा कर रही है. 2003 के बाद बहुत अच्छा कर रही थी, ख़ासकर 2005 तक. पिछले एक या डेढ़ सालों में इसने ख़राब प्रदर्शन किया है. ऐसे में भारत के सामने दो बड़ी चुनौतियां हैं. एक तो ख़राब प्रशासन की है. फ़ैसले लेने में देरी होती है. नौकरशाही काफी मुश्किलें पैदा करती हैं. दूसरी चुनौती अधारभूत ढांचे की है.

भारत को बेहतर ढांचे की जरूरत है. यह आसान चुनौती है. मुझे उम्मीद है कि भारत आने वाले पांच से दस सालों में अपने आधारभूत ढांचे को बेहतर करेगा. मुझे यह भी यकीन है कि इससे तब भी अर्थव्यवस्था सुधरेगी जब हम प्रशासनिक स्तर को नहीं सुधार पाएं.

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क्योंकि 1994 के बाद से तो ऐसे ही प्रशासन के बीच हम अच्छा कर रहे थे. भारत में ख़राब प्रशासन तो बीते 60 साल से हमारी विरासत का हिस्सा बन चुका है. व्यवस्था इसके इर्द-गिर्द काम करना सीख चुकी है. लेकिन अगर प्रशासन और अधारभूत सुविधाओं की स्थिति बेहतर हो जाए, तो काफी संभावनाएं मौजूद हैं, हालांकि इसमें पहली चुनौती काफी कठिन है.

ऐसे में अर्थव्यवस्था के और भी कमज़ोर होने का डर क्या बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है?

निश्चित तौर पर, हालांकि आशंकाएं बिना किसी आधार के भी नहीं हैं. हर समय कोई ना कोई मुश्किल आती है. लोग अतिरिक्त सावधानी बरतने लगते हैं. जब ऐसा 'स्लो सिस्टम' में होता है तो ठहराव की स्थिति बनती है. ऐसे में नीतियों के अटकने की आलोचना का कुछ तो आधार है ही.

भारत धीमे विकास के साथ सर्वाइव कर चुका है और हम ऐसे ही दौर से गुजर रहे हैं. लेकिन मेरा मानना है कि हम इससे उबर जाएंगे. हम ऊँची विकास दर को फिर से हासिल कर पाएंगे. भारत को पूर्ण विकास देने के लिए प्रशासन को पूरी तरह से सुधारने की जरूरत है. जो हो भी सकता है और नहीं भी.

आपने कमजोरियों की बात की, हमारी अर्थव्यवस्था की मज़बूती क्या है?

भारत की मज़बूती में शामिल है उच्च बौद्धिकता. तकनीकी और इंजीनियरिंग क्षमता भी काफी ज़्यादा है. इसकी वजह है कि गरीब और विकासशील अर्थव्यवस्था वाले मुल्क के तौर पर भारत ने उच्च शिक्षा पर कहीं ज्यादा पैसा खर्च किया, वह भी तब जब मूलभूत साक्षरता पर उतना ध्यान नहीं दिया गया.

इसका असर हर जगह दिखाई देता है. उदाहरण के लिए अमरीका के सिलिकॉन वैली में बड़ी संख्या में भारतीय मौजूद हैं. अमरीका में आधे से ज्यादा आप्रवासी पेशेवर भारतीय हैं.

यह अपने आप में एकदम अलग पहलू है. विकासशील देशों में भारत ने अपने यहां उच्च शिक्षा के क्षेत्र पर काफी खर्च किया है, जबकि प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र पर उतना खर्च नहीं किया गया.

भारत की दूसरी ताकत है- श्रम संसाधन. पुराने जमाने में श्रम संसाधन का इस्तेमाल ग्लोबल बाज़ार के लिए मुश्किल भरा था. लेकिन आज के तकनीकी युग में श्रम बाज़ार अब एक कॉमन पूल में तब्दील होता जा रहा है, जो एक तरह से ग्लोबल अर्थव्यवस्था को बदल रहा है. मेरे ख्याल से यह ग्लोबल संकट का एक कारक भी और चुनौती भी.

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अब यह संभव है कि भारत में बैठकर आप जापानी, अमरीकी और यूरोपीय कंपनियों के लिए काम करें. पहले यह संभव नहीं था.

भारत का श्रम संसाधन कई लिहाज से सबसे बड़ी ताकत है.

भारत के कुल जीडीपी का 14 फीसदी हिस्सा कृषि के क्षेत्र से आता है, लेकिन भारत का 50 फीसदी से ज्यादा श्रम संसाधन कृषि में लगा हुआ है. यह दर्शाता है कि कृषि के क्षेत्र में काफी ज्यादा श्रम संसाधन लगा हुआ है. अगर इस ज्यादा श्रम संसाधन को ग्लोबल ऐक्टिविटी से जोड़ लिया तो भारत एक बड़ी ताकत बन सकता है. जिस तरह से चीन में औसत मज़दूरी की दर बढ़ रही है उसे देखते हुए यह मुमकिन नजर आ रहा है.

ऐसे में भारत अपने श्रम संसाधन का प्रभावी इस्तेमाल किस तरह से कर सकता है?

