युवाओं को नौकरी की ट्रेनिंग चाहिए या पढ़ाई?

- Author, योगिता लिमये
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, मुंबई
पिछले दो सालों में भारत की अर्थव्यवस्था में तेज़ी से गिरावट आई है. इससे युवाओं के रोज़गार पर सीधा असर पड़ा है.
ख़ासतौर पर स्नातक की डिग्री पाए उन युवाओं पर असर पड़ा है जो अच्छी नौकरी की चाहत रखते हैं. लेकिन इसके बाद भी अर्थव्यवस्था में दक्ष युवाओं की बहुत मांग है.
भारत के करोड़ों युवाओं को अगर सही शिक्षा और काम मिले तो वो आने वाले दशकों में बड़े वैश्विक उपभोक्ता बन सकते हैं.
भारत में जहाँ करोड़ों युवा इस साल <link type="page"><caption> विश्वविद्यालयों से निकल कर</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/10/131020_higher_education_private_university_akd.shtml" platform="highweb"/></link> अच्छा काम पाने के लिए संघर्ष करेंगे, वहीं व्यवसाय और उद्योग, उत्पादन के लिए पर्याप्त संख्या में दक्ष और काम करने को तैयार युवा नहीं ढूँढ पा रहे हैं.
इन युवाओं को बिल्कुल शुरू से ट्रेनिंग देने की ज़रूरत पड़ सकती है और इसमें कई साल भी लग सकते हैं.
फैक्ट्री में रखने को मजबूर

गुजरात के साणंद में रविराज फॉइल्स की फैक्ट्री में तेज़ी से काम चल रहा है. यहाँ अपने उपभोक्ताओं की ज़रूरत पूरी करने के लिए तीन शिफ्ट में 24 घंटे काम करने के लिए 250 दक्ष कर्मचारियों की ज़रुरत है.
लेकिन ज़रूरत के अनुसार दक्ष कर्मचारी नहीं मिल पा रहे हैं. फैक्ट्री के मालिक जयदीप सिंह वाघेला पड़ोस के गाँव से ग़ैर प्रशिक्षित कर्मचारियों को अपनी फैक्ट्री में रखने को मजबूर हैं.
वो कहते हैं, "लोगों को पहली नौकरी देने के बाद उन्हें <link type="page"><caption> प्रशिक्षित करने में</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/11/131018_amitabh_science_story_mars_mission_sk.shtml" platform="highweb"/></link> कम से कम तीन साल लग जाते हैं ताकि वे स्वतंत्र रूप से मशीन चला सकें."
उन्होंने कहा, "इससे हमारी लागत बढ़ जाती है क्योंकि हमें अपने काम में बहुत ही निपुणता की ज़रूरत होती है. अप्रशिक्षित कर्मचारियों के साथ काम करने की मजबूरी के कारण कभी-कभी हमारा नुक़सान भी हो जाता है."
जयदीप सिंह वाघेला कहते हैं, "हमें दक्ष कर्मचारियों को अधिक तनख्वाह देने में परेशानी नहीं है लेकिन हम उन्हें कहाँ ढूँढें ?"
'ट्रेनिंग से मदद'

देश में विश्व की सबसे अधिक युवा आबादी होने के बाद भी अधिकतर क्षेत्रों में यह परेशानी है.
इसका कारण साफ़ है. योजना आयोग के अनुसार, कर्मचारी श्रेणी में शामिल लोगों में से केवल 10 प्रतिशत ही प्रशिक्षित हैं.
इसकी तुलना में एशिया और पश्चिम के देशों में 60 से 96 फीसदी कर्मचारी नौकरी के लिए ट्रेनिंग लेते हैं.
गणेश गैकर कोहिनूर टेक्निकल इंस्टीट्यूट के छात्र हैं. वो 22 साल के हैं और उन्होंने मैकेनिकल स्किल्स कोर्स चुना है क्योंकि इस इंस्टीट्यूट के छात्रों को नौकरी पाने में कोई दिक्कत नहीं हुई है.
वो कहते हैं, "इस ट्रेनिंग से मुझे बहुत मदद मिली है. अभी कोर्स पूरा होने में कुछ महीने बाकी हैं लेकिन मुझे पहले ही कुछ कंपनियों से नौकरी के प्रस्ताव मिल चुके हैं."
उनका अनुभव उन छात्रों से अलग है जो विश्वविद्यालों में पढ़ाई कर रहे हैं. अर्थव्यवस्था में आई गिरावट के बाद बहुत कम अच्छी नौकरियां बची हैं.
मुंबई के एक कॉलेज में फाइनेंस के छात्र मयंक मेहता पढ़ाई पूरी होने के बाद नौकरी पाने के लिए चिंतित हैं.
वो कहते हैं, "मुझे नहीं लगता कि आसानी से नौकरी मिलेगी. प्रतियोगिता बहुत ज़्यादा है."
बड़ा लक्ष्य
जो अवसर हैं वो भी छात्रों की उम्मीदों के मुताबिक नहीं हैं.
जनसंचार की छात्रा सुवेला शर्मा कहती हैं, "हम इतनी पढ़ाई करते हैं, हम इतनी अच्छी शिक्षा पा रहे हैं तो हमें वैसी नौकरी भी मिलनी चाहिए. ऐसा हो नहीं रहा है."
ऐसा लगता है कि सरकार इस अंतर को लेकर सोच रही है.
मानव संसाधन विकास मंत्री पल्लम राजू कहते हैं, "भारत में ये समस्या बहुत ज़्यादा है, शिक्षा में भी और दक्षता में भी. यहां हमें काम करना होगा."
सरकार की योजना साल 2022 तक 50 करोड़ लोगों को नौकरी के लिए प्रशिक्षण देना है. ये एक बड़ा लक्ष्य है. लेकिन अगर ये सपना सच हो जाता है तो भारत की विशाल युवा जनसंख्या एक ज़िम्मेदारी की बजाय देश के लिए ताकत बन जाएगी.
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