एक बार फिर, अधारभूत सुविधाओं का अभाव सबसे बड़ा रोड़ा है. भारत को ऐसे छोटे-छोटे शहरों की जरूरत है जहां जायदाद की दरें सस्ती हों. भारत अपने श्रम संसाधनों को इन शहरों में बसाकर उन्हें ग्लोबल इकॉनमी का सर्विस प्रोवाइडर यानी वैश्विक अर्थव्यवस्था को सेवाएँ देने वाला बना सकता है.

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चीन अपने नए और छोटे शहरों का इस्तेमाल प्रभावी ढंग से करता रहा है. भारत ने ऐसा नहीं किया है. छोटे शहरों के विकसित होने के लिए सरकार को पर्याप्त अधारभूत सुविधाएं, रेल और सड़क मार्ग से संपर्क की सुविधाएं देनी होंगी. कानून और प्रशासन की व्यवस्था बेहतर करनी होगी. तब जाकर आम आदमी की उद्यमशीलता अपना काम कर पाएगी.

लेकिन भारत धीमी विकास दर और उच्च महंगाई दर की चुनौती से कैसे पार पा सकता है?

यह समस्या ज्यादा दिनों तक नहीं रहेगी. 2003 से 2011 के दौरान भारत की विकास दर औसतन 8 फीसदी की रही. 2008 से महंगाई की दर 10 फीसदी के आस-पास पहुंच गई. 1970 में कोरिया के भी यही आकंड़े थे. चुनौती इस बात की है कि पिछले एक-डेढ़ साल में भारत की विकास दर 4.5 से 5 फीसदी तक रह गई है और इससे महंगाई की मार ज्यादा पड़ रही है.

महंगाई को लेकर लोग सरकार को कोसते हैं, जबकि यह अर्थव्यवस्था की समस्या है. हम जानते हैं कि ब्याज़ दर को नियंत्रित करके, राजकोषीय घाटे को कम करके महंगाई पर काबू पाया जा सकता है लेकिन कोई ऐसा तरीका नहीं जिससे महंगाई पर काबू हो ही जाए.

ज्यादातर लोग सोचते हैं कि सरकार महंगाई पर काबू पा सकती है लेकिन लगभग सवा अरब लोगों के देश में लाखों लोग हैं जों कीमतें तय कर रहे होते हैं. इसके बावजूद सरकार कीमतें कम कर सकती है और उसे करना भी चाहिए. लेकिन इसके लिए उसे विकास दर को 8 फीसदी तक ले जाना होगा. यह अगले दो सालों में संभव है.

भारत के बैंकों की स्थिति इतनी ख़राब क्यों हैं? क्या वे अपनी कमजोरियां छुपाते हैं?

जब अर्थव्यवस्था बेहतर होती है तो यह मुश्किलें नजर नहीं आतीं. लेकिन मंदी के आते ही बैंकिंग व्यवस्था में कमजोरियां नजर आने लगती हैं. मेरे ख्याल से भारतीय बैंकिंग व्यवस्था को काफी प्रभावी होने की जरूरत है.

मेरे ख्याल से बैंकों का सरकार के नियंत्रण में होना जरूरी है, जैसा कि 2008 के ग्लोबल मंदी के दौर में दुनिया भर के विकसित देशों ने महसूस किया. लेकिन इन बैंकों को राजनीतिक व्यवस्था प्रभावित कर सकती हैं. दूसरे देशों की तरह भारत में ऐसा नहीं हुआ है लेकिन इसका ख़तरा तो है ही.

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इसलिए भारत में और ज्यादा खुले निजी बैंकिंग सेक्टर की जरूरत हैं, जिससे इस क्षेत्र में और भी विकास हो.

भारत में ज्यादा नौकरियां कैसे पैदा की जा सकती हैं? हमें हर साल 1.2 करोड़ नौकरियां चाहिए लेकिन हमारे यहां संगठित क्षेत्र में कुल नौकरियों की संख्या ही इतनी है.

हमारे यहां ज्यादातर नौकरियां असंगठित क्षेत्र में उत्पन्न होती है. प्रत्येक नौकरी संगठित क्षेत्र में उत्पन्न हो भी नहीं सकती. रोजगार बड़ी चुनौती है और विकास की उम्मीद भी. हमें कई पहलुओं पर काम करने की जरूरत है.

छोटे शहर विकसित करने होंगे. अधारभूत सुविधाओं को बेहतर करना होगा. श्रम कानून को नए सिरे से देखने की जरूरत है. हमें अप्रैल, 1947 के पुराने कानून में तर्कसंगत बदलाव करने होंगे.

छोटे स्तर पर निर्माण को बढ़ावा देना होगा. भारत के कुल जीडीपी का 15 फीसदी हिस्सा निर्माण के क्षेत्र से आता है. यह काफी कम है. इसे बढ़ाना होगा. यह भारतीय अर्थव्यवस्था में शामिल पहलू है जिस पर काम नहीं हुआ है.

पहले भी मैंने कहा सरकार को कुछ मूलभूत काम करना होगा- सड़क, बिजली की सुविधाओं को पूरा करना होगा. बाजार और श्रम संसाधन के लिए प्रभावी कानून व्यवस्था मुहैया करना होगा. बाकी सारे काम अपने आप होते चले जाएंगे.

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